एक ओंकार से रामराज्य तक: धर्म किसका, नफ़रत किसकी?
गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी, ईश्वर के अनेक नाम और हिंदुत्व की पहचान-राजनीति के सामने एक असहज प्रश्न
यदि ईश्वर एक है, तो उसके नाम पर मनुष्य इतने हिस्सों में क्यों बँटा हुआ है? और यदि धर्म हमें सत्य, करुणा तथा प्रेम सिखाता है, तो धर्म की राजनीति में घृणा को इतनी जगह कैसे मिल गई?
1. एक प्रश्न, जो हमारी धार्मिक चेतना को झकझोरता है
हिंदू शास्त्रों में ‘अल्लाह’ नाम खोजने पर सामान्यतः वह शब्द नहीं मिलता, क्योंकि वे मुख्यतः संस्कृत और दूसरी भारतीय भाषाओं में रचे गए थे। अरबी-फ़ारसी इस्लामी धार्मिक साहित्य की अपनी शब्दावली है। वहाँ ‘राम’ उसी रूप में केंद्रीय धार्मिक संबोधन नहीं है, जिस रूप में वह भारतीय परंपराओं में मिलता है।
लेकिन इस भाषायी अंतर को जब धार्मिक श्रेष्ठता का प्रमाण बना दिया जाता है, तब समस्या शुरू होती है।
क्या ईश्वर किसी भाषा का बंधक है?
क्या संस्कृत में पुकारा गया परमात्मा अरबी में पुकारे गए अल्लाह से अलग हो जाता है? क्या किसी दूसरे धर्म की प्रार्थना में प्रयुक्त शब्द अपने आप में शत्रुता का प्रतीक बन जाता है?
और यदि किसी नाम का दूसरे धर्मग्रंथ में न होना ही उस धर्म की श्रेष्ठता या हीनता का प्रमाण है, तो फिर हमें गुरु ग्रंथ साहिब की उस आध्यात्मिक दृष्टि को भी समझना होगा, जिसमें विभिन्न परंपराओं के नाम एक ही परम सत्ता के संदर्भ में आते हैं।
गुरु ग्रंथ साहिब में राम, हरि, गोविंद और कृष्ण जैसे भारतीय नामों के साथ अल्लाह, खुदा और रहीम जैसे फ़ारसी-अरबी मूल के संबोधन भी मिलते हैं। यह केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि उस भारतीय आध्यात्मिक संवाद का हिस्सा है, जिसमें अलग-अलग भाषाओं और परंपराओं के माध्यम से परम सत्य की खोज की गई।
नाम अनेक हो सकते हैं; लेकिन क्या नामों की विविधता को मनुष्यों के बीच नफ़रत की दीवार बनना चाहिए?
यही इस चर्चा का मूल प्रश्न है।
2. गुरु ग्रंथ साहिब: ईश्वर की एकता और नामों की विविधता
सिख धर्म का मूल मंत्र है:
ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु।
अर्थात् एक ओंकार—सत्य स्वरूप, सृष्टि का कर्ता, निर्भय और निर्वैर।
इस उद्घोष में दो शब्द विशेष ध्यान देने योग्य हैं—निर्भय और निर्वैर।
निर्भय का अर्थ है भय से मुक्त होना। निर्वैर का अर्थ है किसी के प्रति वैर न रखना।
यहाँ आध्यात्मिकता का एक ऐसा आदर्श सामने आता है, जो केवल ईश्वर की सत्ता की घोषणा नहीं करता, बल्कि मनुष्य के आचरण की कसौटी भी प्रस्तुत करता है।
यदि हम ईश्वर को निर्वैर मानते हैं, तो क्या उसके नाम पर किसी समुदाय के प्रति स्थायी वैर पालना हमारी आध्यात्मिक समझ के अनुरूप है?
यदि हम सत्य को सर्वोपरि मानते हैं, तो क्या अपनी राजनीतिक विचारधारा के पक्ष में असुविधाजनक तथ्यों को छिपाना उचित है?
यदि हम एक परम सत्ता की बात करते हैं, तो क्या जन्म, जाति, भाषा और धार्मिक पहचान के आधार पर मनुष्य की गरिमा कम की जा सकती है?
गुरु ग्रंथ साहिब के पृष्ठ 1349 पर भगत कबीर जी की वाणी में आता है:
“कबीरा, तूँही तूँही, अलह राम का गम नाहीं।”
गुरबाणी के विभिन्न अनुवादों में इसके पाठ और अर्थ की प्रस्तुति अलग हो सकती है; इसलिए मूल संदर्भ के साथ इसका अध्ययन करना उचित है। इसी पृष्ठ पर कबीर जी की वाणी में अल्लाह और राम का उल्लेख भी मिलता है। मूल गुरबाणी का पाठ देखें।
इस परंपरा का संदेश यह नहीं कि सभी धर्मों के सिद्धांत बिल्कुल समान हैं। उनका ईश्वर, अवतार, पैग़म्बर, मुक्ति और उपासना के बारे में अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकता है। संदेश यह है कि धार्मिक मतभेद को मनुष्य के प्रति घृणा में बदलना अनिवार्य नहीं है।
यही अंतर आध्यात्मिक संवाद और धार्मिक वर्चस्ववाद के बीच है।
3. रहीम और राम: भाषा की सीमाओं से परे भारतीय सांस्कृतिक अनुभव
भारतीय संस्कृति का इतिहास किसी एक भाषा या एक धार्मिक समुदाय के भीतर बंद होकर नहीं बना।
हिंदी-उर्दू की साझा काव्य परंपरा में राम, रहीम, कृष्ण, अली, हरि और ख़ुदा जैसे नाम अलग-अलग संदर्भों में आते रहे हैं। फ़ारसी में रामकथा के अनुवाद भी हुए। सत्रहवीं शताब्दी में राम और सीता की कथा पर आधारित फ़ारसी रचना राम व सीता इसका एक उदाहरण है। Encyclopaedia Iranica में ऐतिहासिक विवरण।
यहाँ एक तथ्यात्मक अंतर समझना आवश्यक है: ‘रहीम’ अरबी मूल का शब्द है, जिसका अर्थ अत्यंत दयालु या कृपालु है; यह इस्लामी परंपरा में ईश्वर के गुणों से जुड़ा है। ‘राम’ भारतीय धार्मिक और भाषायी परंपराओं में विशिष्ट ऐतिहासिक, काव्यात्मक और आध्यात्मिक अर्थ रखता है।
दोनों शब्दों का इतिहास एक जैसा नहीं है। लेकिन भारतीय साहित्य में इन नामों का सह-अस्तित्व इस बात का प्रमाण है कि सांस्कृतिक संवाद किसी एक धर्म की सीमाओं में कैद नहीं रहा।
अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना की भक्ति और नीति से जुड़ी काव्य परंपरा हो, कबीर की निर्गुण वाणी हो या गुरु नानक देव जी का संदेश—भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में ऐसे अनेक स्वर मिलते हैं, जिन्होंने मनुष्य को उसकी बाहरी पहचान से आगे देखने का आग्रह किया।
इस इतिहास को समझने के लिए हमें यह मानने की आवश्यकता नहीं कि सभी धार्मिक मान्यताएँ समान हैं। इतना स्वीकार करना पर्याप्त है कि अलग धार्मिक परंपराओं के बीच संवाद, सम्मान और साझा सांस्कृतिक अभिव्यक्ति संभव है।
4. जब धर्म राजनीतिक पहचान में सिमट जाता है
यहीं से हिंदुत्व की राजनीति पर एक कठिन प्रश्न उठता है।
हिंदू धर्म एक विशाल और विविध परंपरा है। इसमें वेदांत के अद्वैत से लेकर भक्ति, योग, सांख्य, शैव, शाक्त, वैष्णव और अनेक लोकपरंपराओं तक विविध विचार मिलते हैं। इनमें ईश्वर, आत्मा, जगत और मुक्ति को लेकर एक ही दृष्टिकोण नहीं है।
इसके विपरीत, हिंदुत्व आधुनिक राजनीतिक विचारधारा है, जो हिंदू पहचान को राष्ट्र, संस्कृति और राजनीतिक समुदाय की अवधारणाओं से जोड़ती है। हिंदू धर्म और हिंदुत्व को पूरी तरह एक मान लेना इतिहास तथा विचार के स्तर पर अंतर मिटा देना होगा।
हिंदुत्व की राजनीति की आलोचना करते समय प्रश्न किसी व्यक्ति की हिंदू आस्था का नहीं है। प्रश्न उन राजनीतिक प्रवृत्तियों का है, जिनमें धार्मिक पहचान के आधार पर नागरिकों के प्रति अविश्वास, भय, सामाजिक बहिष्कार या घृणा को बढ़ावा दिया जाता है।
जब किसी राजनीतिक अभियान में मुसलमानों को एक समान शत्रु के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जब इतिहास की जटिलताओं को वर्तमान के समुदायों के विरुद्ध सामूहिक अभियोग में बदल दिया जाता है, या जब आलोचना को धर्म का अपमान बताकर दबाने का प्रयास किया जाता है, तब लोकतांत्रिक और नैतिक प्रश्न उठाना आवश्यक हो जाता है।
यह आलोचना किसी एक समुदाय को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि सत्ता और विचारधारा को जवाबदेह बनाने के लिए है।
धार्मिक कट्टरता किसी भी परंपरा में हो सकती है। इस्लामी कट्टरता की आलोचना करना भी उतना ही उचित है, जितना हिंदुत्व की राजनीति में बहिष्कारवादी प्रवृत्तियों की आलोचना करना। एक की आलोचना से दूसरे की गलतियाँ उचित नहीं हो जातीं।
लेकिन अपने समाज में मौजूद समस्या पर मौन रहकर दूसरे समाज की समस्या गिनाना आत्मालोचन नहीं है।
धर्म की रक्षा का दावा करने वालों से भी यह पूछना चाहिए कि वे धर्म के नैतिक मूल्यों की रक्षा कर रहे हैं या अपनी राजनीतिक सत्ता की।
5. राम के नाम पर राजनीति और राम के आदर्शों की कसौटी
राम भारतीय जनमानस में केवल एक धार्मिक नाम नहीं हैं। वे साहित्य, भक्ति, लोकजीवन और नैतिक कल्पना में गहरे बसे हुए हैं।
लेकिन राम के नाम का राजनीतिक उपयोग अपने आप में किसी राजनीति को नैतिक या अनैतिक सिद्ध नहीं करता। कसौटी यह है कि उस नाम के साथ कौन-से मूल्य और कौन-सा आचरण जोड़ा जा रहा है।
यदि राम का नाम न्याय, मर्यादा, कर्तव्य और लोककल्याण की प्रेरणा देता है, तो उनके नाम पर सार्वजनिक जीवन में सत्यनिष्ठा, न्याय और उत्तरदायित्व की माँग क्यों न की जाए?
यदि कोई नेता रामराज्य की बात करता है, तो उससे यह पूछना अनुचित कैसे हो सकता है कि उसके शासन में कमजोर नागरिकों के अधिकार, महिलाओं की गरिमा, गरीबों की सुरक्षा, सामाजिक सद्भाव और संस्थाओं की निष्पक्षता की स्थिति क्या है?
राजनीतिक नारे और नैतिक आचरण एक ही चीज़ नहीं हैं।
राम के प्रति श्रद्धा रखने वाले करोड़ों लोगों की आस्था को किसी राजनीतिक दल की आलोचना के साथ जोड़कर खारिज करना भी गलत होगा। उसी तरह, किसी दल की आलोचना को हिंदू धर्म पर हमला बताकर हर प्रश्न से बच निकलना भी लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है।
किसी देवता के प्रति श्रद्धा का सबसे सार्थक प्रमाण केवल उसका नाम लेना नहीं, बल्कि अपने आचरण को उसके आदर्शों की कसौटी पर रखना है।
यह कसौटी राम के लिए भी है, रहीम के लिए भी और हर उस धार्मिक या राजनीतिक प्रतीक के लिए है, जिसका उपयोग मनुष्य को प्रभावित करने के लिए किया जाता है।
6. असली धर्म कौन-सा है?
यह प्रश्न आकर्षक है, लेकिन इसका उत्तर किसी एक धार्मिक समुदाय को विजेता और दूसरे को पराजित घोषित करना नहीं हो सकता।
यदि हम धर्म को केवल धार्मिक ग्रंथ, अनुष्ठान या संस्थागत पहचान मानते हैं, तो अलग-अलग धर्मों के अपने सिद्धांत और परंपराएँ हैं। उनके बीच वास्तविक मतभेद हैं, जिन्हें ईमानदारी से स्वीकार करना चाहिए।
लेकिन यदि हम धर्म के नैतिक उद्देश्य की बात करते हैं, तो प्रश्न बदल जाता है:
क्या हमारी आस्था हमें सत्य के निकट ले जाती है?
क्या वह हमारे भीतर करुणा पैदा करती है?
क्या वह हमें अपने ही समुदाय की गलतियों को देखने का साहस देती है?
क्या वह हमें दूसरे मनुष्य की गरिमा का सम्मान करना सिखाती है?
क्या वह अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देती है—चाहे अन्याय करने वाला हमारा अपना राजनीतिक या धार्मिक समूह ही क्यों न हो?
इन प्रश्नों के उत्तर किसी धार्मिक पहचान के आधार पर पहले से तय नहीं किए जा सकते। कोई व्यक्ति धार्मिक पहचान रखते हुए भी न्यायप्रिय हो सकता है, और कोई व्यक्ति धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करते हुए भी घृणा, अहंकार और वर्चस्व का व्यवहार कर सकता है।
इसलिए असली कसौटी केवल पहचान नहीं, बल्कि विचार, विवेक और आचरण है।
गुरु ग्रंथ साहिब का एक ओंकार हमें एकता की आध्यात्मिक संभावना की ओर बुलाता है। उसका निर्वैर हमें याद दिलाता है कि ईश्वर की एकता की घोषणा और मनुष्य के प्रति वैर का व्यवहार एक-दूसरे के सामने कठिन नैतिक प्रश्न खड़े करते हैं।
7. धर्म बनाम अधर्म नहीं—चेतना बनाम अज्ञान
समस्या केवल किसी एक राजनीतिक विचारधारा तक सीमित नहीं है। मनुष्य जब अपनी पहचान को अंतिम सत्य मान लेता है, तब वह अपने समूह की प्रशंसा और दूसरे समूह की निंदा को ही नैतिकता समझने लगता है।
यही अज्ञान का एक रूप है—जब व्यक्ति सत्य को समझने के बजाय केवल अपने पूर्वाग्रहों की पुष्टि खोजता है।
जब हम अपने समुदाय के अपराध को अपवाद और दूसरे समुदाय के अपराध को उसकी पूरी पहचान का प्रमाण मानते हैं, तब हम न्याय नहीं कर रहे होते; हम अपने अहंकार की रक्षा कर रहे होते हैं।
जब हम अपने नेता के झूठ को रणनीति और विरोधी के सच को षड्यंत्र कहते हैं, तब हम सत्य के प्रति निष्ठावान नहीं रहते।
जब हम अपने धर्म के नाम पर की गई हिंसा को उचित और दूसरे के धर्म के नाम पर की गई हिंसा को असहनीय बताते हैं, तब हमारा नैतिक विवेक पहचान की राजनीति के अधीन हो चुका होता है।
यह चेतना हिंदुत्व की बहिष्कारवादी राजनीति में भी दिखाई दे सकती है, इस्लामी कट्टरता में भी, और किसी भी ऐसी विचारधारा में जो मनुष्य की स्वतंत्र सोच को समूह की आज्ञाकारिता में बदल दे।
इसका समाधान धर्म का अपमान नहीं, बल्कि धर्म और राजनीति दोनों के भीतर नैतिक आत्मालोचन है।
हमें अपने बच्चों को केवल यह सिखाने की आवश्यकता नहीं कि हमारा धर्म क्या कहता है। उन्हें यह भी सिखाना होगा कि वे किसी दावे को कैसे परखें, किसी ऐतिहासिक तथ्य की पुष्टि कैसे करें, असहमति का सम्मान कैसे करें और सत्ता से प्रश्न कैसे पूछें।
आस्था और विवेक एक-दूसरे के शत्रु नहीं होने चाहिए।
8. भारत की आध्यात्मिक विरासत: विविधता को मिटाना नहीं, समझना
भारत की सभ्यता का इतिहास केवल संघर्ष का इतिहास नहीं है। यह बहस, अनुवाद, असहमति, ग्रहण, प्रतिरोध और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का इतिहास भी है।
उपनिषदों की दार्शनिक खोज, बौद्ध और जैन परंपराओं की बहसें, भक्ति और सूफी काव्य, संतों की निर्गुण वाणी तथा सिख गुरुओं की शिक्षाएँ—इन सबको किसी एक सरल राजनीतिक कथा में समेट देना भारतीय इतिहास की जटिलता के साथ न्याय नहीं करेगा।
इस विरासत का सम्मान करने का अर्थ यह नहीं कि हम अतीत के सभी संघर्षों को भुला दें। इसका अर्थ है कि हम इतिहास को प्रमाणों के आधार पर समझें, अतीत के शासकों और संस्थाओं के कार्यों का मूल्यांकन करें, और उनके लिए आज के पूरे समुदायों को दोषी न ठहराएँ।
सच्चा सांस्कृतिक आत्मविश्वास दूसरे की भाषा, प्रार्थना या साहित्य से भयभीत नहीं होता। वह अपने इतिहास को जानता है, अपनी परंपरा के भीतर मतभेदों को स्वीकार करता है और आलोचना से सीखने की क्षमता रखता है।
भारत को अपनी विविधता का उत्सव मनाने के लिए यह दावा करने की आवश्यकता नहीं कि सभी धर्म एक जैसे हैं। उसे केवल इतना साहस चाहिए कि वह धार्मिक मतभेद के बावजूद समान नागरिक गरिमा और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को स्वीकार करे।
यही लोकतंत्र का भी आधार है।
निष्कर्ष: नाम नहीं, मनुष्य के भीतर जागता सत्य
गुरु ग्रंथ साहिब में राम और अल्लाह जैसे नामों का साथ-साथ आना हमें यह सोचने का अवसर देता है कि धार्मिक भाषा किस तरह विभिन्न आध्यात्मिक परंपराओं के बीच संवाद का माध्यम बन सकती है।
इस तथ्य से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सभी धर्मों के सिद्धांत समान हैं, या कि किसी एक धर्म का ग्रंथ दूसरे सभी ग्रंथों से श्रेष्ठ है। लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण नैतिक प्रश्न अवश्य निकलता है:
यदि हमारी आस्था हमें दूसरे मनुष्य से घृणा करना सिखाने लगे, तो क्या हमें अपनी आस्था की व्याख्या पर पुनर्विचार नहीं करना चाहिए?
हिंदू धर्म को हिंदुत्व की हर राजनीतिक अभिव्यक्ति में सीमित नहीं किया जा सकता। इस्लाम को किसी कट्टरपंथी संगठन के व्यवहार से परिभाषित नहीं किया जा सकता। सिख धर्म को भी केवल किसी राजनीतिक नारे तक सीमित नहीं किया जा सकता।
धर्म की जीवंतता इस बात में है कि वह मनुष्य को अपने भीतर झाँकने, अपने अहंकार को पहचानने और अपने आचरण को बेहतर बनाने की प्रेरणा दे।
राजनीति का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि वह न्याय, स्वतंत्रता, समानता और नागरिक गरिमा को कितना सुरक्षित करती है—न कि केवल इस आधार पर कि वह किस धार्मिक प्रतीक का उपयोग करती है।
और शायद सबसे कठिन प्रश्न यही है:
हम ईश्वर के नाम की रक्षा करने निकले हैं, या उस मनुष्यता की, जिसके बिना ईश्वर का नाम भी केवल एक नारा बनकर रह जाता है?
एक ओंकार का उद्घोष केवल किसी धार्मिक पुस्तक के आरंभ में लिखा हुआ प्रतीक नहीं रहना चाहिए। यदि हम उसे अपने जीवन में अर्थ देना चाहते हैं, तो हमें निर्भयता के साथ सत्य बोलना होगा, निर्वैर भाव से मनुष्यों का सम्मान करना होगा और सत्ता से यह पूछते रहना होगा कि उसके कर्म उसके दावों से कितने मेल खाते हैं।
धर्म का उद्देश्य मनुष्य को दूसरे मनुष्य से दूर करना नहीं, बल्कि सत्य और न्याय के प्रति उसकी जिम्मेदारी को गहरा करना होना चाहिए।
ईश्वर के नाम अनेक हैं। मनुष्यता की गरिमा एक है। और नफ़रत को धर्म का पर्याय बना देना—किसी भी धर्म के साथ न्याय नहीं है।
संदर्भ एवं आगे पढ़ने के लिए
- श्री गुरु ग्रंथ साहिब — मूल गुरबाणी एवं अनुवाद
- Guru Nanak’s Religious Pluralism and Sri Guru Granth Sahib — अध्ययन
- Encyclopaedia Iranica — Rām wa Sītā: फ़ारसी साहित्य में रामकथा
- Names of God in Sikhism — विभिन्न धार्मिक और भाषायी नामों का परिचय
- https://akshat08.substack.com/p/87d?utm_source=share&utm_medium=android&r=124980
यह लेख किसी धर्म की श्रेष्ठता या हीनता स्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था, राजनीतिक सत्ता और मानवीय विवेक के बीच संबंध पर विचार करने के लिए लिखा गया है।
### 😂 धर्म का धंधा!
धर्म-संप्रदाय के नाम पर, गोरखधंधा खूब करें, अपनी दुकान चमकाने को, रोज़ नए पाखंड गढ़ें।
हिंदुत्ववादी करें तो धर्म, मौलवी करे तो अधर्म, पादरी जी का खेल निराला, सबके अपने अलग करम!
अपना चंदा पुण्य कहलाए, दूजे का चंदा पाप, अपना झूठ प्रवचन ठहरे, दूजे का झूठ अभिशाप!
अपना नेता धर्म का रक्षक, दूजा धर्म-विरोधी, अपनी सत्ता रामराज्य है, दूजे की सत्ता क्रोधी!
जनता आपस में भिड़ती जाए, महंत-मौलवी मौज करें, धर्म बचाने निकले थे जो, अपनी तिजोरी रोज़ भरें!
राम-रहीम दोनों मुस्काएँ, देख मनुज का खेल, धर्म की आड़ में चलती देखो, कैसी ठगों की रेल!
कबीर खड़े हैं चौराहे पर, पूछ रहे मुस्काय, धर्म बचा या धंधा जीता, कोई तो सच बताय!
### 😂 धर्म-अधर्म का महाभारत और समोसे वाले पंडित जी
बिगड़ी लेहु बनाई रे भाई, धर्म-अधर्म के महाभारत में, कृष्ण की शरण हो जाई!
माया के चक्कर में पड़कर, उम्र गंवाई सारी, जाति-धर्म की बहस में बीती, जीवन की पारी। राम-रहीम के नाम पे लड़कर, छाती खूब फुलाई, भीतर बैठा लोभ का रावण, खबर न उसकी पाई!
अंतकाल पछताएगा, जब प्राण जाएंगे छूट, बेटा-बहू, माँ-बाप भी तब, रह जाएंगे पीछे छूट। जिस धन खातिर जीवन खपाया, जिस पद की थी चाह, सब यहीं धरा रह जाएगा, साथ न देगा स्वार्थ!
पंडित जी श्राद्ध क्रिया करके, मंत्र पढ़ें भरपूर, दक्षिणा लेकर झोली भर लें, दुखिया रहे मजबूर। श्राद्ध-कर्म की विधि निबटाकर, आशीर्वाद बरसाएँ, फिर गरमागरम समोसे लेकर, चटनी खूब उड़ाएँ!
मृत्यु भोज में धर्म का पहरा, कर्मकांड का मान, भूखे को रोटी देने में, क्यों सूख रहे हैं प्राण? जीते जी माँ-बाप को पूछो, यही धर्म की बात, मरने पर पकवान खिलाकर, किससे करोगे घात?
कृष्ण कहें गीता में सुन ले, कर्म सुधार ले आज, लोभ-मोह के जाल से निकलकर, कर ले नेक समाज। धर्म-अधर्म की जंग छोड़कर, मन का मैल मिटाई, बिगड़ी लेहु बनाई रे भाई, कृष्ण की शरण हो जाई!
### 😂 धर्म-कर्म का हिसाब, प्यारे!
कुत्तों को पूरी, चिड़िया को दाना, गैया को हलुआ, भिखारी को ताना। मंदिर में छप्पन भोग लगाकर, भूखे को बोले—चल हट, दीवाना!
माथे पे तिलक, गले में माला, मन में मगर छल-कपट का ज्वाला। दान-पुण्य का ढोल बजाए, घर में बैठे भूखा रखवाला!
पंडित से पूछे मुहूर्त शुभ, ज्योतिष से पूछे भाग्य सितारे, कर्मों का हिसाब कौन देगा, जब सामने हों कर्म तुम्हारे?
यही धर्म है तेरा, तो अधर्म क्या है प्यारे? निर्बल को ठुकराकर, किसको रहे पुकारे?
जीते जी इंसान को रोटी, मरने पर पकवान हज़ारे, जीवित माँ-बाप को ताने, मरघट पर आँसू खारे!
कर्मकांड की गठरी बाँधे, मन में अहंकार पसारे, अब भी समय है, चेत जा बंदे, कुकर्मों से खुद को उबारे!
परलोक सँवारने की चिंता, इस लोक को नरक बनाए, भूखे को भोजन, दुखिया को सहारा— यही धर्म है, समझ ले प्यारे!
### 😂 जब मौत आए तब डरे क्या होत है!
— सत्य, सत्ता और कालिया का महाभारत
वैर करत न डरे खुदा से, जब तक तन में जान, अब लागे प्रिय प्राण प्यारे, याद आवत भगवान!
जीवन भर तलवार चलायी, नफ़रत के हथियार, मौत सामने खड़ी हुई तो, याद आए करतार!
क्या कहा, मैं मरूँगा कालिया? मौत खड़ी है द्वार! सत्य तो अमर है प्यारे, मिट जाए अत्याचार!
तेरा क्या होगा कालिया, जब कर्मों का हिसाब होगा? कुर्सी, सत्ता, धन-दौलत का, जब पल भर में ख़्वाब होगा!
गोली मार भेजे में, हिटलर! इतना भी अभिमान न कर, सत्य दबाने निकला है तू, सत्य का अपमान न कर!
नेपोलियन हो या हिटलर, सत्ता का मद चूर हुआ, कालचक्र की एक चोट से, साम्राज्य सब दूर हुआ!
मौत से पहले मौत का डर, क्यों मन में घर कर जाता है? जिसने दुनिया को डराया, वही स्वयं घबराता है!
काल खड़ा सिर पर हँसता है, किस बात का अभिमान? तन मिट जाएगा, सत्य रहेगा, यही प्रकृति का विधान!
वैर-विरोध की आग लगाकर, कब तक राज चलाएगा? प्राण छूटते ही प्यारे, कौन तुझे बचाएगा?
इसलिए अभी चेत जा बंदे, छोड़ कपट-अभिमान, सत्य अमर है, प्रेम अमर है, मिट जाता इंसान!

