What Is Written in One’s Fate
“IITK — caught by the ear,
or caught by the hand?”
Well, let it be—
some things simply take their time.
Nine months
for a child to emerge from the womb;
and even after that,
you cannot pull him out
by holding his ear—
lest the whole hand
comes away with it!
So let life take its course.
A seed does not argue with the soil,
a river does not negotiate with the stone,
and a child does not choose
the hands into which he is born.
Everything arrives
when its season comes.
Some are born into privilege,
some into struggle,
some into institutions,
some into obscurity;
some inherit a name,
some spend a lifetime
trying to make one.
And yet—
who am I
to decide who deserves what?
If privilege belongs
to the right person,
whoever he or she may be,
perhaps it is not mine
to question the allocation.
Who am I to play God?
Perhaps destiny
has its own handwriting—
a script invisible to us,
written long before
we learnt to read.
So I shall not complain
about another man's fortune,
nor claim righteousness
for my own.
If someone gets the chair,
let him sit.
If someone gets the crown,
let him carry its weight.
If someone gets the opportunity,
let him prove worthy of it.
And if I get nothing
but a little space
at the feet of my parents—
well…
I do know how to press feet rather well.
Perhaps that too
is a privilege.
Perhaps that too
is my inheritance.
Perhaps the real measure
of a life is not—
“What did I get?”
but—
“What did I do
with whatever was given?”
Nine months in the womb,
nine decades in the world—
and still we spend our lives
trying to force open
doors that were never ours.
Maybe wisdom is simply this:
Let the right hand
receive what is meant for it.
Let the right person
receive the privilege meant for them.
Let the river reach the sea
without asking
why the mountain got the rain.
And let me walk
the little path assigned to me—
with whatever I have,
with whoever I am,
with gratitude rather than grievance.
For in the end,
what was written in one's fate
was perhaps never the whole story.
The greater story is—
whether, having received it,
we learnt to deserve it;
whether, having lost it,
we learnt to let go;
and whether, having lived it,
we finally learnt to surrender.
So—
no ear to pull,
no hand to drag,
no privilege to claim,
no destiny to blame.
Just time.
Just karma.
Just grace.
And, when all is said and done—
a pair of tired feet,
a little gratitude in the heart,
and the humility to say:
Whatever was mine, came to me.
Whatever was not, passed me by.
I received.
I lived.
I learnt.
I served.
And now—
I let go.
And perhaps, after all these years,
after all the plans,
the struggles,
the privileges,
the losses,
the lessons—
I finally understand
the absurd little joke of my own existence:
I am merely a tale
written in a moment of bewilderment—
मैं एक फ़साना हूँ बेख़ुदी का,
तो फिर—
क्या हाल है मेरी ज़िंदगी का!
नसीब में जिसके जो लिखा था
नसीब में जिसके जो लिखा था,
वही जीवन में उसको मिला था।
किसी के आँगन उतरा प्रभात,
किसी के हिस्से धुँधली रात।
किसी के भाग्य में प्रभु का धाम,
गढ़वाल-कुमाऊँ की शीतल छाँव,
देवदार की सुगंधित साँसें,
निर्झर-सी निर्मल पावन आशाएँ।
किसी के हिस्से दिल्ली-बनारस,
धुआँ, धक्के, शोर और आवास,
भीड़ में खोया मनुष्य अकेला,
जीवन जैसे कोई मेला।
किसी के हिस्से गाँव मिला,
माटी का अपना ठाँव मिला,
पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्नेह-सहारा,
कुल का दीपक, घर का उजियारा।
सद्भाव मिला, सहिष्णुता मिली,
रिश्तों में कुछ आत्मीयता मिली;
किसी के हिस्से प्रेम का बंधन,
किसी के हिस्से विछोह-विसर्जन।
किसी के भाग्य में ब्याह लिखा था,
किसी के माथे तलाक लिखा था;
किसी के हिस्से घर-संसार,
किसी के हिस्से एकाकी पार।
कोई आलू-पराठा, मक्खन खाए,
बैठ प्रभु के गुण गुनगुनाए;
कोई बर्गर, मैगी, कॉफी पीकर,
‘इलू-इलू’ के स्वप्न सँजोए।
कोई श्रम से जीवन-राग सुनाए,
पसीने से अपनी फसल उगाए;
सूखी रोटी, प्याज, नमक खाकर,
साँझ को सोए चैन से हँसकर।
कोई डॉक्टर, कोई इंजीनियर,
ज्ञान-विज्ञान का लेकर ढेर,
सेवा का सुंदर बोर्ड लगाए,
फीस में सेवा-भाव दिखाए।
ऐसी चिकित्सा, ऐसी दवाई—
पहले जेब गई, फिर बारी आई;
रोगी रोग से कम घबराए,
बिल देखकर अधिक मुरझाए।
कोई नेता जन-सेवा गाए,
जनता के हित का दीप जलाए;
पाँच बरस का सेवा-व्रत लेकर,
सात पीढ़ियों का भार सँभाले।
कोई बाबू फाइल पर बैठे,
कोई अफसर नियमों में ऐंठे;
तेल बिना पहिया न घूमे,
सूखी कलम कहाँ कुछ लिखे!
कोई ईमान का दीप जलाए,
जीवन भर हिसाब मिलाए;
कोई छल की नाव चढ़कर जाए,
कानून को ही नीति बताए।
किसी के बच्चे विदेश पढ़ें,
किसी के खेतों में श्रम करें;
किसी को कोचिंग, अवसर, सुविधा,
किसी को जीवन भर की दुविधा।
कोई जन्म से ‘मेरिट’ लाया,
कोई अवसर को तरसता आया;
फिर भी दुनिया यही सुनाए—
“मेहनत कर, सब मिल जाएगा!”
महलों में बैठा कोई समझाए—
“गरीब स्वयं अपना दुख पाए!”
पसीने से भीगा श्रमिक हँसकर पूछे—
“साहब, आपका बेटा
किस खेत में हल चलाता है?”
किसी को विरासत में दुकान मिली,
किसी को विरासत में कर्ज मिला;
किसी को बाप की कुर्सी मिली,
किसी को बाप का फटा जूता मिला।
फिर भी उपदेश यही चलता—
“मेहनत का फल ही जग में मिलता!”
हाँ, फल मिलता है—
पर कैसी रीति है यह संसार की—
किसी की थाली में फल पहले से कटे,
किसी के हाथों में छाले ही छाले;
कोई फल खाते-खाते ऊबे,
कोई फल की आस में उम्र गँवाए।
नसीब में जिसके जो लिखा था,
वही जीवन में उसको मिला था।
पर नसीब भी कैसा लेखा है—
किसने लिखा, यह प्रश्न अकेला है।
जिसके हाथ में कलम थी,
उसने भाग्य की पंक्तियाँ लिख डालीं;
जिसके हाथ में हथौड़ा था,
उसने महलों की नींव सँभाली।
एक ने अपना भविष्य सँवारा,
दूजे ने जग का भार उतारा;
एक के श्रम से जगत सँवरा,
पर उसका अपना घर ही उजड़ा।
फिर भी कहते हैं—
“नसीब में जिसके जो लिखा था…”
हाँ, लिखा था—
पर इतना कौन बताएगा,
किसने किसका नसीब लिखा था?
जिस हाथ ने पत्थर काटे,
वही हाथ अपना भाग्य न काट सका;
जिसने दूसरों के घर रोशन किए,
वह अपने घर में दीप न जला सका।
और अंततः जब साँझ ढली,
माया की सारी छाया ढली;
न धन रहा, न मान रहा,
न पद रहा, न अभिमान रहा।
तब मन ने भीतर झाँक के पूछा—
क्या पाया और क्या खोया?
जो प्रेय था, वह स्वप्न हुआ,
जो श्रेय था, वही अपना हुआ।
जिसे जग ने सुख समझकर चाहा,
वह क्षणभंगुर मृगतृष्णा निकला;
जिसे त्याग समझकर जग ने छोड़ा,
वही अमृत का सोता निकला।
नसीब लिखे हों चाहे जैसे,
जीवन का अंतिम लेख यही—
साधना हो पथ, समर्पण हो मन,
सत्य हो श्वास, प्रेम हो धन।
न मिले यदि जग की जय-जयकार,
न मिले यदि सुख-सुविधा अपार;
बस इतना वर दे अंतर्यामी—
कर्म रहे निर्मल, बुद्धि रहे स्वामी।
प्रेय मिले तो प्रसाद समझूँ,
श्रेय मिले तो शीश नवाऊँ;
जो कुछ मिला, तेरा ही मानूँ,
जो छिन जाए—हँसकर छोड़ जाऊँ।
नसीब में जिसके जो लिखा था,
वह तो जीवन ने दे ही दिया;
अब जो शेष रहा मेरे हाथों—
वह तुझको अर्पित कर दिया।
न अब नसीब से कोई शिकवा,
न भाग्य से कोई प्रश्न रहे;
साधना बने जीवन की धारा,
समर्पण उसका अंतिम गहना रहे।
और जब अंतिम साँस ठहरे,
मन में कोई मोह न हो;
श्रेय की शीतल ज्योति जले,
प्रेय का भी तिरस्कार न हो।
यही जीवन की पूर्ण कमाई,
यही साधक की अंतिम थाती—
प्रेम मिले तो बाँट सकूँ,
दुःख मिले तो सह सकूँ,
कर्म मिले तो कर सकूँ,
और अंततः—
अपने ‘मैं’ को तुझमें धर सकूँ।
नसीब में जिसके जो लिखा था—
वह तो जीवन ने लिखा ही था;
पर जीवन की अंतिम विजय यही—
जो मिला, उसे जीकर समर्पित किया,
और जो मैं था—
उसे भी तुझमें अर्पित किया।
मैं एक फ़साना हूं बेखुदी का,
(तो फिर)
क्या हाल है मेरी जिंदगी का !
___________
वह चौंककर बोले—
“क्यों भाई?
ऐसी क्या आफ़त आ गई?
चोटी से अब किसको शिकायत है?
जनेऊ से किसको बैर है?
और भिक्षु ही क्यों बनूँ?”
मैंने कहा—
**“भाई, बात इतनी-सी है—
आजकल पहचान पूछकर
इंसान नहीं,
उसकी हैसियत तौली जाती है।
कभी चोटी निशाने पर है,
कभी टोपी,
कभी तिलक,
कभी दाढ़ी!
जिसकी पहचान दिख गई,
समझो आफ़त आ गई;
इसलिए पहचान छिपा लो,
चोला बदल लो,
सिर मुंडवा लो—
और शांति से निकल जाओ!”**
वह बोले—
“पर इससे क्या होगा?”
मैंने कहा—
“कम-से-कम
लात-घूँसे तो नहीं खाओगे!”
वह कुछ देर चुप रहे,
फिर बोले—
“अच्छा!
तो अब अपनी पहचान बचाने के लिए
पहचान ही बदलनी पड़ेगी?”
मैंने कहा—
“बस यही तो
इस बदलते ज़माने का कमाल है!”
उस्तरा चला,
सिर मुंड गया—
पर आश्चर्य!
चुटिया फिर भी बच गई।
मैंने पूछा—
“भाई, यह कैसे?”
वह मुस्कुराए—
“नसीब में जिसके जो लिखा था…
उस्तरा भी आखिर
उतना ही काट सका!”
Continued...
आज चोटी काटे हो...
आज ब्राह्मण की चोटी काटे हो,
कल को कहोगे—
“हनुमान की पूँछ ही गायब कर देंगे!”
आज चोटी पर कैंची चली है,
कल प्रतीकों पर चलेगी धार,
फिर पूछोगे—
“भाई, इसमें इतना हाहाकार?”
अरे भाई,
चोटी तो बाल थे—
आज थे, कल नहीं;
पर प्रतीक मिटाकर
इतिहास कहाँ मिटता है?
उस्तरा सिर तक पहुँचा,
तो सिर मुंड गया;
पर विचारों का क्या करोगे?
चोटी काट दी,
तो पहचान कहाँ से काटोगे?
आज कहोगे—
“बस एक चोटी ही तो है!”
कल कोई पूछेगा—
“पूँछ ही तो है!”
फिर कोई कहेगा—
“मुकुट ही तो है!”
कोई कहेगा—
“तिलक ही तो है!”
और धीरे-धीरे
इतिहास की हर निशानी को
‘बस एक चीज़’ कहकर
हटा दिया जाएगा।
इसलिए भाई,
कैंची चलाने से पहले
इतना तो सोच लेना—
बाल काटना आसान है,
प्रतीक काटना आसान है,
पर स्मृति काटना आसान नहीं।
क्योंकि—
आज ब्राह्मण की चोटी काटे हो,
कल को मत कहना—
“हनुमान जी की पूँछ भी
बहुत लंबी है…
इसे भी थोड़ी छोटी कर दें!”
और फिर कोई पीछे से पूछ बैठे—
“महाराज,
पूँछ छोटी करते-करते
कहीं अपनी समझ तो
नहीं काट बैठे?”
नसीब में जिसके जो लिखा था—
चोटी बची तो चोटी सही,
पूँछ बची तो पूँछ सही;
पर विवेक बचा रहे—
तो वही असली जीत सही!
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