जन्मभूमि, भाग्य और पितृलोक
"जन्मभूमि मेरी भाग्य विधाता नहीं हो सकती"
पूर्ववर्ती लेख:
Part 2:
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जन्मभूमि मेरी भाग्य विधाता नहीं हो सकती
यह वाक्य सुनने में सरल है।
लेकिन यदि इसकी गहराई में उतरें, तो यह हजारों वर्षों की आध्यात्मिक, दार्शनिक और राजनीतिक बहस को चुनौती देता है।
मनुष्य जन्म लेते ही तीन पहचानें प्राप्त करता है—
- शरीर
- परिवार
- जन्मभूमि
लेकिन क्या इन्हीं तीनों से उसका भाग्य निर्धारित हो जाता है?
यदि ऐसा होता तो—
सभी भारतीय बुद्ध होते।
सभी भारतीय महावीर होते।
सभी भारतीय गांधी होते।
सभी भारतीय विवेकानंद होते।
और सभी भारतीय रावण भी होते।
लेकिन ऐसा नहीं है।
एक ही घर में जन्मे दो भाई अलग निकलते हैं।
एक सत्य के मार्ग पर चलता है।
दूसरा छल के।
एक करुणा चुनता है।
दूसरा हिंसा।
एक त्याग चुनता है।
दूसरा संग्रह।
फिर भाग्य कहाँ बनता है?
लूट सको तो लूट
एक संत ने कहा था—
लूट सके तो लूट, राम नाम की लूट।
मैं कहता हूँ—
लूट सको तो लूट, अध्यात्म की लूट।
लूट सको तो लूट, ज्ञान की लूट।
लूट सको तो लूट, विवेक की लूट।
क्योंकि यही वह धन है जिसे कोई राजा नहीं छीन सकता।
कोई सरकार नहीं छीन सकती।
कोई सीमा नहीं रोक सकती।
कोई जन्मभूमि सीमित नहीं कर सकती।
जिस दिन मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है,
उस दिन उसका नया जन्म होता है।
जिस दिन करुणा जागती है,
उस दिन उसका नया जन्म होता है।
जिस दिन सत्य का बोध होता है,
उस दिन उसका नया जन्म होता है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो
मनुष्य का वास्तविक जन्म अस्पताल में नहीं होता।
वह चेतना में होता है।
न जाओ सैयाँ, छुड़ा के बैयाँ
मैंने प्रभु से कहा—
हे प्रभु,
बहुत भक्ति का खुमार है दिल में।
अब क्या करूँ?
माया बोली—
न जाओ सैयाँ, छुड़ा के बैयाँ।
कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूँगी।
मैंने कहा—
तो क्या करूँ?
यहीं विवेकानंद की तरह समाधि लगा लूँ?
माया मुस्कुराई।
बोली—
भागने से समाधि नहीं मिलती।
समाधि पलायन नहीं है।
समाधि जागरण है।
विवेकानंद की समाधि
लोग समझते हैं कि समाधि का अर्थ संसार छोड़ देना है।
विवेकानंद ने ऐसा नहीं किया।
उन्होंने संसार से भागकर सत्य नहीं खोजा।
उन्होंने सत्य को खोजकर संसार में लौटाया।
उन्होंने कहा—
प्रत्येक आत्मा मूलतः दिव्य है।
यही पितृलोक का द्वार है।
पितृलोक कोई आकाशीय स्थान नहीं।
पितृलोक चेतना का स्तर है।
जहाँ मनुष्य जाति से ऊपर उठता है।
जहाँ धर्म से ऊपर उठता है।
जहाँ राष्ट्र से भी ऊपर उठकर मानवता को देखता है।
सबका स्वामी एक
वेदांत कहता है—
एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।
सत्य एक है।
ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।
कबीर कहते हैं—
राम और रहीम अलग नहीं।
नानक कहते हैं—
एक ओंकार।
विवेकानंद कहते हैं—
सभी आत्माएँ दिव्य हैं।
गांधी कहते हैं—
सत्य ही ईश्वर है।
और बुद्ध कहते हैं—
जागो।
मार्ग अलग हो सकते हैं।
किन्तु चेतना का शिखर एक ही है।
बहुत भक्ति का खुमार है दिल में
मैंने फिर कहा—
प्रभु,
बहुत भक्ति का खुमार है दिल में।
प्रभु हँसे।
बोले—
यदि भक्ति केवल भावुकता है,
तो वह नशा है।
यदि भक्ति सत्य तक ले जाए,
तो वह मुक्ति है।
यदि भक्ति तुम्हें अंधा बना दे,
तो वह बंधन है।
यदि भक्ति तुम्हें जागृत कर दे,
तो वह साधना है।
इसलिए सावधान रहो।
भक्ति और मोह में बहुत कम दूरी है।
सती बनकर बैठ जा
मैंने देखा—
मानव सभ्यता हजारों वर्षों से यही कर रही है।
किसी विचारधारा के सामने बैठ जाती है।
किसी नेता के सामने बैठ जाती है।
किसी पंथ के सामने बैठ जाती है।
किसी झंडे के सामने बैठ जाती है।
और फिर कहती है—
हम समर्पित हैं।
प्रभु बोले—
समर्पण सत्य को करो।
व्यक्ति को नहीं।
विचार को नहीं।
झंडे को नहीं।
अन्यथा एक दिन
तुम्हारी जीवित समाधि बना दी जाएगी।
और तुम्हें पता भी नहीं चलेगा।
पितृलोक की ओर यात्रा
अंततः मुझे समझ आया।
मातृभूमि जन्म देती है।
लेकिन भाग्य नहीं।
भाग्य बनता है—
ज्ञान से।
विवेक से।
करुणा से।
सत्य से।
त्याग से।
जन्मभूमि अवसर देती है।
चेतना दिशा देती है।
और पितृलोक?
पितृलोक वह अवस्था है
जहाँ मनुष्य अपने जन्म से नहीं,
अपने गुणों से पहचाना जाता है।
जहाँ सत्य राजनीति से बड़ा है।
जहाँ करुणा पहचान से बड़ी है।
जहाँ मानवता विचारधारा से बड़ी है।
जहाँ राष्ट्र सत्ता से नहीं,
मूल्यों से बनता है।
और शायद यही कारण है कि
गांधी,
बुद्ध,
महावीर,
कबीर,
नानक,
विवेकानंद,
आज भी जीवित हैं।
शरीर से नहीं।
चेतना से।
क्योंकि अंततः,
मातृभूमि जन्म देती है।
पितृलोक दिशा देता है।
जन्मभूमि अवसर देती है।
चेतना भाग्य बनाती है।
और सत्य ही वह मार्ग है जो दोनों को जोड़ता है।
