जब धर्म सो जाता है: समुद्री मार्गों से कुरुक्षेत्र तक
"हे केशव, ऐसा नहीं कि मुझे धर्म और अधर्म का ज्ञान नहीं; पर मेरे दुर्योधन के अहंकार, प्रतिष्ठा और राज्य का प्रश्न है।"
महाभारत का यह प्रश्न आज भी जीवित है।
आज का कुरुक्षेत्र केवल युद्धभूमि में नहीं, बल्कि व्यापार मार्गों, समुद्री गलियारों, ऊर्जा बाज़ारों, संसदों, मीडिया, कॉरपोरेट बोर्डरूमों और वैश्विक राजनीति में दिखाई देता है।
पनामा नहर, स्वेज नहर और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के संकट हमें याद दिलाते हैं कि सभ्यताएँ केवल व्यापार से नहीं, बल्कि धर्मसम्मत व्यापार से टिकती हैं।
धर्म क्या है?
भारतीय दृष्टि में धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं है।
धर्म का अर्थ है—
- संतुलन।
- मर्यादा।
- न्याय।
- लोककल्याण।
- आत्मसंयम।
- उत्तरदायित्व।
जब व्यापार धर्म से संचालित होता है तो वह समृद्धि देता है।
जब व्यापार लोभ, भय और प्रभुत्व से संचालित होता है तो वही व्यापार अधर्म बन जाता है।
दुर्योधन की समस्या
दुर्योधन मूर्ख नहीं था।
उसे धर्म और अधर्म का ज्ञान था।
उसकी समस्या ज्ञान का अभाव नहीं थी।
समस्या थी—
अहंकार।
प्रतिष्ठा का मोह।
स्वार्थ का अंधकार।
आज भी अनेक व्यक्ति, संस्थाएँ और राष्ट्र जानते हैं कि कौन सा मार्ग न्यायपूर्ण है।
फिर भी वे उस मार्ग पर नहीं चलते क्योंकि:
- सत्ता का मोह।
- बाज़ार का दबाव।
- राष्ट्रीय अहंकार।
- वैचारिक वर्चस्व।
- आर्थिक लालच।
इन सबने विवेक को ढक दिया है।
आत्मसम्मान और आत्मश्लाघा
कृष्ण शायद आज कहते:
"आत्मसम्मान उसी का होता है जिसकी आत्मा जागृत हो।"
सोई हुई आत्मा प्रतिष्ठा नहीं खोजती।
वह केवल प्रशंसा खोजती है।
वह सत्ता में मुजरा करती है।
वह बाजार में नारे बेचती है।
वह सभाओं में जुमले फेंकती है।
भारतीय दर्शन में इसे आत्मप्रतिष्ठा नहीं, बल्कि अहंकार, मद और आत्मश्लाघा कहा गया है।
गीता का दैवी और आसुरी संपदा का वर्णन आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
प्राचीन व्यापार मार्ग और धर्म
मसाला मार्ग टूटे।
सिल्क रूट बना।
राज्य उठे और गिरे।
चीन ने दीवार बनाई।
भारत के समुद्री नगर विकसित हुए।
सभ्यताओं ने नए मार्ग खोजे।
इतिहास हमें बताता है:
जब व्यापार मार्ग संकट में पड़ते हैं, तब राष्ट्र स्वयं को सुरक्षित करने का प्रयास करते हैं।
लेकिन भारतीय दृष्टि एक और प्रश्न पूछती है—
क्या सुरक्षा केवल शक्ति से आती है?
या
धर्म से भी?
आज का वैश्विक कुरुक्षेत्र
ऊर्जा सुरक्षा।
राष्ट्रीय हित।
व्यापारिक प्रतिस्पर्धा।
जलवायु संकट।
भू-राजनीति।
इन सबके बीच मनुष्य फिर वही प्रश्न पूछ रहा है:
"धर्म क्या है?"
यदि केवल राष्ट्रीय हित ही सर्वोच्च हो जाए तो संघर्ष बढ़ेगा।
यदि केवल लाभ सर्वोच्च हो जाए तो प्रकृति नष्ट होगी।
यदि केवल प्रतिष्ठा सर्वोच्च हो जाए तो समाज विभाजित होगा।
धर्म इन सबके बीच संतुलन का नाम है।
सज्जन की दूरी
तुलसीदास कहते हैं:
"सठ सन विनय, कुटिल सन प्रीति।"
जब व्यक्ति का विवेक मर जाता है, जब संवाद के स्थान पर केवल शोर रह जाता है, जब आत्मा के स्थान पर केवल अहंकार बोलता है, तब सज्जन व्यक्ति विवाद नहीं करता।
वह दूरी बना लेता है।
भारतीय परंपरा में ऐसे लोगों को शत्रु नहीं, बल्कि अज्ञान से आच्छादित जीव माना गया है।
उनसे घृणा नहीं।
उनसे दूरी।
उनके प्रति क्रोध नहीं।
उनके लिए करुणा।
निष्कर्ष
समुद्री मार्गों का संकट हमें केवल ऊर्जा सुरक्षा का पाठ नहीं पढ़ाता।
वह हमें महाभारत की याद दिलाता है।
दुर्योधन बाहर भी है।
दुर्योधन भीतर भी है।
कुरुक्षेत्र संसार में भी है।
कुरुक्षेत्र हमारे भीतर भी है।
और कृष्ण का प्रश्न आज भी वही है—
"क्या तुम्हारा निर्णय धर्म से प्रेरित है या केवल भय, लोभ और प्रतिष्ठा से?"
शायद यही प्रश्न भविष्य की राजनीति, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और मानव सभ्यता का भी सबसे बड़ा प्रश्न है।