काश मेरा भी कोई राजपाट होता...
एक ख़्वाब, कुछ तंज़ और थोड़ी-सी बेपरवाही...
काश कोई ऐसा मंज़र होता,
मेरा ख़ुद का भी कोई राजपाट होता।
सुना था लंकेश के बारे में,
कि सोने का उसका भी साम्राज्य होता।
द्वारिकाधीश का तो जो कुछ भी है,
काश उसमें मेरा भी हिस्सा होता।
बड़ी तमन्ना थी चढ़ जाऊँ एक बार मैं भी घोड़ी पर,
न जाने फिर क्या होता, क्या न होता,
जो भी होता, तक़दीर का ही खेल होता।
न ताज की ख़्वाहिश, न तख़्त की आरज़ू,
बस मेरे नाम का भी कोई इक़बाल होता।
जो फ़ैसले होते मेरी ही चौखट पर,
हर हुक्म पर मेरा ही दस्तख़त होता।
लो, दे दिया सारा राजपाट तुम्हें,
अब संभालो, तुम्हारा ही इक़्तिदार होता।
मैं तो ठहरा अपनी मर्ज़ी का मालिक,
न कोई शिकवा होता, न कोई सवाल होता।
कभी टाँग उठाकर आसमाँ की तरफ़ सोता,
कभी ज़मीं पर मेरा बिछौना होता।
न महलों की चाह, न मख़मली बिस्तर,
मेरा फ़क़ीरी में भी अपना संसार होता।
तुम हिसाब रखते रहना उम्र भर दौलत का,
मेरा तो हर लम्हा बेमिसाल होता।
तुम्हारे हिस्से में महल और मीनारें,
मेरे हिस्से में खुला आसमाँ होता।
आख़िर में जब क़ब्र में फैलकर सोता,
न कोई राजा होता, न कोई रंक होता।
जिस राजपाट पर उम्र गुज़ारी तुमने,
उस पर आख़िर किसका अधिकार होता?
काश कोई ऐसा मंज़र होता,
मेरा ख़ुद का भी कोई राजपाट होता!
https://youtu.be/6Vx4jU2qaTY?si=OGV9VOAxsRedvu5a
Memorable evening yesterday !
https://youtu.be/5D6RWUpIwns?si=TICLDto2EML7_ZDW
त्रिशंकु, तृष्णा और त्रिया चरित्र
तन, मन, धन — है मेरा या तेरा!
प्रभु! जब मैं पैदा हुआ, एक ही बात सिखाई,
पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब,
खेलोगे-कूदोगे, गाओगे-बजाओगे,
तो कहलाओगे खराब!
बचपन से ही बिठा दिया,
मन में ये कैसा डेरा,
दुनिया भर की दौलत मेरी हो,
पर तन-मन-धन सब तेरा!
नवरात्रि में सब मिलकर आरती करें,
तन-मन-धन सब है तेरा,
फिर क्यों दिन-रात लगे रहत,
मेरा-मेरा, मेरा-मेरा!
ऐसा संशय दूर करो प्रभु,
क्या ये तन भी नहीं मेरा?
क्या ये मन भी नहीं मेरा?
फिर धन के पीछे भाग रहा क्यों,
जब भाग्य भी नहीं मेरा?
समझ न आए, प्रभु! क्या संस्कार, क्या कुसंस्कार,
क्या धर्म-अधर्म, क्या सदाचार?
स्वभाव, गुण और कर्म की बातें,
कान सुने पर मन लाचार!
त्रिशंकु बन लटका हूँ प्रभु,
न इधर का, न उधर का,
तृष्णा ने ऐसा जाल बुना है,
छोर न मिलता इस सफ़र का।
त्रिया चरित्र की बात निराली,
किसको समझूँ अपना-तेरा?
मन के भीतर बैठा रावण,
बाहर राम का भेष है मेरा!
झूठहि लेना, झूठहि देना,
झूठहि चना-मूँगफली चबेना,
सच की गठरी कौन उठाए,
जब झूठ का चलता है बिछौना!
अबकी बेर पार करो प्रभु,
धन छीना, अब मन भी छीजे,
तन तो आखिर मिट्टी होना,
मन की गाँठ भी खोलो जी!
न मेरा राजपाट, न मेरी माया,
न कोई अपना, न पराया,
जिसको जीवन भर अपना समझा,
वो भी निकला तेरा साया!
बस इतनी सी विनती प्रभु,
अब और न कोई फेरा,
जब कुछ भी नहीं मेरा है,
तो फिर ये 'मैं' किसका डेरा?
तन तेरा, मन तेरा, धन भी तेरा कहलाए,
फिर मेरा-मेरा करते-करते,
ये जीवन क्यों बीत जाए!