"त्रिया चरित्र" या सामाजिक संकट?
भारतीय गृहिणी, भावनात्मक रिक्तता, मानसिक स्वास्थ्य संकट, सत्संग संस्कृति और टूटते पारिवारिक संबंधों की पड़ताल
अक्षत अग्रवाल
"त्रिया चरित्र और पुरुष का भाग्य, देवता भी न जानें।"
उत्तर भारत के लोकजीवन में यह कहावत सदियों से प्रचलित है।
जब कोई स्त्री बदल जाए।
जब उसका व्यवहार समझ में न आए।
जब वह परिवार से दूर हो जाए।
जब वह अचानक किसी नए सामाजिक, वैचारिक या आध्यात्मिक संसार में प्रवेश कर जाए।
तब समाज कहता है:
"यह त्रिया चरित्र है।"
लेकिन क्या वास्तव में समस्या स्त्री के स्वभाव में है?
या फिर भारतीय समाज एक गहरे मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और पारिवारिक संकट से गुजर रहा है?
भारतीय गृहिणी का अदृश्य संसार
भारत की करोड़ों महिलाएँ:
- आर्थिक रूप से निर्भर हैं।
- बिना वेतन के घरेलू श्रम करती हैं।
- सीमित सामाजिक पहचान रखती हैं।
- परिवार के भीतर अपनी पहचान खोजती हैं।
- भावनात्मक श्रम करती हैं।
- अपने जीवन का बड़ा भाग दूसरों की आवश्यकताओं में बिताती हैं।
उनका जीवन प्रायः तीन भूमिकाओं में बीतता है:
- बेटी
- पत्नी
- माँ
लेकिन एक प्रश्न अक्सर अनुत्तरित रह जाता है:
"मैं कौन हूँ?"
भावनात्मक शून्य और पहचान का संकट
बच्चे बड़े हो जाते हैं।
पति काम में व्यस्त हो जाते हैं।
संयुक्त परिवार टूट जाते हैं।
मध्य आयु के बाद अनेक महिलाएँ स्वयं को सामाजिक और भावनात्मक रूप से अकेला अनुभव कर सकती हैं।
यह स्थिति विशेष रूप से:
- उत्तर भारत के पारंपरिक परिवारों,
- छोटे शहरों,
- कस्बों,
- मध्यमवर्गीय गृहिणियों
में दिखाई देती है।
मानसिक स्वास्थ्य संकट की भयावह तस्वीर
यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं है।
यह एक सामाजिक संकट है।
भारत
राष्ट्रीय और वैश्विक अध्ययनों के अनुसार:
- 2017 में लगभग 19 करोड़ से अधिक भारतीय किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से प्रभावित थे।
- लगभग 4.5 करोड़ लोग अवसाद से प्रभावित थे।
- लगभग 4.5 करोड़ लोग चिंता विकारों से प्रभावित थे।
- लगभग 1–2 प्रतिशत वयस्कों को सक्रिय मानसिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।
हिंदी पट्टी की स्थिति
उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में:
- मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी,
- सामाजिक कलंक,
- आर्थिक निर्भरता,
- सीमित परामर्श सुविधाएँ
स्थिति को और जटिल बनाती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न अध्ययनों में अवसाद और चिंता की दरें 20–25 प्रतिशत तक बताई गई हैं।
वैश्विक स्थिति
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार:
विश्व में एक अरब से अधिक लोग मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से प्रभावित हैं।
अवसाद और चिंता विकार वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रतिवर्ष लगभग एक ट्रिलियन डॉलर का नुकसान पहुँचाते हैं।
इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि भावनात्मक संकट अब व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक महामारी का रूप ले चुका है।
समाज ने समस्या को अनदेखा नहीं किया
समाज ने समस्या देखी।
लेकिन उसने उसका संस्थागत समाधान विकसित नहीं किया।
उसने समाधान सौंप दिया:
- धर्मगुरुओं को,
- सत्संगों को,
- बाबाओं को,
- पड़ोस की महिलाओं को,
- सामाजिक नेटवर्कों को।
जब कोई महिला भावनात्मक संकट से गुजरती है, तो अक्सर कहा जाता है:
"सत्संग में जाओ।"
"भजन करो।"
"गुरु से मिलो।"
"धर्म में मन लगाओ।"
धर्म और आध्यात्मिकता सहारा दे सकते हैं।
लेकिन क्या वे हर मनोवैज्ञानिक और वैवाहिक समस्या का समाधान हैं?
पश्चिमी समाजों का दृष्टिकोण
कई विकसित देशों में निम्न व्यवस्थाएँ सामान्य मानी जाती हैं:
- Premarital Counselling
- Marital Counselling
- Couple Therapy
- Family Therapy
- Emotional Education
- Women's Support Groups
- Midlife Counselling
- Mental Health Services
वहाँ वैवाहिक समस्याओं को मुख्यतः:
मानवीय और मनोवैज्ञानिक समस्याएँ
माना जाता है, न कि केवल आध्यात्मिक समस्याएँ।
आध्यात्मिक समूह क्यों आकर्षित करते हैं?
कई महिलाओं को वहाँ मिलता है:
- सम्मान
- पहचान
- मित्रता
- उद्देश्य
- समुदाय
- भावनात्मक सहारा
घर में अदृश्य रहने वाली महिला पहली बार स्वयं को महत्वपूर्ण महसूस कर सकती है।
लेकिन एक दूसरा खतरा भी है
कुछ आध्यात्मिक, वैचारिक या सामाजिक समूह धीरे-धीरे एक विशेष व्याख्या प्रस्तुत कर सकते हैं:
- पति तुम्हें नहीं समझता।
- परिवार तुम्हें दबाता है।
- तुम्हारी पीड़ा का कारण पितृसत्ता है।
- घर नकारात्मक है।
- केवल समूह तुम्हें समझता है।
धीरे-धीरे हर वैवाहिक तनाव को एक ही ढाँचे में समझाया जाने लगता है:
"समस्या पति है।"
क्या यह नया दोषारोपण मॉडल है?
परंपरागत समाज कहता था:
"स्त्री दोषी है।"
कुछ आधुनिक वैचारिक, चिकित्सकीय या आध्यात्मिक समूह कहते हैं:
"पुरुष दोषी है।"
दोनों दृष्टिकोण अधूरे हैं।
कई बार:
- संवाद की कमी होती है।
- परिस्थितियाँ कठिन होती हैं।
- आर्थिक तनाव होते हैं।
- प्रवास और दूरी प्रभाव डालते हैं।
- दोनों पक्षों की सीमाएँ होती हैं।
लेकिन यदि हर समस्या का निष्कर्ष यह हो:
पति समस्या है और समूह समाधान,
तो यह सावधानी का विषय है।
भावनात्मक स्थानांतरण
धीरे-धीरे प्राथमिकताएँ बदल सकती हैं।
पहले:
- परिवार,
- पति,
- बच्चे।
फिर:
- सत्संग,
- गुरु,
- आध्यात्मिक समूह,
- नया सामाजिक समुदाय।
यह प्रक्रिया अक्सर धीरे-धीरे होती है।
और कभी-कभी परिवार स्वयं को बाहरी व्यक्ति की तरह अनुभव करने लगता है।
भारत का वास्तविक संकट
समस्या केवल स्त्री की नहीं।
समस्या केवल पुरुष की नहीं।
समस्या है:
- संवादहीन विवाह।
- भावनात्मक अकेलापन।
- पहचान का संकट।
- मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा।
- संस्थागत सहायता का अभाव।
- और ऐसे सामाजिक ढाँचे जो इन समस्याओं को केवल धर्म और भाग्य के हवाले कर देते हैं।
भविष्य की चुनौती
यदि भारतीय समाज:
- वैवाहिक परामर्श,
- मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ,
- भावनात्मक शिक्षा,
- महिला सशक्तिकरण,
- पारिवारिक संवाद
को गंभीरता से नहीं लेता, तो आने वाले दशकों में पारिवारिक संकट और गहरा हो सकता है।
आध्यात्मिक संस्थाओं को भी परिवार को मजबूत करने पर बल देना चाहिए, न कि स्वयं को परिवार के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।
"त्रिया चरित्र" नहीं, भावनात्मक शून्य
हम सदियों से एक जटिल सामाजिक समस्या को एक शब्द में समेटते रहे:
"त्रिया चरित्र"
लेकिन वास्तविक प्रश्न हैं:
- क्या हमने महिलाओं को पहचान दी?
- क्या हमने विवाह को साझेदारी बनाया?
- क्या हमने मानसिक स्वास्थ्य को स्वीकार किया?
- क्या हमने भावनात्मक संवाद को महत्व दिया?
अंतिम निष्कर्ष
"त्रिया चरित्र" समस्या नहीं है।
"पुरुष चरित्र" भी समस्या नहीं है।
वास्तविक समस्या है — भावनात्मक शून्य।
जब परिवार संवाद खो देता है।
जब समाज सहायता नहीं देता।
जब संस्थाएँ अनुपस्थित रहती हैं।
तब कोई न कोई संगठन उस स्थान को भरता है।
कुछ संगठन परिवार को मजबूत करते हैं।
कुछ केवल सांत्वना देते हैं।
और कुछ परिस्थितियों में कुछ समूह स्वयं को परिवार के विकल्प के रूप में स्थापित करने लगते हैं।
भारतीय समाज को अब यह प्रश्न पूछना होगा:
क्या हम अपनी वैवाहिक और पारिवारिक समस्याओं का समाधान संवाद, परामर्श और साझेदारी से करेंगे?
या
उन्हें पूरी तरह धर्म, गुरु और सामाजिक समूहों के हवाले कर देंगे?
इसी प्रश्न पर भारतीय परिवारों का भविष्य निर्भर करेगा।
© अक्षत अग्रवाल
स्रोत: WHO, Global Burden of Disease Study, National Mental Health Survey (India), विभिन्न सार्वजनिक मानसिक स्वास्थ्य अध्ययन।