मंडल, मंदिर, मस्जिद और मैं
"तुम बिन जीवन कैसे बीता, पूछो मेरे दिल से..."
"मंडल कमीशन, और फिर मंदिर-मस्जिद — तुम बिन जीवन कैसे बीता, पूछो मेरे दिल से, हाय!"
कभी-कभी लगता है कि मेरा जीवन किसी व्यक्ति की कहानी कम और भारत के पिछले 35 वर्षों के संक्रमण की कहानी अधिक है।
1990 में मैं युवावस्था की दहलीज़ पर खड़ा था।
देश बदल रहा था।
समाज बदल रहा था।
राजनीति बदल रही थी।
और शायद मेरी नियति भी।
1990 : जब जमीन खिसकने लगी
मेरी पीढ़ी एक विचित्र पीढ़ी थी।
हमने बचपन में वह भारत देखा था जहाँ:
- सरकारी नौकरी अंतिम लक्ष्य थी,
- परिवार संयुक्त थे,
- सामाजिक पहचान जाति, समुदाय और रिश्तों से बनती थी,
- और सफलता का अर्थ सीमित लेकिन स्पष्ट था।
फिर अचानक मंडल आयोग आया।
सड़कों पर आंदोलन शुरू हुए।
आरक्षण पर बहसें छिड़ीं।
मित्रताएँ टूटने लगीं।
समाज नए खाँचों में बंटने लगा।
इसके तुरंत बाद मंदिर-मस्जिद आंदोलन ने पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया।
भारत जैसे अपने भीतर छिपे हुए प्रश्नों से पहली बार खुलकर जूझ रहा था।
मैं भी उसी भारत का एक युवा था।
लेकिन सच कहूँ तो उस समय मैं राजनीति से अधिक अपने जीवन को समझने की कोशिश कर रहा था।
पिता का जाना और जिम्मेदारी का आगमन
फिर जीवन ने वह प्रहार किया जिसके लिए कोई युवा तैयार नहीं होता।
1991।
मेरे पिता चले गए।
उस दिन केवल एक व्यक्ति नहीं गया।
मेरे जीवन का सुरक्षा कवच चला गया।
उसके बाद संसार अचानक बहुत बड़ा और मैं बहुत छोटा लगने लगा।
कई लोगों के लिए 1991 आर्थिक उदारीकरण का वर्ष था।
मेरे लिए वह जिम्मेदारी का वर्ष था।
भारत के लिए नए अवसरों का द्वार खुल रहा था।
मेरे लिए संघर्ष का।
उदारीकरण का भारत और एक इंजीनियर की यात्रा
देश बदल रहा था।
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ आ रही थीं।
तेल और गैस उद्योग विस्तार कर रहा था।
वैश्विक अवसर पैदा हो रहे थे।
मैंने भी अपने लिए रास्ता बनाया।
आईआईटी की शिक्षा, तकनीकी दक्षता, और लगातार सीखने की जिद के सहारे मैं भारत से बाहर निकला।
कुवैत।
कनाडा।
ओमान।
यूएई।
और बीच में अनेक परियोजनाएँ, अनेक संगठन, अनेक संस्कृतियाँ।
दुनिया देखी।
रिफाइनरी देखी।
ऑफशोर प्लेटफॉर्म देखे।
सबसी पाइपलाइनें देखीं।
कॉर्पोरेट राजनीति देखी।
तकनीकी उत्कृष्टता देखी।
मानव कमजोरी भी देखी।
लेकिन एक चीज़ लगातार छूटती रही
करियर बढ़ता गया।
पद बढ़ते गए।
जिम्मेदारियाँ बढ़ती गईं।
लेकिन भीतर कहीं एक खाली जगह भी साथ-साथ बढ़ती गई।
शायद इसलिए कि मैं हमेशा कहीं न कहीं "घर" खोज रहा था।
और घर केवल ईंट-पत्थर का नहीं होता।
घर वह जगह है जहाँ व्यक्ति बिना मुखौटे के रह सके।
"तेरी जुल्फों से जुदाई तो नहीं मांगी थी..."
"तेरी जुल्फों से जुदाई तो नहीं मांगी थी, कैद मांगी थी, रिहाई तो नहीं मांगी थी।"
यह केवल किसी प्रेमी की पंक्ति नहीं है।
यह जीवन की भी पंक्ति है।
हम जिन चीज़ों को पकड़कर रखना चाहते हैं:
- माता-पिता,
- परिवार,
- बच्चे,
- मित्र,
- संबंध,
- शहर,
- स्मृतियाँ,
जीवन धीरे-धीरे उन्हें हमसे दूर करता जाता है।
हम स्थायित्व चाहते हैं।
जीवन परिवर्तन देता है।
हम कैद चाहते हैं।
जीवन रिहाई देता है।
परिवार : सबसे बड़ा पाठ
मेरे जीवन में सबसे बड़ी उपलब्धि यदि कोई है, तो वह पद या वेतन नहीं है।
वह मेरे बच्चे हैं।
उनके साथ मेरा संबंध आज भी मेरे जीवन का सबसे उजला पक्ष है।
दूसरी ओर, वैवाहिक जीवन और पारिवारिक समीकरणों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया।
कई बार निकटतम संबंध ही सबसे कठिन परीक्षा बन जाते हैं।
कई बार प्रेम पर्याप्त नहीं होता।
कई बार समझ पर्याप्त नहीं होती।
और कई बार दोनों पक्ष अपने-अपने सत्य लेकर खड़े रह जाते हैं।
2015 के बाद : अदृश्य संघर्ष
बाहरी दुनिया को शायद मैं सफल दिखता रहा।
लेकिन भीतर एक दूसरा संघर्ष चल रहा था।
प्रमोशन रुकना।
मान्यता कम मिलना।
योग्यता और अवसरों का मेल न होना।
कई बार महसूस हुआ कि मैं उस दुनिया के लिए बहुत सीधा हूँ जिसमें राजनीतिक कौशल अधिक मूल्यवान है।
मेरे गांधीवादी संस्कार और कॉर्पोरेट सत्ता संरचनाएँ हमेशा सहज मित्र नहीं रहे।
और फिर आध्यात्मिकता का प्रवेश
धीरे-धीरे मैंने एक बात समझी।
दुनिया को बदलने से पहले व्यक्ति को स्वयं को समझना पड़ता है।
यहीं से भारतीय दर्शन, संगीत साधना, रामचरितमानस, महाभारत, गीता और जीवन के गहरे प्रश्न मेरे साथी बनने लगे।
मैंने पाया कि जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई किसी प्रतिस्पर्धी कंपनी से नहीं है।
वह अपने ही भीतर चल रही है।
"सही कहा प्रभु, लेकिन था तो मैं पनौती ही..."
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो कभी-कभी हँसी भी आती है।
कभी-कभी शिकायत भी।
और कभी-कभी समर्पण।
मन कहता है —
"सही कहा प्रभु, लेकिन था तो मैं पनौती ही। कर्मफल तो भोगना ही था।"
फिर भीतर से एक दूसरी आवाज़ आती है।
क्या वास्तव में यह केवल कर्मफल था?
या यह वही प्रशिक्षण था जिसने मुझे बनाया?
यदि पिता जल्दी न जाते।
यदि संघर्ष न होते।
यदि विदेश न जाना पड़ता।
यदि संबंध सरल होते।
यदि करियर सीधा चलता।
तो क्या मैं वही व्यक्ति होता जो आज हूँ?
शायद नहीं।
निष्कर्ष : एक अधूरी यात्रा
54 वर्ष की आयु में मैं यह नहीं कह सकता कि मैंने जीवन को समझ लिया है।
लेकिन इतना अवश्य समझा हूँ कि जीवन किसी सीधी रेखा का नाम नहीं है।
यह एक लंबी यात्रा है:
- मंडल से बाजार तक,
- मंदिर से वैश्वीकरण तक,
- परिवार से अकेलेपन तक,
- महत्वाकांक्षा से आत्मचिंतन तक,
- और अहंकार से स्वीकार तक।
आज भी प्रश्न बाकी हैं।
आज भी खोज जारी है।
लेकिन अब शिकायत कुछ कम है।
और जिज्ञासा कुछ अधिक।
क्योंकि शायद अंततः जीवन का उद्देश्य जीतना नहीं था।
समझना था।
और यदि समझ आ जाए, तो संघर्ष भी प्रसाद बन जाता है।
🙏
No comments:
Post a Comment