मोह से सत्य तक
रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ,
ये धन-दौलत की मुराद किसे पेश करूँ।
ये चमकते हुए बाज़ार, ये सुख की दुनिया,
इन फ़ानी ख़्वाबों की सौग़ात किसे पेश करूँ।
आज महफ़िल है, तो कल ख़ाक में मिलना है मुझे,
इस तमाशे की ये रात किसे पेश करूँ।
जिसको अपना समझा, वही पल में पराया निकला,
ऐसे रिश्तों की ये बात किसे पेश करूँ।
तख़्त, दौलत, ये मकाँ, नाम, शोहरत और नशा—
सब हैं दो दिन की बरसात, किसे पेश करूँ।
मन ने माँगा था जहाँ, जहाँ ने मन को ही बाँध लिया,
इस अजब मोह की बारात किसे पेश करूँ।
जब ज़रा आँख खुली, देखा कि मैं था ही नहीं,
जो बचा है वही सौग़ात किसे पेश करूँ।
न रंग बाक़ी रहेगा, न ये तन, न ये संसार,
जब सब मिटना है तो प्रभात किसे पेश करूँ।
अब न दौलत की तमन्ना, न तमाशे की प्यास,
अपने भीतर की मुलाक़ात किसे पेश करूँ।
सत्य की राह में जब झूठ के पर्दे हटे,
उस ख़ामोशी की ये बात किसे पेश करूँ।
ये मेरे शेर, मेरे आख़िरी नज़राने हैं,
ये राम-नाम की सौग़ात किसे पेश करूँ।
जिसे देना था उसे दे दिया संसार ने सब,
अब मैं अपना ये दिल-हाल किसे पेश करूँ।
राम ही सत्य है—बाक़ी सब आना-जाना,
इस अमर सत्य की सौग़ात किसे पेश करूँ।
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Sunday, October 4, 2026
रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ,
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