सत्संग : घंटों का ज्ञान नहीं, एक क्षण की सत् अथवा संत-संगति
तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सत्संग॥
— रामचरितमानस
यदि एक तराजू के एक पलड़े में स्वर्ग के समस्त सुख और मोक्ष का सुख रख दिया जाए,
और दूसरे पलड़े में केवल एक लव—एक क्षण—का सत्संग,
तो भी दोनों की तुलना नहीं हो सकती।
क्यों?
क्योंकि सत्संग का अर्थ केवल घंटों बैठकर प्रवचन सुनना नहीं है।
यदि तुम्हें अच्छा लगता है तो
घंटों lecture सुन लो।
यदि तुम्हारे भीतर रस जागता है तो
लीला और नाटक देख लो।
लेकिन यदि कोई तुम्हें केवल पाँच मिनट ऐसा संगीत सुना दे
जो दिन भर तुम्हारे कानों में गूँजता रहे,
मन के भीतर उतर जाए,
तुम्हारी दृष्टि बदल दे,
तुम्हें स्वयं से मिला दे—
तो वही पाँच मिनट भी सत् अथवा संत-संगति का माध्यम हो सकते हैं।
क्योंकि सत्संग की पहचान समय की अवधि से नहीं,
उस सत् के स्पर्श से होती है जो चित्त में परिवर्तन ले आए।
संगति नहीं—सत् अथवा संत-संगति
यहाँ एक सूक्ष्म भेद समझना आवश्यक है।
हर संगति सत्संग नहीं होती।
सिर्फ लोगों के साथ बैठ जाना सत्संग नहीं है।
किसी संस्था से जुड़ जाना सत्संग नहीं है।
किसी सम्प्रदाय, सेक्ट या कल्ट का सदस्य बन जाना भी सत्संग नहीं है।
सत्संग का अर्थ है—सत् के साथ संगति।
और सत् की जीवित अभिव्यक्ति है—संत।
लेकिन यहाँ भी संत का अर्थ केवल किसी विशेष वेश, संस्था, सम्प्रदाय या पहचान से नहीं है।
वह संत, जो सर्वमान्य हो।
जिसकी वाणी किसी एक सेक्ट, कल्ट या सम्प्रदाय की सीमाओं में कैद न हो।
जो किसी समूह का विस्तार करने के लिए नहीं,
बल्कि मनुष्य के भीतर के सत्य को जगाने के लिए बोलता हो।
जिसके पास जाने के लिए
तुम्हें अपनी पुरानी पहचान छोड़कर
कोई नई साम्प्रदायिक पहचान धारण न करनी पड़े।
संत वह है जिसकी वाणी सीमाएँ नहीं बनाती—
भीतर की सीमाएँ तोड़ती है।
तर्क से अनुभूति नहीं होती
तर्क प्रश्न कर सकता है।
तर्क विश्लेषण कर सकता है।
तर्क बुद्धि को व्यवस्थित कर सकता है।
लेकिन—
तर्क स्वयं अनुभूति नहीं देता।
अनुभूति जाग सकती है—
किसी सर्वमान्य संत की वाणी से,
किसी संत के भजन से,
किसी भक्त की निष्कपट पुकार से,
किसी गुरु के मौन से,
किसी लीला के दृश्य से,
किसी राग के स्वर से।
कभी एक संत का एक वाक्य
वर्षों के तर्क को पार कर जाता है।
कभी एक भजन की एक पंक्ति
ऐसी जगह पहुँच जाती है
जहाँ दर्शन और शास्त्रार्थ भी नहीं पहुँच पाते।
क्योंकि—
बुद्धि को उत्तर चाहिए,
लेकिन हृदय को स्पर्श चाहिए।
और सत्संग का वास्तविक आरम्भ
अक्सर उसी स्पर्श से होता है।
संत-वाणी और संगीत : सत्संग के दो माध्यम
जब संत की वाणी सुनते-सुनते
उसका शब्द केवल शब्द नहीं रहता—
बल्कि भीतर उतरकर
तुम्हारे अपने जीवन का अनुभव बन जाता है—
तो वह सत्संग है।
जब भजन केवल गीत नहीं रहता—
बल्कि तुम्हारे भीतर
भक्ति का कोई सुप्त स्रोत खोल देता है—
तो वह सत्संग है।
और जब संगीत केवल मनोरंजन नहीं रहता,
बल्कि मन को उसके अपने मूल स्रोत की ओर लौटा देता है—
तो वह नाद का सत्संग है।
एक महान राग की छोटी-सी बंदिश,
एक आलाप,
एक मींड,
एक करुण स्वर—
कभी-कभी ऐसे स्थान पर पहुँच जाता है
जहाँ शब्दों की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
इसलिए हो सकता है—
एक व्यक्ति ने तीन घंटे प्रवचन सुना
और बाहर निकलकर वही रहा जो पहले था।
दूसरे व्यक्ति ने पाँच मिनट
किसी संत का भजन या
किसी सच्चे राग का स्वर सुना—
और वह दिन भर उसके भीतर गूँजता रहा।
संभव है, उसी क्षण उसे लव सत्संग का सुख मिल गया हो।
रामचरितमानस का सत्संग
बिनु सतसंग बिबेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
सत्संग के बिना विवेक नहीं जागता।
लेकिन विवेक स्वयं अंतिम मंज़िल नहीं है।
विवेक केवल मार्ग को पहचानता है।
मार्ग पर चलना अनुभूति से प्रारम्भ होता है।
और अनुभूति—
संत-वाणी से जाग सकती है,
भजन से जाग सकती है,
रामकथा से जाग सकती है,
लीला से जाग सकती है,
और नाद से भी जाग सकती है।
इसलिए SSG के संदर्भ में...
किसी को lecture में आनंद मिलता है—
वह उसका माध्यम है।
किसी को रामलीला और कथा में
राम दिखाई देते हैं—
वह उसका माध्यम है।
किसी को संतों की वाणी में
जीवन का सत्य सुनाई देता है—
वह उसका माध्यम है।
किसी को भजन में
भक्ति की अनुभूति होती है—
वह उसका माध्यम है।
और किसी को केवल पाँच मिनट के
राग या संगीत में
नादब्रह्म की झलक मिलती है—
वह भी सत् तक पहुँचने का माध्यम हो सकता है।
इसलिए माध्यमों की तुलना मत करो।
पहचानो—
क्या तुम्हें उस अनुभव में
सत् का स्पर्श मिला?
क्या संत-वाणी ने तुम्हारे भीतर
कोई सोया हुआ प्रश्न जगा दिया?
क्या संगीत ने तुम्हारे अहंकार को
कुछ क्षणों के लिए मौन कर दिया?
क्या तुम्हारा मन
थोड़ा अधिक शांत हुआ?
क्या करुणा बढ़ी?
क्या विभाजन कम हुआ?
यदि हाँ—
तो शायद तुम्हें उस दिन
केवल अच्छी संगति नहीं,
बल्कि सत् अथवा संत-संगति मिली थी।
सत्संग की अंतिम पहचान
सत्संग वह नहीं
जिसके बाद तुम्हारे पास
दूसरों को समझाने के लिए अधिक तर्क हों।
सत्संग वह है
जिसके बाद तुम्हारे भीतर
कुछ ऐसा जाग जाए
जिसे किसी सेक्ट, कल्ट या सम्प्रदाय की पहचान की आवश्यकता न रहे।
संत-वाणी से अनुभूति,
अनुभूति से साधना,
साधना से समर्पण,
और समर्पण से नादब्रह्म तक पहुँचना है।
और कभी-कभी—
इस पूरी यात्रा का द्वार
घंटों के lecture से नहीं,
बल्कि किसी सर्वमान्य संत के एक वचन से,
किसी संत के भजन की एक पंक्ति से,
या किसी राग की
केवल एक सच्ची तान से खुल जाता है।
तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सत्संग॥
क्योंकि अंततः—
सत्संग भीड़ में बैठने का नाम नहीं है।
सत्संग किसी पहचान को ग्रहण करने का नाम नहीं है।
सत्संग है—सत् के साथ संगति,
और उस संत की संगति
जो हमें किसी नए घेरे में बंद नहीं करता,
बल्कि हमारे भीतर के सभी घेरे खोल देता है।
॥ श्रीराम ॥
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