Tuesday, June 23, 2026

भूत की छाँव और जागृत आत्मा

 

भूत की छाँव और जागृत आत्मा

महादेवी वर्मा की पंक्तियों से आधुनिक मनुष्य के लिए एक चेतावनी

(नीचे महादेवी वर्मा की पंक्तियाँ इस लेख की प्रेरणा हैं।)


"बाँध लेंगे क्या तुझे, यह मोम के बंधन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?
विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?
तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना।
जाग तुझको दूर जाना।"

महादेवी वर्मा


क्या इस भवसागर में डूब जाओगे?

आज का मनुष्य समुद्र में नहीं डूबता।

वह डूबता है:

  • भावनाओं में,
  • उन्मादों में,
  • नारों में,
  • जुमलेबाजी में,
  • झूठ और फरेब में,
  • पाखंड में,
  • अंधविश्वास में।

हर युग का अपना समुद्र होता है।

कभी वह लोभ का होता है।

कभी सत्ता का।

कभी धर्म के नाम पर।

कभी विचारधारा के नाम पर।

कभी किसी बाबा के पीछे।

कभी किसी नेता के पीछे।

और कभी अपने ही मन की कल्पनाओं के पीछे।


अपनी छाया को शेरखान मत समझो

मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह अपनी ही छाया को स्वयं समझ बैठता है।

कभी:

  • पद की छाया,
  • जाति की छाया,
  • धर्म की छाया,
  • संगठन की छाया,
  • परिवार की छाया,
  • अनुयायियों की छाया।

और वह सोचने लगता है:

"मैं बहुत बड़ा हूँ।"

किन्तु महादेवी वर्मा चेतावनी देती हैं:

"तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना।"

मैं कहता हूँ:

तू अपनी भूत की छाँव को देखकर अपने को शेरखान मत समझना।

जो बीत गया, वह भूत है।

जो पद चला गया, वह भूत है।

जो प्रतिष्ठा चली गई, वह भूत है।

जो अहंकार बचा है, वह केवल छाया है।


तुम पिछले जन्म का भूत नहीं हो

भारतीय समाज में लोग अक्सर कहते हैं:

  • पिछले जन्म का कर्म,
  • पिछले जन्म का ऋण,
  • पिछले जन्म का संबंध।

लेकिन मनुष्य का वास्तविक धर्म क्या है?

तुम कोई भटकती हुई आत्मा नहीं हो।

तुम कोई अतीत का भूत नहीं हो।

तुम कोई भयग्रस्त जीव नहीं हो।

तुम जागृत आत्मा हो।


चार पुरुषार्थों की भूल

भारतीय दर्शन ने जीवन के चार उद्देश्य बताए:

  1. धर्म
  2. अर्थ
  3. काम
  4. मोक्ष

लेकिन आधुनिक मनुष्य:

  • अर्थ को लोभ बना बैठा,
  • काम को मोह बना बैठा,
  • धर्म को पहचान बना बैठा,
  • और मोक्ष को कथा बना बैठा।

वास्तविक शिक्षा यह थी:

काम और अर्थ का धर्मपूर्वक उपभोग करो।

तभी:

मोक्ष की पात्रता उत्पन्न होती है।


जागृत आत्मा कौन है?

जागृत आत्मा:

  • प्रश्न पूछती है।
  • भय से मुक्त होती है।
  • विवेक का उपयोग करती है।
  • किसी भीड़ में स्वयं को नहीं खोती।
  • किसी नारे में स्वयं को नहीं बेचती।
  • किसी गुरु में अपना विवेक समर्पित नहीं करती।

भवसागर की नई लहरें

आज की लहरें हैं:

  • सोशल मीडिया,
  • राजनीतिक उन्माद,
  • धार्मिक उत्तेजना,
  • आध्यात्मिक व्यापार,
  • पहचान की राजनीति,
  • झूठे गौरव की कथाएँ।

मनुष्य इनमें बहता जाता है।

और फिर सोचता है:

"मैं जाग गया हूँ।"

जबकि कई बार वह केवल नई नींद में प्रवेश करता है।


महादेवी की पुकार

महादेवी वर्मा ने बहुत पहले कहा था:

"जाग तुझको दूर जाना।"

यह केवल कवि की पंक्ति नहीं।

यह आत्मा का आह्वान है।

जागो।

क्योंकि:

  • भीड़ तुम्हें जगाने नहीं आएगी।
  • नारे तुम्हें मुक्त नहीं करेंगे।
  • पाखंड तुम्हें सत्य नहीं देगा।

अंतिम संदेश

क्या इस भवसागर,

भावनाओं,

उन्मादों,

नारों,

जुमलेबाजी,

झूठ,

फरेब,

पाखंड,

और अंधविश्वास में डूब जाओगे?

या फिर स्मरण करोगे:

तू न अपनी भूत की छाँव को देखकर अपने को शेरखान समझना।

तुम पिछले जन्म का भूत नहीं हो।

तुम जागृत आत्मा हो।

जो:

काम और अर्थ का धर्मपूर्वक उपभोग करके मोक्ष की अधिकारी बनती है।

और शायद यही महादेवी की "जागृति" है।


"तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना।
जाग तुझको दूर जाना।"

— महादेवी वर्मा

— अक्षत अग्रवाल

स्त्री मोह की नई कथा : "दर्शन दो घनश्याम"

 

स्त्री मोह की नई कथा : "दर्शन दो घनश्याम"

बाबा जी के युग में विरह, भक्ति और भावनात्मक व्यापार की एक व्यंग्य कथा

अक्षत अग्रवाल


"याद पिया की आए, हाए राम!"

पुराने समय में यह पंक्ति सुनकर लोग समझ जाते थे कि कोई विरहिणी अपने प्रिय की प्रतीक्षा कर रही है।

उसका पिया कहीं दूर गया है।

उसका मन व्याकुल है।

उसकी आँखें पथरा गई हैं।

लेकिन कलियुग बड़ा चतुर निकला।

उसने विरह को भी बाजार बना दिया।


बिरहन और बाबा

वह स्त्री दुखी थी।

घर था।

पर मन नहीं था।

परिवार था।

पर संवाद नहीं था।

लोग थे।

पर सुनने वाला कोई नहीं था।

वह धीरे-धीरे गुनगुनाने लगी:

"याद पिया की आए, हाए राम।"

तभी किसी ने उसे नया भजन सिखा दिया:

"दर्शन दो घनश्याम,

नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी हैं।"

अब पिया अदृश्य हो गया।

घनश्याम प्रकट हो गए।


घनश्याम कौन है?

कभी कृष्ण।

कभी गुरु।

कभी बाबा।

कभी सत्संग।

कभी कोई दिव्य बहन।

कभी कोई आध्यात्मिक परिवार।

मनुष्य का मन रिक्त स्थान पसंद नहीं करता।

जहाँ संवाद नहीं मिलता, वहाँ कल्पना प्रवेश कर जाती है।

जहाँ प्रेम नहीं मिलता, वहाँ प्रतीक आ जाते हैं।


मैंने उस बिरहन से कहा

हे मातेश्वरी!

इतनी घनश्याम भक्ति भी ठीक नहीं।

ज़रा बाहर देखो।

घनघोर काले बादल छाए हैं।

"डर लागे गरजे बदरिया।"

यह केवल वर्षा नहीं।

यह भ्रम का मौसम है।

यह अज्ञान का मौसम है।

यह भावनाओं के व्यापार का मौसम है।


देखो, बिजली भी चमक रही है

दूर कहीं बिजली कौंधी।

मैंने कहा:

"देखो बिजली डोले बिन बादल के।"

ज्ञान की बिजली है।

प्रश्नों की बिजली है।

विवेक की बिजली है।

यह कभी-कभी गिरती भी है।

और जब गिरती है तो:

  • भ्रम टूट जाते हैं,
  • मोह टूट जाते हैं,
  • मिथक टूट जाते हैं।

बाबा जी का मौसम विभाग

आजकल हर बादल को घनश्याम घोषित कर दिया गया है।

हर आँसू को भक्ति।

हर अकेलेपन को अध्यात्म।

हर पीड़ा को कर्मफल।

हर प्रश्न को अहंकार।

और हर विरोध को अज्ञान।


विरह और विवेक

विरह बुरा नहीं।

भक्ति भी बुरी नहीं।

प्रेम भी बुरा नहीं।

लेकिन जब:

  • विवेक सो जाए,
  • प्रश्न समाप्त हो जाएँ,
  • और व्यक्ति स्वयं को भूल जाए,

तब विरह मोह बन जाता है।

और मोह व्यापार बन जाता है।


मैंने कहा — घर के भीतर चलो

मैंने उस बिरहन से कहा:

हे मातेश्वरी,

बहुत घनश्याम भक्ति हो गई।

बाहर बादल हैं।

बिजली चमक रही है।

कहीं यह बिजली तेरे सिर पर भी गिर सकती है।

चलो।

घर के भीतर चलो।


घर क्या है?

घर केवल ईंट नहीं।

घर है:

  • विवेक,
  • संवाद,
  • आत्मबोध,
  • संतुलन।

यदि घर भीतर नहीं है,

तो कोई भी बादल घनश्याम बन सकता है।


अंतिम बात

कृष्ण का प्रेम आत्मा को मुक्त करता है।

मोह आत्मा को बाँधता है।

भक्ति मनुष्य को गहरा बनाती है।

आसक्ति उसे निर्भर बना देती है।

आज आवश्यकता घनश्याम के दर्शन की नहीं,

बल्कि उस बिजली की है

जो अंधेरे में क्षणभर चमककर पूछती है:

"तू किसे खोज रही है?

घनश्याम को?

या स्वयं को?"


"डर लागे गरजे बदरिया।"

"देखो बिजली डोले बिन बादल के।"

और कभी-कभी वही बिजली ज्ञान बनकर गिरती है।

— अक्षत अग्रवाल

जब धर्म सो जाता है: समुद्री मार्गों से कुरुक्षेत्र तक

 

जब धर्म सो जाता है: समुद्री मार्गों से कुरुक्षेत्र तक

"हे केशव, ऐसा नहीं कि मुझे धर्म और अधर्म का ज्ञान नहीं; पर मेरे दुर्योधन के अहंकार, प्रतिष्ठा और राज्य का प्रश्न है।"

महाभारत का यह प्रश्न आज भी जीवित है।

आज का कुरुक्षेत्र केवल युद्धभूमि में नहीं, बल्कि व्यापार मार्गों, समुद्री गलियारों, ऊर्जा बाज़ारों, संसदों, मीडिया, कॉरपोरेट बोर्डरूमों और वैश्विक राजनीति में दिखाई देता है।

पनामा नहर, स्वेज नहर और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के संकट हमें याद दिलाते हैं कि सभ्यताएँ केवल व्यापार से नहीं, बल्कि धर्मसम्मत व्यापार से टिकती हैं।

धर्म क्या है?

भारतीय दृष्टि में धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं है।

धर्म का अर्थ है—

  • संतुलन।
  • मर्यादा।
  • न्याय।
  • लोककल्याण।
  • आत्मसंयम।
  • उत्तरदायित्व।

जब व्यापार धर्म से संचालित होता है तो वह समृद्धि देता है।

जब व्यापार लोभ, भय और प्रभुत्व से संचालित होता है तो वही व्यापार अधर्म बन जाता है।

दुर्योधन की समस्या

दुर्योधन मूर्ख नहीं था।

उसे धर्म और अधर्म का ज्ञान था।

उसकी समस्या ज्ञान का अभाव नहीं थी।

समस्या थी—

अहंकार।

प्रतिष्ठा का मोह।

स्वार्थ का अंधकार।

आज भी अनेक व्यक्ति, संस्थाएँ और राष्ट्र जानते हैं कि कौन सा मार्ग न्यायपूर्ण है।

फिर भी वे उस मार्ग पर नहीं चलते क्योंकि:

  • सत्ता का मोह।
  • बाज़ार का दबाव।
  • राष्ट्रीय अहंकार।
  • वैचारिक वर्चस्व।
  • आर्थिक लालच।

इन सबने विवेक को ढक दिया है।

आत्मसम्मान और आत्मश्लाघा

कृष्ण शायद आज कहते:

"आत्मसम्मान उसी का होता है जिसकी आत्मा जागृत हो।"

सोई हुई आत्मा प्रतिष्ठा नहीं खोजती।

वह केवल प्रशंसा खोजती है।

वह सत्ता में मुजरा करती है।

वह बाजार में नारे बेचती है।

वह सभाओं में जुमले फेंकती है।

भारतीय दर्शन में इसे आत्मप्रतिष्ठा नहीं, बल्कि अहंकार, मद और आत्मश्लाघा कहा गया है।

गीता का दैवी और आसुरी संपदा का वर्णन आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

प्राचीन व्यापार मार्ग और धर्म

मसाला मार्ग टूटे।

सिल्क रूट बना।

राज्य उठे और गिरे।

चीन ने दीवार बनाई।

भारत के समुद्री नगर विकसित हुए।

सभ्यताओं ने नए मार्ग खोजे।

इतिहास हमें बताता है:

जब व्यापार मार्ग संकट में पड़ते हैं, तब राष्ट्र स्वयं को सुरक्षित करने का प्रयास करते हैं।

लेकिन भारतीय दृष्टि एक और प्रश्न पूछती है—

क्या सुरक्षा केवल शक्ति से आती है?

या

धर्म से भी?

आज का वैश्विक कुरुक्षेत्र

ऊर्जा सुरक्षा।

राष्ट्रीय हित।

व्यापारिक प्रतिस्पर्धा।

जलवायु संकट।

भू-राजनीति।

इन सबके बीच मनुष्य फिर वही प्रश्न पूछ रहा है:

"धर्म क्या है?"

यदि केवल राष्ट्रीय हित ही सर्वोच्च हो जाए तो संघर्ष बढ़ेगा।

यदि केवल लाभ सर्वोच्च हो जाए तो प्रकृति नष्ट होगी।

यदि केवल प्रतिष्ठा सर्वोच्च हो जाए तो समाज विभाजित होगा।

धर्म इन सबके बीच संतुलन का नाम है।

सज्जन की दूरी

तुलसीदास कहते हैं:

"सठ सन विनय, कुटिल सन प्रीति।"

जब व्यक्ति का विवेक मर जाता है, जब संवाद के स्थान पर केवल शोर रह जाता है, जब आत्मा के स्थान पर केवल अहंकार बोलता है, तब सज्जन व्यक्ति विवाद नहीं करता।

वह दूरी बना लेता है।

भारतीय परंपरा में ऐसे लोगों को शत्रु नहीं, बल्कि अज्ञान से आच्छादित जीव माना गया है।

उनसे घृणा नहीं।

उनसे दूरी।

उनके प्रति क्रोध नहीं।

उनके लिए करुणा।

निष्कर्ष

समुद्री मार्गों का संकट हमें केवल ऊर्जा सुरक्षा का पाठ नहीं पढ़ाता।

वह हमें महाभारत की याद दिलाता है।

दुर्योधन बाहर भी है।

दुर्योधन भीतर भी है।

कुरुक्षेत्र संसार में भी है।

कुरुक्षेत्र हमारे भीतर भी है।

और कृष्ण का प्रश्न आज भी वही है—

"क्या तुम्हारा निर्णय धर्म से प्रेरित है या केवल भय, लोभ और प्रतिष्ठा से?"

शायद यही प्रश्न भविष्य की राजनीति, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और मानव सभ्यता का भी सबसे बड़ा प्रश्न है।

दिल का दर्द निराला - मोहम्मद रफी

 

दिल का दर्द निराला - मोहम्मद रफी 

 https://youtu.be/0NglK872SWk?si=nOYzX7Qocoq62JG9 

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

जग में देखे सुख अनेकन, सबके भीतर काल कराला। आज हँसे, कल धूल समाना, माया नगर बड़ा मतवाला।

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

राजा रोये, रंक भी रोये, रोये वन के पात पियाला। सागर रोये मेघ बनाकर, रोये मन का सूना छाला।

कोई सुख ऐसा क्या जग में, जो न छिने करि काल हवाला? क्षण भर छाया, स्वप्न समाना, जीवन जल पर लिखी माला।

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

मंदिर देखा, तीर्थ भी देखे, देखे जग के मेले-थाला। मन का वन सूना ही पाया, ज्यों बिन पवन जले उजियाला।

तू न रूप, न रंग, न रेखा, नहीं तेरा कोई घर-द्वारा। फिर भी कण-कण में तू व्यापक, अंतर बैठा मौन सहारा।

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

जिनको चाहा, दूर गए सब, काल बजावे अपना ताला। मीत, सखा, परिवार, संबंधी, सबको लेना एक दिन काला।

तब मन कहे किसको अपना? कौन यहाँ है सदा रखवाला? अंतर से उत्तर यह आया— नाम तुम्हारा एक उजाला।

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

सुख की चाहत छोड़ दे मनवा, दुःख भी तेरा गुरु मतवाला। जिसने पीड़ा को पहचाना, उसने पाया सत्य निराला।

काल कराल खड़ा द्वारे पर, मिट्टी तन और साँस हवाला। जो कुछ है वह क्षण का सपना, शेष वही जो निर्गुण वाला।

दिल का दर्द निराला, हे ओंकारेश्वर, तू भी निर्गुण निराला।

जब सब दीपक बुझ जाएँगे, जब जग होगा सूना काला, तब भी भीतर नाद बचेगा—

"ॐ" अनादि, अनंत, निराला।

Monday, June 22, 2026

शाहों के शहंशाह अपरिग्रह का वह सुख, जो करोड़ों में नहीं मिलता

 

सुभाषितानि · Subhashitani
👑

शाहों के शहंशाह

अपरिग्रह का वह सुख, जो करोड़ों में नहीं मिलता

कितना धन, संपत्ति, घर-बार है सेठ करोड़ी मल त्रिवेदी के पास?

कितना शाह बहादुर सिंह के पास?

दोनों शहर के एक नंबरी और दो नंबरी रईस हैं — यह सब जानता है।

और तेरे पास?

पूरा शहर। कहीं भी जा कर रहो, कुछ भी किराए पर ले लो। रेलगाड़ी की सीट से लेकर तारों भरी छत तक — सब उपलब्ध है। आज यह शहर, कल वह बस्ती, परसों वह पहाड़।

वसुधैव कुटुम्बकम्।
यानी — पूरी पृथ्वी ही घर है।

मतलब, आप शाहों के भी शहंशाह!

हम तो समझाते रहे यही फ़लसफ़ा पंडित त्रिवेदी और शाह बहादुर दोनों को — आज जो तेरा है, कल किसी और का था। परसों किसी और का होगा। यह दुनिया किसी की मुट्ठी में कभी नहीं रही, न रहेगी। पर ऊ दोनों न माने।

"अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः।
नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः॥"— महाभारत, वनपर्व

अर्थात् — शरीर अनित्य है, वैभव शाश्वत नहीं, मृत्यु सदा निकट है। इसलिए जो करना है वह धर्म है — संग्रह नहीं।

पूरी जिंदगी "मेरा-तेरा" में निकाल दी। कागज़ात, रजिस्ट्रियाँ, तालेबंदी, मुक़दमे। और ऊपर से अपने को successful businessman कहत हैं!

हमारी नज़र में और शास्त्रों की नज़र में? यही पनौती है। यही जुमलासुर है — जो हर चीज़ पर दावा ठोंके, पर एक पल का सुकून न जाने।

जिसके पास ज़मीन है उसे रात को नींद नहीं।
जिसके पास महल है उसे चोर का डर।
जिसके पास बैंक बैलेंस है उसे कर का भय।

और तू?
निश्चिंत, निर्भार, निर्वैर।

अब यह न पूछ लेना — कौन माँ-बाप तेरे?

जिधर सिर नवा दें — वही माई-बाप हो जात हैं। जो छत मिले वही घर, जो आँगन मिले वही ब्रह्मस्थान। यही तो अपरिग्रह है, यही अनासक्ति है — जो गीता भी कहती है, जो बुद्ध भी कहते हैं, जो कबीर भी गाते हैं।

"माया महाठगिनी हम जानी।
तिरगुन फाँसि लिए कर डोलै, बोलै मधुरी बानी॥"— कबीर

सेठ जी के पास क्या है? — ईंट, पत्थर, काग़ज़।
शाह जी के पास क्या है? — लोहे के गेट, बंद तिजोरियाँ।

और तेरे पास? — खुला आसमान, खुला मन, खुला हृदय।

यही तो असली दौलत है।
बाक़ी सब किराए का सामान है — किसी और की अमानत।

जिसने मन से माया छोड़ दी —वसुधैव कुटुम्बकम् 🌍उसके लिए पूरी सृष्टि ही घर है।
वही सच्चा शाहंशाह।

राधे राधे बोलो भाई राधे राधे! थाली घंटा बजाओ — संतोष ढूँढो। गंगाजल लाऊँ क्या?

 

सुभाषितानि · व्यंग्य श्रृंखला · अक्षत अग्रवाल · Community Development ग्राम स्वराज
🔔 व्यंग्य कविता · Satirical Verse · June 2026

राधे राधे
बोलो भाई
राधे राधे!

थाली घंटा बजाओ — संतोष ढूँढो।
गंगाजल लाऊँ क्या?

दृश्य: एक सामान्य भारतीय दिन। टीवी पर जुमले। सड़क पर पनौती। अस्पताल में लाशें। चौराहे पर बेरोज़गार युवा। न्यूज़ चैनल पर शोर। और रात को — थाली-घंटा बजाओ, राधे राधे बोलो, और सो जाओ।
यह कविता उस दिन के लिए है।
पहला पड़ाव · जुमला-दर्शनसुबह उठो, चाय पियो,टीवी खोलो भाई —जुमला नंबर एक सुनो,जुमला नंबर दो सुनाई।अच्छे दिन आने वाले हैं,बस दो हफ़्ते और रुकाई।— यही सुनते-सुनतेदस साल बीत गए भाई।राधे राधे — बोलो राधे राधे!
दूसरा पड़ाव · पनौती-गिरीदोपहर हुई, खबर आई —पनौती फिर गई पधराई।क्रिकेट में हारे, बाढ़ में डूबे,मंदी ने मार लगाई।पर नहीं — यह सब विपक्ष की साज़िश,विदेशी हाथ की परछाई।हर हार का ठीकरा दूसरे पर —यही है इस युग की चतुराई।राधे राधे — बोलो राधे राधे!
तीसरा पड़ाव · मरते लोगशाम को खबर आई —अस्पताल में ऑक्सीजन नहीं,गरीब ने जान गँवाई।सड़क पर किसान लेटा है,ट्रेन तले आई।पर न्यूज़ चैनल व्यस्त है —मंदिर की नई कढ़ाई।जो मरे — वो तो मरे,विकास की रफ़्तार जाम न पाई!राधे राधे — बोलो राधे राधे!
चौथा पड़ाव · बेरोज़गार युवायुवा बैठे चौराहे पर,डिग्री हाथ में लाई।UPSC में पाँचवीं बार गए,पाँचवीं बार रुलाई।नेताजी ने समझाया —"पकौड़े तलो भाई!"MBA वाले पकौड़े तलें,यही है नई कमाई।राधे राधे — बोलो राधे राधे!
पाँचवाँ पड़ाव · महिलाओं का शोषणबेटी बचाओ का नारा लगा,पोस्टर पर तस्वीर छपाई।पर बेटी उसी पोस्टर के पीछे,खड़ी है सर झुकाई।संसद में सीटें घटाईं,मंच पर महिमा गाई।शोषण अंदर, नारा बाहर —यही है असली सफ़ाई।राधे राधे — बोलो राधे राधे!
छठा पड़ाव · थाली-घंटा समाधानरात हुई, नेताजी बोले —"थाली बजाओ, घंटा बजाओ,दीपक जलाओ भाई!"कोरोना भागेगा थाली से,यही है दवाई।और जो नहीं बजाया तो —देशद्रोही कहलाई!लाशें गिनते रहो भाई,थाली बजाते रहो भाई —थाली बजाने से वायरस जाई!राधे राधे — बोलो राधे राधे!
सातवाँ पड़ाव · संतोष और शांतिअब ढूँढो संतोष, ढूँढो शांति —मरते देखकर, लुटते देखकर,भूखे सोते देखकर।कहते हैं — "यह सब माया है,प्रभु की यही रज़ाई।"जो पूछे — वो "नकारात्मक" है,जो चुप रहे — वो "भाई।"संतोष उसका जो चुप रहे,शांति उसकी जो आँख मूँदे —बाकी सब "अर्बन नक्सल" भाई!राधे राधे — बोलो राधे राधे!
🏺 प्रतिप्रश्न · The Punchline
बावरे! तू इतने नशे में क्या बड़बड़ा रहा है?
गंगाजल लाऊँ क्या?!
— हाँ। लाओ। पर पहले पूछो —
गंगा में पानी बचा है क्या?

व्यंग्यकार का नोट: यह कविता किसी एक नेता, एक दल, या एक घटना के बारे में नहीं है। यह उस सामूहिक मानसिक अवस्था के बारे में है जहाँ हम सब कुछ देखते हैं, सब कुछ जानते हैं — और फिर भी थाली बजाकर सो जाते हैं। व्यंग्य का काम दर्पण दिखाना है, घाव करना नहीं। अगर यह कविता चुभे — तो शायद दर्पण सही जगह लगा है।
जुमला सुनो, पनौती देखो,मरते देखो, लुटते देखो —थाली बजाओ, राधे बोलो,और ढूँढते रहो शांति।
या फिर — उठो। बोलो। लिखो। अक्षत अग्रवाल · akshat08.blogspot.com · Substack @akshat08

Sunday, June 21, 2026

चाहे दादा बनके या बाबा बनके ही तू जी सकता है उत्तर भारत में, वरना कॉकरोच कहलायेगा!

 

चाहे दादा बनके या बाबा बनके ही तू जी सकता है उत्तर भारत में, वरना कॉकरोच कहलायेगा!

उत्तर भारत में पुरुष की सामाजिक वैधता, सत्ता और सम्मान का संकट

अक्षत अग्रवाल


"उत्तर भारत में यदि तुम दादा नहीं हो, बाबा नहीं हो, नेता नहीं हो, गुरु नहीं हो, मालिक नहीं हो, तो अक्सर तुम्हें कोई नहीं पूछता।"

यह वाक्य पहली बार सुनने में अतिशयोक्ति लग सकता है।

लेकिन यदि हम उत्तर भारत के सामाजिक ढाँचे को ध्यान से देखें तो एक विचित्र सत्य सामने आता है:

सामान्य व्यक्ति की सामाजिक हैसियत अत्यंत कम है।

और इसलिए वह जीवन भर किसी न किसी रूप में "दादा" या "बाबा" बनने की कोशिश करता है।


दादा कौन है?

उत्तर भारत में "दादा" केवल बड़ा भाई नहीं है।

वह है:

  • स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति,
  • निर्णयकर्ता,
  • संरक्षक,
  • नेता,
  • सत्ता का केंद्र।

कई क्षेत्रों में "दादा" सामाजिक ताकत का प्रतीक बन जाता है।


बाबा कौन है?

"बाबा" का अर्थ केवल संत नहीं है।

वह हो सकता है:

  • धार्मिक गुरु,
  • आध्यात्मिक मार्गदर्शक,
  • आश्रम प्रमुख,
  • लोकदेवता,
  • करिश्माई व्यक्तित्व।

भारतीय समाज में "बाबा" सामाजिक और आध्यात्मिक वैधता का स्रोत बन जाता है।


कॉकरोच कौन है?

कॉकरोच वह व्यक्ति है:

  • जो सत्ता में नहीं है,
  • जिसका कोई समूह नहीं,
  • जिसका कोई अनुयायी नहीं,
  • जो न नेता है,
  • न गुरु,
  • न धनपति,
  • न दबंग।

ऐसा व्यक्ति अक्सर:

  • अदृश्य,
  • महत्वहीन,
  • उपेक्षित

महसूस करता है।


उत्तर भारत का शक्ति-सिद्धांत

यहाँ सम्मान अक्सर मिलता है:

  • पद से,
  • धन से,
  • जाति से,
  • समूह से,
  • राजनीतिक शक्ति से,
  • धार्मिक प्रतिष्ठा से।

एक साधारण, ईमानदार, शांत व्यक्ति कई बार सामाजिक संरचना में अदृश्य हो जाता है।

इसलिए अनेक लोग जीवन भर:

  • दादा बनना चाहते हैं,
  • गुरु बनना चाहते हैं,
  • नेता बनना चाहते हैं।

"दादा" और "बाबा" की समानता

दोनों के पास तीन चीजें होती हैं:

1. अनुयायी

किसी को मानने वाले लोग।

2. सामाजिक वैधता

समाज कहता है:

"इनकी बात सुनो।"

3. पहचान

वे अदृश्य नहीं होते।


आधुनिक मध्यमवर्ग की त्रासदी

सबसे कठिन स्थिति उस व्यक्ति की है जो:

  • ईमानदार है,
  • पेशेवर है,
  • प्रवासी है,
  • नौकरी करता है,
  • किसी गुट में नहीं है।

वह:

  • न दादा है,
  • न बाबा है,
  • न नेता है।

ऐसा व्यक्ति कई बार अपने ही समाज में बाहरी बन जाता है।


परिवार के भीतर भी यही संघर्ष

पुरुष से अपेक्षा की जाती है:

  • कमाओ,
  • जिम्मेदारी निभाओ,
  • त्याग करो।

लेकिन सम्मान?

वह कई बार उस व्यक्ति को मिलता है:

  • जिसके पास प्रभाव है,
  • अनुयायी हैं,
  • सामाजिक शक्ति है।

यहीं से आंतरिक संकट शुरू होता है।


आध्यात्मिकता और सत्ता

भारतीय समाज में आध्यात्मिक प्रतिष्ठा भी सामाजिक पूँजी बन जाती है।

किसी व्यक्ति को यदि:

  • शिष्य मिल जाएँ,
  • अनुयायी मिल जाएँ,
  • सत्संग मिल जाए,

तो वह अचानक महत्व प्राप्त कर सकता है।

यही कारण है कि "बाबा संस्कृति" बार-बार जन्म लेती है।


क्या समाधान है?

क्या हर व्यक्ति को बाबा बनना होगा?

क्या हर व्यक्ति को दादा बनना होगा?

शायद नहीं।

लेकिन आधुनिक भारत को एक नई सामाजिक संरचना की आवश्यकता है।

जहाँ सम्मान मिले:

  • शिक्षक को,
  • वैज्ञानिक को,
  • इंजीनियर को,
  • कलाकार को,
  • देखभाल करने वाले व्यक्ति को,
  • शांत नागरिक को।

आधुनिक गुरुकुल का विचार

शायद समाधान व्यक्तिगत प्रभुत्व में नहीं, बल्कि सामुदायिक उद्देश्य में है।

यदि बीस लोग साथ रहें:

  • संगीत के लिए,
  • शिक्षा के लिए,
  • खेती के लिए,
  • पर्यावरण के लिए,
  • सेवा के लिए,

तो उन्हें किसी "दादा" की आवश्यकता नहीं होगी।

और किसी "बाबा" की भी नहीं।


अंतिम निष्कर्ष

उत्तर भारत की त्रासदी यह नहीं है कि यहाँ बहुत दादा और बाबा हैं।

त्रासदी यह है कि:

साधारण मनुष्य का सम्मान कम है।

इसलिए लोग:

  • शक्ति खोजते हैं,
  • अनुयायी खोजते हैं,
  • प्रभाव खोजते हैं।

क्योंकि उन्हें डर होता है:

यदि मैं कुछ नहीं बना, तो मैं अदृश्य हो जाऊँगा।

और शायद यही वह भय है जो उत्तर भारतीय समाज में दादा, बाबा, नेता और संरक्षकों की निरंतर आवश्यकता पैदा करता है।


"एक स्वस्थ समाज वह नहीं जहाँ हर व्यक्ति बाबा बनना चाहता हो।

एक स्वस्थ समाज वह है जहाँ साधारण मनुष्य भी सम्मान के साथ जी सके।"

— अक्षत अग्रवाल

पूरक लेख: Community Living, Modern Gurukul and the Future of Shared Purpose in India.