Friday, May 29, 2026

हे भगवान, कुछ मत देना... बस यह झूठा अहंकार मत देना

 

हे भगवान, कुछ मत देना... बस यह झूठा अहंकार मत देना

"अरे कुछ न चाही भगवन।
इस पनौती जैसी जीभ से अच्छा, गूंगा बना दे बस।
अगर इसके जैसी आँखें देनी हैं, तो मुझे अंधा बना दे।

और इसके जैसी बुद्धि देनी है, तो मुझे गधा बना दे।

और भक्ति!! भाग जा अब यहां से, वरना सारी भगवद गिरी यहीं निकाल दूंगा।
लल्लू राम कहीं का..."

पहली नज़र में यह प्रार्थना नहीं लगती।

यह तो जैसे भगवान से झगड़ा है।

व्यंग्य है।

कटाक्ष है।

गुस्सा है।

और शायद थोड़ी हताशा भी।

लेकिन भारतीय संत परंपरा को ध्यान से पढ़िए, तो पाएंगे कि कई बार सबसे गहरी आध्यात्मिक बातें विनम्र प्रार्थनाओं में नहीं, बल्कि भगवान से किए गए झगड़ों में छिपी होती हैं।


जीभ : ज्ञान की या विनाश की?

मनुष्य को सबसे अधिक समस्याएँ किसने दी हैं?

अक्सर उसकी अपनी जीभ ने।

युद्ध तलवारों से कम, शब्दों से अधिक शुरू हुए हैं।

रिश्ते टूटे हैं।

समाज बंटे हैं।

धर्म लड़े हैं।

राजनीति विषैली हुई है।

और अधिकांश मामलों में हथियार नहीं, शब्द जिम्मेदार थे।

इसलिए कवि कहता है —

ऐसी जीभ से अच्छा गूंगा बना दे।

अर्थ यह नहीं कि बोलना बुरा है।

अर्थ यह है कि यदि वाणी सत्य, करुणा और विवेक से रिक्त हो, तो मौन कहीं अधिक श्रेष्ठ है।


आँखें : देखने का साधन या भ्रम का?

आंखें सब देखती हैं।

लेकिन क्या हम वास्तव में देखते हैं?

हम चेहरा देखते हैं, चरित्र नहीं।

धन देखते हैं, दुःख नहीं।

प्रसिद्धि देखते हैं, अकेलापन नहीं।

बाहरी चमक देखते हैं, भीतर की शून्यता नहीं।

इसलिए कवि की शिकायत है —

यदि ऐसी दृष्टि ही देनी है जो केवल भ्रम पैदा करे, तो अंधा बना दे।

भारतीय दर्शन में अंधत्व का अर्थ केवल दृष्टिहीनता नहीं है।

सच्चा अंधत्व है — सत्य सामने हो और फिर भी दिखाई न दे।


बुद्धि : वरदान या अभिशाप?

आधुनिक युग बुद्धिमानों का युग है।

डिग्रियाँ हैं।

विशेषज्ञता है।

डेटा है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता है।

लेकिन क्या बुद्धि ने मनुष्य को शांत भी बनाया?

कई बार अत्यधिक बुद्धिमत्ता केवल अहंकार का नया वस्त्र बन जाती है।

व्यक्ति सोचता है कि वह सब जानता है।

वहीं से पतन शुरू होता है।

इसीलिए कवि कहता है —

ऐसी बुद्धि से अच्छा गधा बना दे।

गधा कम से कम अपने ज्ञान का प्रदर्शन तो नहीं करता।

उसे यह भ्रम नहीं होता कि वह ब्रह्मांड का स्वामी है।


और भक्ति?

यहीं सबसे बड़ा विस्फोट होता है।

"और भक्ति!! भाग जा अब यहाँ से..."

यह सुनने में ईश्वर-विरोध जैसा लगता है।

पर वास्तव में यह नकली भक्ति के विरुद्ध विद्रोह है।

वह भक्ति जो:

  • मंच पर दिखाई दे,
  • सोशल मीडिया पर बिके,
  • प्रवचन में चमके,
  • लेकिन व्यवहार में न दिखे।

यदि भक्ति मनुष्य को अधिक विनम्र, अधिक सत्यवादी और अधिक करुणामय नहीं बनाती, तो वह केवल प्रदर्शन रह जाती है।


भगवान से झगड़ने की परंपरा

भारतीय भक्ति साहित्य की एक अनोखी विशेषता है।

यहाँ भक्त केवल स्तुति नहीं करता।

वह शिकायत भी करता है।

कभी मीरा प्रश्न करती है।

कभी सूरदास उलाहना देते हैं।

कभी कबीर डाँटते हैं।

कभी तुलसी रोते हैं।

और कभी-कभी भक्त भगवान से कह देता है —

"भाग जा यहाँ से।"

यह नास्तिकता नहीं है।

यह संबंध की निकटता है।

जहाँ औपचारिकता समाप्त हो जाती है।


असली प्रार्थना क्या है?

इस पूरी व्यंग्यात्मक प्रार्थना के भीतर एक ही याचना छिपी है —

मुझे झूठी वाणी मत देना।

मुझे भ्रमित दृष्टि मत देना।

मुझे अहंकारी बुद्धि मत देना।

मुझे दिखावटी भक्ति मत देना।

यदि यह सब देना है, तो मत देना।

लेकिन यदि देना ही है —

तो

  • सत्य की वाणी देना,
  • विवेक की दृष्टि देना,
  • विनम्र बुद्धि देना,
  • और ऐसी भक्ति देना जो मनुष्य को मनुष्य बना सके।

निष्कर्ष

कभी-कभी सबसे सच्ची प्रार्थना मंदिरों में नहीं होती।

वह तब होती है जब मनुष्य अपने सारे मुखौटे उतार देता है और भगवान से कहता है —

"मुझे सफलता नहीं चाहिए।

मुझे प्रसिद्धि नहीं चाहिए।

मुझे ज्ञान का अहंकार नहीं चाहिए।

यदि कुछ देना है, तो ऐसा हृदय देना जो स्वयं को धोखा न दे।"

शायद वहीं से आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है।

स्तुति से नहीं।

ईमानदारी से।

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