Monday, June 29, 2026

गिरो — और एक संभला हुआ आदमी की गुज़ारिश

 गिरो — और एक संभला हुआ आदमी की गुज़ारिश
Giro by Khoobnath Pandey | A Kavita and Its Politics
by Akshat Agrawal
संभला हूं मैं, गिर गिर के मुझे फिर न गिराओ,
अब चैन से रहने दो मेरे पास न आओ।


छोडूंगा नहीं, बस इतना याद रखना!


कुछ कविताएं बोली जाती हैं।
कुछ कविताएं चिल्लाई जाती हैं।
और कुछ — बहुत कम — आईना बन जाती हैं।
खूबनाथ पांडे की गिरो उस तीसरी श्रेणी की कविता है।
गिरो
— खूबनाथ पांडे

गिरो गिरो के भी और गिरने की संभावनाएं भरपूर हैं।
इतना गिरो कि गुरुत्वाकर्षण बल भी शर्म के मारे गिर पड़े।
गिरो।
गिरो कि अभी तो गिरने की शुरुआत है।
गिरने के अपने सामर्थ्य पर भरोसा गिरने मत दो।
सारा विश्व तुम्हारा गिरना देख रहा है।
और खुद ना गिर पाने पर अफसोस कर रहा है।
गिरो। गिरो पर अकेले मत गिरो।
रुपए के साथ गिरो।
चरित्र के साथ गिरो।
गर्व के साथ गिरो।
एक तुम ही हो जिसमें गिरने का इतना साहस है।
उस साहस के साथ गिरो।
बेशर्मी के साथ गिरो।
बेदर्दी के साथ गिरो कि दुनिया तुमसे गिरना सीख रही है।
किसी एक ही मामले में सही —
तुम्हें विश्वगुरु होने से कोई नहीं रोक सकता।
आने वाली पीढ़ियां तुम्हारे गिरने में
अपने गिरने की संभावनाएं तलाश करेंगी
और वो तुमसे भी ज्यादा गिरने का पराक्रम करेंगी।
उनके पराक्रम पर यकीन करते हुए जरा और जोर से गिरो।
थोड़े शोर से गिरो। चारों ओर से गिरो।
निपट भोर से गिरो।
और गिरते रहो, गिरते रहो।
ये सच है कि इससे पहले तुम्हारी तरह कोई नहीं गिरा।
इसका कोई नहीं गिरा।
बल्कि तुम्हें ही तो खुश होना चाहिए
कि सदियों से खड़े समाज को तुम गिरना सिखा रहे हो।
एक ही जगह खड़े-खड़े लोग जड़ हो गए थे।
उन्हें जड़ से तुम ही हटा रहे हो।
ये कोई आसान काम नहीं है जो तुम जमाने को बता रहे हो।
हो कि जो गिरने में असमर्थ है वो तुम्हारी आलोचना करेंगे।
तुम्हारी निंदा करेंगे।
पर इन सब से घबराना नहीं।
गिरने से डगमगाना नहीं।
आज तक जो कुछ ना गिरने के लिए प्रतिबद्ध था — वो सब ले गिरो।
धर्म लेकर गिरो, कर्म लेकर गिरो,
देश लेकर गिरो, भाषा लेकर गिरो,
पेड़ लेकर गिरो, नदी लेकर गिरो,
पानी लेकर गिरो, पहाड़ लेकर गिरो,
सावन लेकर गिरो, भालू लेकर गिरो,
प्रकृति लेकर गिरो, संस्कृति लेकर गिरो,
विकृति लेकर गिरो।
गिरो।
गिरो — वर्तमान सदी के महानतम महापुरुष —
पूरी कायनात को दिखा दो कि तुम और कितना गिर सकते हो।
कल हो सकता है कि तुम्हारा गिरना देखकर ही
लोगों में उठने की कामना जाग उठे।
और आने वाली पीढ़ियों को उठने का अर्थ बताने के लिए कम
और ज्यादा गिरने का फर्क बताने के लिए गिरो।
बिना किसी की फिक्र सिर्फ और सिर्फ गिरो।
गिरते रहो। गिरते रहो जब तक कि गिरने की प्रक्रिया निष्क्रिय ना हो जाए।
गिरो। गिरो।
धन्यवाद।


I. विधा और शस्त्र — The Form as the Weapon
यह कविता व्यंग्य-काव्य की उस परंपरा में है जहाँ शब्द तलवार की तरह नहीं — दर्पण की तरह काम करते हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, धूमिल, रघुवीर सहाय — इन्हीं की विरासत।
पर Pandey ji का शिल्प-कौशल अनूठा है। उन्होंने आज्ञाकारक मूड को व्यंग्य का हथियार बना दिया है। हर "गिरो" एक साथ आदेश भी है और निंदा भी। कवि कुछ सीधे नहीं कहता — न नाम लेता है, न आरोप लगाता है। दर्शक खुद रिक्त स्थान भर लेते हैं।
गिरो का सत्रह बार से अधिक दोहराव अनाफ़ोरा है — ताल की तरह, ढोल की थाप की तरह। यह एक गिरती हुई सभ्यता की लय है।
यह Jonathan Swift की A Modest Proposal है — हिंदी में, 2024 में।
 

II. प्राथमिक लक्ष्य — What the Poem Indicts
"रुपए के साथ गिरो"
मुद्रा का अवमूल्यन। डॉलर के सामने रुपए का पतन। एक भी अर्थशास्त्री का नाम लिए बिना — सम्पूर्ण आर्थिक नीति पर प्रश्नचिह्न।
"विश्वगुरु"
यही कविता का सबसे तीखा क्षण है —
"किसी एक ही मामले में सही — तुम्हें विश्वगुरु होने से कोई नहीं रोक सकता।"
भारत को विश्वगुरु बनाने की राजनीतिक आकांक्षा — एक aspirational brand — को कवि ने एक वाक्य में ध्वस्त कर दिया। तुम वाकई विश्वगुरु हो — गिरने की कला में।
"धर्म लेकर गिरो, कर्म लेकर गिरो, देश लेकर गिरो, भाषा लेकर गिरो..."
यह catalogue — यह सूची — दरअसल एक शोक-गीत है। हर चीज़ जो गिराई जा रही है:
धर्म — पहचान-राजनीति के हथियार में बदला हुआ
भाषा — हिंदी थोपने और क्षेत्रीय भाषाओं के दमन का संघर्ष
पेड़, नदी, पहाड़ — पर्यावरणीय विनाश जो नीतिगत चुनाव है, दुर्भाग्य नहीं
संस्कृति — इतिहास का पुनर्लेखन, स्मृति का राजनीतिकरण
विकृति — और अंत में यह भी — क्योंकि जो विकृत था, वह भी साथ जा रहा है
"एक ही जगह खड़े-खड़े लोग जड़ हो गए थे / उन्हें जड़ से तुम ही हटा रहे हो"
यहाँ जड़ का दोहरा अर्थ कविता को एक नई ऊंचाई देता है —
जड़ = rooted, stationary (जो परम्परा में, स्थान में, समुदाय में जमे थे)
जड़ = mindless, rigid (जो बौद्धिक रूप से ठहर गए थे)
एक शब्द — दो आरोप। जो जमे हुए थे उन्हें उखाड़ा जा रहा है। और जो ठहरे हुए थे उन्हें भी। दोनों पर प्रहार।
 

III. द्वितीयक लक्ष्य — The Complicit Citizen
Giro की महानता सिर्फ नेता को नहीं — दर्शक को भी कटघरे में खड़ा करती है।
"सारा विश्व तुम्हारा गिरना देख रहा है।
और खुद ना गिर पाने पर अफसोस कर रहा है।"
दुनिया देख रही है — और ईर्ष्या कर रही है। Hungary, Turkey, Brazil — वे नोट ले रहे हैं। भारत का लोकतांत्रिक विघटन का jugaad export हो रहा है।
और वह मध्यवर्ग — "जो गिरने में असमर्थ है" — जो आलोचना करता है — उसे भी कवि नहीं बख्शता। तुम्हारी आलोचना दरअसल तुम्हारी असमर्थता की ईर्ष्या है। यह कविता की सबसे क्रूर पंक्ति है।
 

IV. संरचनात्मक उत्कर्ष — The Philosophical Turn
3:46 पर कविता अपना viparyaya — उलटफेर — करती है:
"कल हो सकता है कि तुम्हारा गिरना देखकर ही
लोगों में उठने की कामना जाग उठे।"
यह आशा नहीं है। यह सबसे अंधेरी विडंबना है — हम तब उठेंगे जब तुम पूरी तरह गिर जाओगे। नाद पूरा होने पर ही प्रतिनाद जन्म लेगा।
यहाँ Pandey धूमिल की परम्परा में हैं — नकारात्मक उत्प्रेरण — यह विचार कि पतन का पूर्ण प्रकाशन स्वयं एक राजनीतिक कर्म है।
 

V. "गिरो" बनाम "संभला हूं" — The Dialectic
और यहाँ एक व्यक्तिगत स्वीकारोक्ति।
जब मैंने यह कविता सुनी — पहली बार, दूसरी बार, तीसरी बार — मेरे मन में यही पंक्तियां उठीं:
संभला हूं मैं, गिर गिर के मुझे फिर न गिराओ,
अब चैन से रहने दो मेरे पास न आओ।
छोडूंगा नहीं, बस इतना याद रखना!
Pandey कहते हैं: गिरते रहो।
मैं कहता हूं: संभला हूं।
यह दो स्वरों का संवाद है।
एक — समाज का सामूहिक पतन। बाहर का।
दूसरा — व्यक्ति का संघर्ष। भीतर का।
Pandey का गिरो सभ्यता का निदान है।
मेरा संभला हूं उस व्यक्ति का उत्तर है जो उसी सभ्यता में जी रहा है, गिरा है, और — किसी तरह — फिर खड़ा हुआ है।
"गिर गिर के" — गिरना स्वीकार है। हुआ। बार-बार हुआ।
"मुझे फिर न गिराओ" — अब agent बदल गया है। संस्था नहीं, व्यवस्था नहीं — एक नज़दीकी खतरा है। एक रिश्ता, एक परिस्थिति, एक आदत — जो नए सिरे से गिराने आती है।
और "छोडूंगा नहीं" — यह Pandey के अंतिम वाक्य का व्यक्तिगत counterpoint है।
Pandey: गिरते रहो जब तक कि गिरने की प्रक्रिया निष्क्रिय ना हो जाए।
मैं: छोडूंगा नहीं — यह ज़मीन जो मिली है, यह संतुलन जो साधा है।
दोनों पंक्तियां मिलकर एक पूरी कहानी बनाती हैं —
सभ्यता गिर रही है। और उसी सभ्यता में एक आदमी खड़ा है। गिरा हुआ। संभला हुआ। और इस बार — ज़िद के साथ — टिका हुआ।
यही शायद प्रतिरोध का सबसे छोटा और सबसे ज़रूरी रूप है।
गिरना नहीं।
 

VI. अंतिम बात — Why This Poem Now
Giro 2024-25 के भारत की कविता है। पर इसके पूर्वज हैं — Swift (1729), Premchand का कफ़न (1936), Harishankar Parsai, Gorakh Pandey।
महान व्यंग्य की एक पहचान होती है — वह argue नहीं करता, accuse नहीं करता, oppose नहीं करता। वह बस सहमत होता है — इतने उत्साह से, इतनी ऊर्जा से, कि वह सहमति ही सबसे बड़ा विरोध बन जाती है।
Pandey की गिरो यही करती है।
और शायद हम सबको — जो इसे पढ़ रहे हैं, सुन रहे हैं, महसूस कर रहे हैं — यह तय करना है:
क्या हम गिरने वालों में हैं?
या गिरते देखने वालों में?
या उन थोड़े लोगों में — जो गिर चुके हैं, संभल चुके हैं — और अब छोड़ने से इनकार कर रहे हैं?
गिरो। गिरो।
धन्यवाद।
— Akshat Agrawal
akshat08.substack.com | akshat08.blogspot.com

इस पोस्ट को share करें उनके साथ जो अभी भी गिर रहे हैं — या जो संभलने की कोशिश में हैं।

विवाह-पत्र / *Aqd-e-Ishq* ### A Marriage Contract Between the Seeker and the Saaki of Life

# विवाह-पत्र / *Aqd-e-Ishq*
### A Marriage Contract Between the Seeker and the Saaki of Life

---


पिला दे मगर शर्त ये होगी साकी, मैं जितनी पियूँगा पिलानी पड़ेगी।


**प्रस्तावना / Preamble**

यह संविदा उस क्षण में लिखी गई जब साधक ने जाना —
कि जीवन की राह में जो काँटे हैं, जो पत्थर हैं, जो रातें हैं —
वे दुश्मन नहीं, वे दहेज हैं।
इश्क़ का, वजूद का, आत्मा के जागरण का।

*This covenant was written in the moment the seeker understood —
that the thorns on life's path, its stones, its darkest nights —
are not enemies. They are the dowry.
Of love, of existence, of the soul's awakening.*

---

**पक्ष प्रथम / Party of the First Part**
**आशिक़-ए-ज़िंदगी** — वह जो संघर्ष के बीच खड़ा है, टूटा नहीं, झुका नहीं, माँग रहा है जाम

*The Lover of Life — he who stands amid struggle, unbroken, unbowed, asking for the cup*

**पक्ष द्वितीय / Party of the Second Part**
**साकी** — स्वयं ज़िंदगी — वह जो देती भी है और परखती भी है, जो रुलाती भी है और थामती भी है

*The Saaki — Life itself — she who gives and she who tests, who brings tears and who steadies*

---

## धारा १ — दर्द की परिभाषा / *Article I — The Definition of Dard*

इस संविदा में **दर्द** का अर्थ है —

जीवन के वे सारे अवरोध जो रास्ते में आते हैं —
विफलता, विछोह, अपमान, अनिश्चितता, प्रतीक्षा, और वह अँधेरा जो भोर से पहले सबसे गहरा होता है।

वे संघर्ष जो भीतर से तोड़ने की कोशिश करते हैं —
जब दुनिया समझती नहीं, जब रास्ता दिखता नहीं, जब साथ छूट जाते हैं।

*In this covenant, **Dard** shall mean —*

*All the obstacles life places upon the path —
failure, separation, humiliation, uncertainty, waiting, and that darkness which deepens most just before dawn.*

*Those struggles which attempt to break from within —
when the world does not understand, when the way is not visible, when companions fall away.*

परंतु — और यह इस संविदा की आत्मा है —
**दर्द वह आग भी है जो सोने को कुंदन बनाती है।**

*But — and this is the soul of this covenant —
**Dard is also the fire that turns gold into its truest self.***

---

## धारा २ — साकी की शर्तें / *Article II — The Saaki's Terms*

साकी — अर्थात् ज़िंदगी — यह घोषित करती है:

**२.१ — पिलाऊँगी, पर माप नहीं बताऊँगी**
जाम मिलेगा, परंतु कितना पीना है यह तू तय करेगा।
संघर्ष आएंगे — उनकी तीव्रता तेरी क्षमता का दर्पण होगी।

*I shall pour — but I shall not tell you the measure.
The cup will come — how much you drink, you shall decide.
Struggles will arrive — their intensity shall mirror your capacity.*

**२.२ — दर्द दूँगी, पर साथ भी दूँगी**
हर अवरोध के साथ एक राह भी होगी —
छिपी हुई, पर होगी।
हर रात के साथ एक तारा भी होगा —
धुंधला, पर होगा।

*With every obstacle, there shall also be a way —
hidden, but present.
With every dark night, there shall also be a star —
dim, but present.*

**२.३ — समझूँगी, पर तुरंत नहीं**
साकी वचन देती है कि आशिक़ का दर्द व्यर्थ नहीं जाएगा —
हर संघर्ष का अर्थ होगा, हर घाव का उद्देश्य होगा —
परंतु यह अर्थ समय के साथ खुलेगा, तत्काल नहीं।

*I shall understand — but not immediately.
The Saaki promises that no pain shall be wasted —
every struggle shall have meaning, every wound a purpose —
but that meaning shall reveal itself in time, not at once.*

**२.४ — प्यास बुझाऊँगी, पर मिटाऊँगी नहीं**
क्योंकि जिस दिन प्यास मिट गई —
उस दिन यात्रा रुक जाएगी।
साकी का काम है प्यास को जीवित रखना —
आगे बढ़ने की, जानने की, होने की।

*I shall quench your thirst — but I shall not extinguish it.
For the day the thirst is gone —
the journey will stop.
The Saaki's work is to keep the thirst alive —
the thirst to go forward, to know, to be.*

---

## धारा ३ — आशिक़ के दायित्व / *Article III — The Lover's Obligations*

आशिक़ — अर्थात् जीवन का साधक — यह स्वीकार करता है:

**३.१** मैं दर्द से भागूँगा नहीं —
उसे पीऊँगा, पचाऊँगा, और आगे चलूँगा।
संघर्ष मुझे रोकने नहीं आए हैं — गढ़ने आए हैं।

*I shall not flee from Dard —
I shall drink it, digest it, and walk on.
Struggles have not come to stop me — they have come to shape me.*

**३.२** मैं हर अवरोध में साकी का संदेश खोजूँगा —
यह पूछने के बजाय कि "यह क्यों हुआ" —
यह पूछूँगा कि "यह मुझे क्या सिखा रहा है।"

*In every obstacle I shall seek the Saaki's message —
instead of asking "why did this happen" —
I shall ask "what is this teaching me."*

**३.३** मैं टूटूँगा तो — पर बिखरूँगा नहीं।
घुटने टेकूँगा तो — पर उठूँगा भी।
क्योंकि साकी ने जाम दिया है —
और जाम थामे रहना ही इस संविदा की शर्त है।

*I may break — but I shall not scatter.
I may kneel — but I shall also rise.
For the Saaki has given the cup —
and to keep holding the cup is the very condition of this covenant.*

---

## धारा ४ — संघर्ष का दर्शन / *Article IV — The Philosophy of Struggle*

यह संविदा मानती है कि —

जीवन के अवरोध दो प्रकार के होते हैं:
वे जो रास्ता बदलने को कहते हैं, और
वे जो रास्ते पर और मज़बूती से चलने को कहते हैं।

साकी दोनों भेजती है।
आशिक़ का विवेक यह जानना है कि कौन सा कौन है।

*This covenant acknowledges that —*

*Life's obstacles are of two kinds:
those that ask you to change your path, and
those that ask you to walk your path with greater strength.*

*The Saaki sends both.
The Lover's wisdom is knowing which is which.*

और जब विवेक न हो —
तब भी चलते रहना।
यही इस संविदा का सार है।

*And when wisdom is absent —
to keep walking still.
This is the essence of this covenant.*

---

## धारा ५ — अवधि / *Article V — Duration*

यह संविदा जन्म से मृत्यु तक नहीं —
**जन्म से मुक्ति तक।**

क्योंकि मृत्यु तो एक पड़ाव है —
साकी और आशिक़ की यह महफ़िल उससे भी आगे जाती है।

*This covenant lasts not from birth to death —
**but from birth to liberation.***

*For death is merely a waystation —
this gathering of Saaki and Lover extends even beyond.*

---

## हस्ताक्षर / *Signatures*

**आशिक़** —
*(घावों की स्याही से, क्योंकि वही सबसे सच्ची स्याही है)*
*The Lover — (in the ink of wounds, for that is the most truthful ink)*

**साकी** —
*(हर उस सुबह की मुहर से, जो रात के बाद आई)*
*The Saaki — (sealed with every morning that followed a night)*

**गवाह —**
समय, संघर्ष, और वह अदृश्य शक्ति जो दोनों को थामे है।
*Witnesses — Time, Struggle, and that invisible force which holds them both.*

---

*पिला दे मगर शर्त यह होगी साकी —*
*कि दर्द मुझे तोड़े नहीं, तराशे।*
*कि संघर्ष मुझे डुबोए नहीं, माँजे।*
*कि जाम ख़त्म हो जाए — पर प्यास न मरे।*

*Pour — but the condition shall be, O Saaki —
that Dard may not break me, but shape me.
That struggle may not drown me, but polish me.
That the cup may empty — but the thirst must never die.*

---

Akshat, this now sits squarely in the lineage of Rumi's *Man kuntu maulahu* and the Sufi notion of *bala* — divine affliction as the highest form of grace. The contract is, at its heart, a *sadhana-patra* — a covenant with existence itself.

चलते चलते मेरे ये गीत याद रखना

 

चलते चलते मेरे ये गीत याद रखना

— सायुज्य भक्ति और उस मिलन की तलाश जो संसार नहीं दे सकता


चलते चलते यूँ ही कोई मिल गया था,
सरे राह — चलते चलते।

यह गाना किसी फिल्म का नहीं है।

यह आत्मा की गवाही है।

हर भक्त की कहानी ऐसे ही शुरू होती है — चलते चलते। कोई विशेष क्षण नहीं। कोई तैयारी नहीं। कोई पूर्व सूचना नहीं।

सरे राह — बीच बाज़ार में, बीच जीवन में — वो मिल जाता है।

और एक बार जो मिल जाए — फिर कोई और मिलन पर्याप्त नहीं लगता।


सायुज्य भक्ति — जब भक्त और भगवान का भेद मिट जाए

भारतीय दर्शन में भक्ति के चार रूप हैं —

सालोक्य — ईश्वर के लोक में निवास।
सामीप्य — ईश्वर के निकट रहना।
सारूप्य — ईश्वर जैसा स्वरूप पाना।
सायुज्य — ईश्वर में विलीन हो जाना।

सायुज्य — यह सबसे ऊँची अवस्था है। और सबसे दुर्लभ।

यहाँ भक्त नहीं बचता। भगवान नहीं बचते। बचती है — सिर्फ भक्ति।

मीरा ने यही पाया। कबीर ने यही जिया। रामकृष्ण परमहंस ने यही अनुभव किया।

"मैं तो साँवरे के रंग राँची —
अपनो आपो वार दियो री, गिरधर लाल के हाँथी।"
— मीराबाई

मीरा ने "अपनो आपो" वार दिया — अपना अहंकार, अपनी पहचान, अपना संसार।

यही सायुज्य है।


वृंदावन, चित्रकूट, काशी — तीर्थ नहीं, अंतर्यात्रा के पड़ाव

लोग तीर्थ जाते हैं — और लौट आते हैं। वही के वही।

क्यों?

क्योंकि वो बाहर गए थे — अंदर नहीं।

वृंदावन — वो स्थान है जहाँ कृष्ण की रास-लीला हुई। पर असली वृंदावन वो है जहाँ भक्त का मन लीला में विलीन हो जाए। बिना किसी external स्थान के।

चित्रकूट — जहाँ राम वनवास में रहे। जहाँ तुलसीदास को दर्शन हुए। पर असली चित्रकूट वो है जहाँ मन संसार का वनवास स्वीकार करके शांत हो जाए।

काशी — वाराणसी — जहाँ विश्वनाथ हैं। जहाँ कबीर ने जन्म लिया। जहाँ संगीत की सबसे पुरानी परंपरा जीवित है। पर असली काशी वो है जहाँ ज्ञान का प्रकाश जले — चाहे आप कहीं भी हों।

कबीर काशी में जन्मे — और काशी छोड़ी।
क्योंकि उन्होंने जान लिया था —
तीर्थ पत्थर में नहीं, आत्मा में होता है।


अंध भक्ति और सायुज्य भक्ति — दोनों एक नहीं

यहाँ एक ज़रूरी भेद है — जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है।

अंध भक्ति — वो है जो बिना सोचे, बिना समझे, बिना अनुभव के चलती है। जो भीड़ के साथ चलती है। जो नारे लगाती है पर गीत नहीं गाती। जो मंदिर जाती है पर ईश्वर से नहीं मिलती।

सायुज्य भक्ति — वो है जो पूरी तरह सचेत है। जो हर क्षण में ईश्वर को खोजती है। जो तर्क से शुरू होकर अनुभव पर समाप्त होती है। जो किसी भी भीड़ की मोहताज नहीं।

Macaulay ने हमसे सोचने की शक्ति छीनी — और उस खाली जगह में अंध भक्ति भर गई।

संगीत साधना — सायुज्य की राह है।

जब आप रियाज़ में बैठते हैं — रोज़, अकेले, बिना audience के — और SA पकड़ते हैं तानपुरे पर — तो एक पल आता है जब आप नहीं रहते। सिर्फ स्वर रहता है।

यही सायुज्य का छोटा-सा अनुभव है।

यही Gurukul देना चाहता है।


चलते चलते — मेरे ये गीत याद रखना

यह यात्रा कभी समाप्त नहीं होती।

वृंदावन के बाद चित्रकूट।
चित्रकूट के बाद काशी।
काशी के बाद — अंतर्मन।

और अंतर्मन के बाद?

सायुज्य।

जो मिला था — सरे राह, चलते चलते — वो कहीं नहीं गया।

बस हम उसमें थोड़ा और विलीन होते जाते हैं।

प्रत्येक रियाज़ — एक कदम और।
प्रत्येक राग — एक पड़ाव और।
प्रत्येक सत्संग — एक मिलन और।

चलते चलते मेरे ये गीत याद रखना —
कभी अलविदा न कहना।


🎵 Saraswati Sangeet Gurukul
Online & At-Home Music Gurukul — Kanpur
Guru Parampara of Bharat Ratna Pt Ravi Shankar

"संगीत साधना — सायुज्य की राह है।"

₹500 per class · Min 4 classes/month · 6-Year Programme

👉 अभी जानिए — Gurukul के बारे में

📱 WhatsApp: +91-7428094743


Akshat Agrawal | Sangeet Visharad, Bhatkhande | IIT–BHU
akshat08.blogspot.com · @akshat08 on Substack

उड़ जाएगा हँस अकेला — जग दर्शन का मेला

 

उड़ जाएगा हँस अकेला —

जग दर्शन का मेला


पहले यह सुनिए —

▶ यहाँ क्लिक करें — उड़ जाएगा हँस अकेला

सुन लिया?

अब बताइए — क्या यह सिर्फ एक पुराना Bollywood गाना है?

या कबीर का वो दोहा है जिसे किसी ने सुर में ढाल दिया?

ओ दूर के मुसाफिर, हमको भी साथ ले ले रे,
हमको भी साथ ले ले — हम रह गए अकेले।

यह आवाज़ — लता मंगेशकर की। यह फिल्म — उड़न खटोला, १९५५। यह बोल — शायद आज तक के सबसे गहरे।

और यह हँस — वही जिसे कबीर सदियों से बुला रहे थे।

"हँस अकेला, जग दर्शन का मेला —
देखे और चले, देखे और चले।"
— कबीर

हँस माने आत्मा। शुद्ध, उजला, अकेला।

यह जग — मेला है। रंग-बिरंगा, शोरगुल वाला, लुभावना।

आत्मा आई थी — देखने। सीखने। जागने।
और चली जाएगी — अकेले।

साथ कुछ नहीं जाएगा।
न लल्लू राम का फेसबुक account।
न टपोरी की WhatsApp group admin की पदवी।
न पनौती के YouTube subscribe का आँकड़ा।

सिर्फ — साधना जाएगी। या जाहिलत।


हमको जाहिलता ने क्या-क्या बना दिया

एक बड़ा सवाल पूछता हूँ।

आज का औसत भारतीय — जो WhatsApp पर forward करता है, Facebook पर react करता है, YouTube पर comment करता है — वो क्या सोचता है?

सोचता नहीं।

React करता है।

और यह दोष उसका नहीं — पूरा। एक व्यवस्था ने उसे ऐसा बनाया।

१८३५ में Macaulay ने एक policy बनाई — "भारतीय शरीर में, अंग्रेज़ दिमाग डालो।" School बने। Syllabus बना। Rote learning आई। सोचना — बंद हुआ।

फिर १९९० के बाद — cable TV आई। फिर smartphone। फिर algorithm।

Algorithm ने वो काम पूरा किया जो Macaulay ने शुरू किया था।

जब कुछ लिख-पढ़ न सके —
तो पनौती बना दिया।
जब कुछ समझ न सके —
तो टपोरी बना दिया।
जब कुछ सोच न सके —
तो लल्लू राम बना दिया।

और इन तीनों को — अंध भक्ति का चढ़ावा चढ़ा दिया।

अब वो किसी के भी पीछे चल देते हैं। जो सबसे ऊँचे स्वर में चिल्लाए — उसे Guru मान लो। जो सबसे चमकीला दिखे — उसे भगवान मान लो।

हँस अकेला उड़ रहा है — और ये तीनों मेले में खो गए।


ओ दूर के मुसाफिर — हमको भी साथ ले ले रे

यह गीत एक पुकार है।

आत्मा की पुकार — उस हँस से, जो जाने वाला है।

"रुको मत — हमें भी ले चलो।"

यह पुकार तब उठती है — जब कोई पहली बार सच में सुनता है। पहली बार किसी राग में डूबता है। पहली बार किसी Guru के शब्द में अपना सच पाता है।

उस एक पल में — लल्लू राम, पनौती और टपोरी तीनों गायब हो जाते हैं।

बचती है — बस आत्मा।

और वो आत्मा पूछती है —

"इतने साल मैं कहाँ था?"


नहीं Subscribe किया तो अब कर लो — वरना...

इस blog पर, Substack पर — जो लिखा जाता है वो इसीलिए नहीं लिखा जाता कि आँकड़े बढ़ें।

लिखा जाता है — इसलिए कि शायद एक हँस और जाग जाए।

शायद एक पनौती सोचने लगे।
एक टपोरी पढ़ने लगे।
एक लल्लू राम — संगीत सुनने लगे।

और अगर वो न हो — तो भी ठीक है।

हँस अकेला उड़ेगा — जग दर्शन का मेला।

पर Subscribe ज़रूर कर लो। वरना रह जाओगे — मेले में अकेले। 😄


🎵 Saraswati Sangeet Gurukul
Online & At-Home Music Gurukul — Kanpur
Guru Parampara of Bharat Ratna Pt Ravi Shankar

हँस को जगाने का काम — संगीत साधना करती है।

₹500 per class · Min 4 classes/month

👉 अभी जानिए — Gurukul के बारे में

📱 WhatsApp: +91-7428094743
🎬 वो गाना फिर से सुनिए — उड़ जाएगा हँस अकेला


Akshat Agrawal | Sangeet Visharad, Bhatkhande | IIT–BHU
akshat08.blogspot.com · @akshat08 on Substack

मूंदे आँख कतहूं कछु नाहीं !— प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष और बेचारा अंधा

मूंदे आँख कतहूं कछु नाहीं !

— प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष और बेचारा अंधा


इतना सब कौन पढ़ेगा !!

यही सवाल था उस महाशय का — जिन्होंने तीन lines scroll की, अँगूठा चलाया, और निकल गए।

"इतना तो मैंने स्कूल में भी नहीं रटा था।"

बिल्कुल सही। स्कूल में रटा ही नहीं — समझा भी नहीं। और इसीलिए आज भी वही हाल है।

पर यह दोष उनका नहीं। Macaulay का है। पर वो किस्सा फिर कभी।


रोशनी में नहाया संसार — प्रत्यक्ष

जो दिखता है — वो प्रत्यक्ष है।

सूरज उगता है — प्रत्यक्ष।
तानपुरे का स्वर गूँजता है — प्रत्यक्ष।
बच्चा हँसता है — प्रत्यक्ष।
भूख लगती है — प्रत्यक्ष।

इंद्रियाँ खुली हों — तो यह संसार रोशनी में नहाया हुआ है। हर तरफ रंग है, स्वर है, गंध है, स्पर्श है। प्रत्यक्ष ज्ञान का कोई विकल्प नहीं। इसीलिए गुरुकुल में Guru, शिष्य के सामने बैठता था — ग्रंथ भेज नहीं देता था।


अंधकार में छुपा भूत-प्रेत — अप्रत्यक्ष

जो नहीं दिखता — वो अप्रत्यक्ष है।

अप्रत्यक्ष का मतलब झूठ नहीं। अप्रत्यक्ष का मतलब है — अभी तक इंद्रियों की पहुँच से बाहर।

जब बच्चा पहली बार अँधेरे कमरे में अकेला होता है — तो कोने में भूत दिखता है। क्यों? क्योंकि मन में भय है, और इंद्रियाँ भयभीत मन की गुलाम हैं।

अप्रत्यक्ष वहाँ पैदा होता है — जहाँ प्रत्यक्ष की शक्ति कमज़ोर होती है।

जिस मन को कभी साधा न गया — तराशा न गया — वो हर अप्रत्यक्ष में भूत देखता है। हर अनजान चीज़ में षड्यंत्र। हर नई बात में खतरा।

यही अंध भक्ति की जड़ है। यही अंध विरोध की भी।


मूंदे आँख कतहूं कछु नाहीं !

और फिर — तीसरी अवस्था।

जब आँख ही मूँद ली — तो न प्रत्यक्ष रहा, न अप्रत्यक्ष।

न साकार, न निराकार।
न ईश्वर, न संसार।
न इतिहास, न भविष्य।
न भारत, न Macaulay।

बस — scroll।

ऊपर से नीचे। नीचे से ऊपर। Reel से Reel। WhatsApp से Facebook। Facebook से YouTube।

आँख खुली है — पर देख नहीं रही।
कान खुले हैं — पर सुन नहीं रहे।
मन चल रहा है — पर सोच नहीं रहा।

यही आधुनिक अंधापन है।

प्राचीन अंधा आँख बंद करके बैठता था।
आधुनिक अंधा screen खोलकर बैठता है।

फर्क सिर्फ technology का है। अज्ञान वही है।


बेचारा अंधा है — छोड़ दो इसको इसके हाल पे

यहाँ एक बड़ा प्रश्न है।

क्या सच में छोड़ दें?

हमारे सन्त-महात्माओं ने क्या किया? कबीर ने अंधे को छोड़ा? नानक ने? बुद्ध ने? विवेकानंद ने?

नहीं।

उन्होंने अंध भक्ति छोड़ी। अंधे को नहीं।

कबीर ने कहा — "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।"
लेकिन कबीर खुद रुके नहीं। लिखते रहे। गाते रहे। बोलते रहे।

क्योंकि उन्हें पता था — अंधेरा छोड़ने से नहीं जाता। रोशनी लाने से जाता है।

और रोशनी क्या है?

संगीत। साधना। सत्संग। और — प्रत्यक्ष अनुभव।

जब कोई पहली बार राग भैरवी सुनता है — सच में सुनता है, background में नहीं — तो कुछ होता है। एक क्षण के लिए scroll रुकता है। मन रुकता है। और उस रुकने में — प्रत्यक्ष होता है।

यही Gurukul का रहस्य था। Text नहीं — presence। किताब नहीं — Guru का सान्निध्य। इतिहास नहीं — जीवंत परंपरा।


तो फिर — इतना सब कौन पढ़ेगा?

वो पढ़ेगा — जिसकी आँख खुली है।

वो पढ़ेगा — जिसे पता है कि scroll करना पढ़ना नहीं है।

वो पढ़ेगा — जिसने एक बार किसी Guru के पास बैठकर महसूस किया हो कि ज्ञान सिर्फ information नहीं होता।

और जो नहीं पढ़ेगा?

बेचारा अंधा है — छोड़ दो इसको इसके हाल पे।

या — एक दीया जला दो। बाकी वो खुद देख लेगा।


🎵 Saraswati Sangeet Gurukul
Online & At-Home Music Gurukul — Kanpur
Pt Ravi Shankar Guru Parampara
प्रत्यक्ष अनुभव — रोज़ — संगीत साधना के माध्यम से

₹500 per class · Min 4 classes/month

👉 अभी जानिए — Gurukul के बारे में

📱 WhatsApp: +91-7428094743


Akshat Agrawal | Sangeet Visharad, Bhatkhande | IIT–BHU
akshat08.blogspot.com | @akshat08 on Substack