दो बहनें, एक ही आँगन की छाया,
एक ने भजन में पाया ईश्वर का साया,
दूजी ने जीवन के मेले में राह बनाई,
आँसू, हँसी, रिश्तों की धूप-छाँव में तैरती आई।
एक सफलता को प्रभु का प्रसाद समझती रही,
सुमिरन में डूबी, शांत, निर्मल बहती रही,
न ईर्ष्या, न आग्रह, बस साधना का संगीत,
जैसे सरिता मिले सागर से अतीत-अनंत प्रगीत।
और एक—
अग्नि सी, चंचल, जीवन से जूझती रही,
हर मोड़ पर खुद को फिर से गढ़ती रही,
कभी लानतों में, कभी तानों में ढली,
पर स्वर की जिद से हर दीवार पिघली।
🎤 आशा भोंसले -
तुम केवल एक आवाज़ नहीं थीं,
तुम जीवन की अनगिनत परतों की गूंज थीं।
“कजरा मोहब्बत वाला…” में शरारत की चमक,
“आइए मेहरबान…” में आमंत्रण की झलक,
“ये रेशमी ज़ुल्फों…” में रात की नमी,
हर गीत में तुमने जी ली एक नई ज़िंदगी।
जब रिश्तों की दीवारें ऊँची हो गईं,
जब अपने ही अपने न रहे,
तब भी तुम्हारे स्वर ने हार न मानी,
वो टूटा नहीं—और गहरा हो गया।
ओ.पी. के सुरों में तुम्हें एक सहर मिली,
जहाँ शिकायतें भी धुन बन गईं,
और फिर पंचम के संग
तुमने जीवन को फिर से गुन लिया।
“चैन से हमको कभी…” की पीड़ा में,
जो आँसू गिरे थे सुरों पर,
वो आज भी गूंजते हैं—
हर उस दिल में, जिसने प्रेम को खोया है।
🎶 लता मंगेशकर की शांति,
और तुम्हारी अग्नि—
दोनों मिलकर रच गए वो स्वर्ण युग,
जहाँ संगीत सिर्फ सुना नहीं, जिया जाता था।
“हमने देखी है…” की सुगंध,
और “कजरा मोहब्बत…” की धड़कन—
दो धाराएं, एक ही गंगा की,
एक निर्मल, एक चंचल।
कह हनुमंत—
विपत्ति वही, जब सुमिरन न होई…
शायद इसी लिए,
जिंदगी की पहेली में जो उलझे रहे,
वो सुरों में ही अपना रास्ता खोजते रहे।
आज जब अंतिम स्वर भी मौन हुआ,
तो लगता है—
न केवल एक गायिका गई,
बल्कि एक पूरा युग विश्राम को चला गया।
न रफ़ी, न मुकेश, न किशोर की वो महफ़िल,
अब उस आखिरी दीप का भी प्रकाश थम गया।
पर तुम गई कहाँ हो आशा ताई?
तुम तो हर उस दिल में हो—
जहाँ प्रेम अधूरा है,
जहाँ जीवन अधूरा है,
जहाँ गीत अभी भी पूरा होना बाकी है।
मन जाहि राचहु मिलहि वो राम,
सहज उदासी, वनवासी, वैकुंठ निवासी।
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