Thursday, October 15, 2026

अच्छा, लल्लू राम की स्थापना कहाँ की जाए?

 

अच्छा, लल्लू राम की स्थापना कहाँ की जाए?

वाल्मीकि जी की हँसी, गोस्वामी तुलसीदास का प्रश्न और रावण की वही पुरानी भूल!

“आप हँस क्यों रहे हैं, वाल्मीकि जी?”

कल्पना कीजिए, एक सज्जन बड़े आत्मविश्वास से रामकथा की व्याख्या कर रहे हैं।

“भाई को कितनी बार समझाया कि यह कथा अलौकिक है! लेकिन फिर भी ब्रह्म राम को मनुष्य मान बैठा!”

महर्षि वाल्मीकि मुस्कुराते हैं।

सज्जन चौंककर पूछते हैं—

“आप हँस क्यों रहे हैं, वाल्मीकि जी?”

और फिर गोस्वामी तुलसीदास जी से सवाल किया जाता है—

“गोस्वामी जी, इसकी का गति हुई है?”

उत्तर मिलता है—

“वही, जो भूल रावण ने की थी!”

बस, यहीं से शुरू होती है हमारी व्यंग्य-कथा—काव्य, आस्था, विवेक और अपनी-अपनी मान्यताओं के सिंहासन पर विराजमान अहंकार की कथा।

🎬 इस व्यंग्य का संदर्भ:
https://youtu.be/r5Y4qFN8gqI?si=3o8UBjFaAKADbtnk


1. वाल्मीकि जी ने राम को किस रूप में प्रस्तुत किया?

सबसे पहले एक आवश्यक स्पष्टीकरण।

जब हम कहते हैं कि महर्षि वाल्मीकि ने राम को एक मनुष्य के रूप में प्रस्तुत किया, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने राम की किसी प्रकट मूर्ति की स्थापना की थी। न ही इसका अर्थ यह है कि वे राम की दिव्यता के प्रश्न पर कोई आधुनिक धार्मिक या राजनीतिक घोषणा कर रहे थे।

महर्षि वाल्मीकि की रामायण एक संस्कृत महाकाव्य है। उसमें राम काव्य के केंद्रीय नायक हैं—एक ऐसे चरित्र, जिनके जीवन के माध्यम से कर्तव्य, पारिवारिक संबंध, राजधर्म, वचनपालन, दुःख, संघर्ष और नैतिक दुविधाओं जैसे प्रश्न सामने आते हैं।

यहाँ ‘मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करना’ साहित्यिक निरूपण की बात है, किसी मूर्ति की स्थापना की नहीं।

किसी महाकाव्य में पात्र का मानवीय चित्रण होना और किसी धार्मिक परंपरा में उसी पात्र को ईश्वर का अवतार मानना अलग-अलग स्तरों के कथन हैं।

वाल्मीकि के रामकाव्य का अध्ययन करने के लिए यह आवश्यक नहीं कि पाठक पहले से राम को ब्रह्म माने। उसी तरह काव्य के मानवीय पक्ष को समझने के लिए राम की धार्मिक मान्यता का खंडन करना भी आवश्यक नहीं।

साहित्य को साहित्य की तरह पढ़ना और आस्था को आस्था की तरह समझना—दोनों संभव हैं।

फिर कठिनाई कहाँ है?

कठिनाई तब पैदा होती है, जब कोई व्यक्ति अपनी धार्मिक व्याख्या को ही मूल काव्य का एकमात्र वैध अर्थ घोषित कर देता है और बाकी सभी दृष्टियों को अस्वीकार करने लगता है।

2. रामकथा: काव्य, चरित्र और धार्मिक आस्था

महर्षि वाल्मीकि की रामायण और गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस को एक ही धार्मिक दृष्टिकोण की पुनरावृत्ति मान लेना उनके साहित्यिक और वैचारिक अंतर को अनदेखा करना होगा।

वाल्मीकि की संस्कृत रामायण में राम का चरित्र महाकाव्य की घटनाओं, संवादों, निर्णयों और संघर्षों के माध्यम से विकसित होता है। उसमें राम की मानवीय परिस्थितियाँ और नैतिक दुविधाएँ कथा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं।

दूसरी ओर, गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस में राम की ब्रह्मस्वरूप सत्ता और उनकी भक्ति का विशेष महत्त्व है। तुलसीदास के काव्य में राम की दिव्यता कथा के आध्यात्मिक अर्थ को गहराई देती है।

तुलसीदास लिखते हैं—

“सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा।”

यह पंक्ति सगुण और निर्गुण के संबंध पर विचार करती है।

लेकिन यहाँ भी एक अंतर समझना आवश्यक है। तुलसीदास की भक्ति-दृष्टि को समझना एक साहित्यिक और दार्शनिक कार्य है; उसे प्रत्येक पाठक के लिए अनिवार्य निष्कर्ष बना देना दूसरा कार्य।

काव्य हमें एक चरित्र से परिचित कराता है; आस्था उस चरित्र में दिव्यता का अनुभव कर सकती है। दोनों को एक ही कसौटी पर रखकर परखना आवश्यक नहीं।

और सबसे महत्त्वपूर्ण बात—वाल्मीकि के रामकाव्य को पढ़ने का उद्देश्य किसी आधुनिक राजनीतिक विचारधारा, किसी सामुदायिक श्रेष्ठताबोध या किसी धार्मिक हठधर्मिता की स्थापना मान लेना ऐतिहासिक और साहित्यिक सावधानी के विपरीत होगा।

आज की राजनीतिक अवधारणाओं को प्राचीन महाकाव्य पर आरोपित करने से पहले यह पूछना चाहिए कि मूल रचना वास्तव में क्या कहती है और हम उसमें अपनी ओर से क्या जोड़ रहे हैं।

3. अच्छा, लल्लू राम की स्थापना कहाँ की जाए?

अब अपने मूल प्रश्न पर लौटते हैं।

“अच्छा, लल्लू राम की स्थापना कहाँ की जाए?”

मंदिर में?

राजनीतिक मंच पर?

चुनावी रथ पर?

या फिर उस मानसिक सिंहासन पर, जहाँ अपनी मान्यता के अतिरिक्त किसी दूसरे विचार के लिए स्थान ही न हो?

यहाँ ‘लल्लू राम’ किसी वास्तविक राम का नाम नहीं है। यह उस सुविधाजनक, निष्क्रिय और अपनी धारणाओं में कैद छवि पर व्यंग्य है, जिसे अपने विवेक का इस्तेमाल करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

किसी चरित्र को काव्य में समझने के बजाय उसे अपनी पूर्वनिर्धारित मान्यता का प्रमाण बना देना आसान है।

फिर उस चरित्र के हर संवाद का अर्थ पहले से तय होता है। हर घटना अपनी धारणा की पुष्टि करती है। और जो प्रश्न उस धारणा को असुविधाजनक लगे, उसे पूछने वाला ही दोषी ठहरा दिया जाता है।

लेकिन साहित्य का काम हमारी धारणाओं पर केवल मुहर लगाना नहीं है। वह उन्हें चुनौती भी देता है।

राम को मंदिर में स्थापित करना श्रद्धालु का धार्मिक अधिकार हो सकता है। राम को महाकाव्य के नायक के रूप में पढ़ना पाठक का साहित्यिक अधिकार है। राम के दार्शनिक स्वरूप पर विचार करना चिंतक का अधिकार है।

समस्या इनमें से किसी एक दृष्टिकोण में नहीं है।

समस्या तब है, जब एक दृष्टिकोण बाकी सभी दृष्टिकोणों को मिटाकर स्वयं को अंतिम सत्य घोषित कर देता है।

मूर्ति की स्थापना और विचार की स्थापना एक बात नहीं हैं। और विचार की स्थापना भी तब तक सार्थक नहीं, जब तक उसमें प्रश्नों के लिए जगह हो।

4. रावण की भूल क्या थी?

अब गोस्वामी जी के कथित उत्तर पर लौटिए—

“वही, जो भूल रावण ने की थी!”

रावण विद्वान था। तपस्वी था। शक्तिशाली था। उसकी विद्वत्ता और सामर्थ्य के बावजूद उसका चरित्र अहंकार, कामना और शक्ति के दुरुपयोग की त्रासदी से जुड़ा है।

रामकथा में रावण की पराजय केवल दो योद्धाओं के बीच युद्ध का परिणाम नहीं है। वह मर्यादा, नैतिक उत्तरदायित्व और अहंकार के प्रश्नों को भी सामने लाती है।

लेकिन क्या राम को मनुष्य समझना अपने आप में रावण की भूल थी?

यहाँ सावधानी आवश्यक है।

रावण की नैतिक विफलता को केवल इस बात में सीमित करना कि उसने राम को ईश्वर के रूप में नहीं पहचाना, कथा के व्यापक नैतिक प्रश्नों को छोटा कर देना होगा। रावण का अहंकार और सीता के प्रति उसका आचरण उसकी कथा के केंद्रीय पक्ष हैं।

इसलिए इस प्रसंग का व्यंग्यात्मक अर्थ यह नहीं कि राम को मनुष्य मानने वाला हर व्यक्ति रावण है।

अर्थ यह है कि जब मनुष्य अपनी मान्यता को ही अंतिम सत्य मानकर दूसरे के विचार को सुनने से इनकार करता है, तब वह अपनी बुद्धि को भी अहंकार का सेवक बना सकता है।

रावण की कथा हमें इसी खतरे के प्रति सावधान कर सकती है।

आज भी ज्ञान और विवेक में अंतर है। जानकारी होना और अपनी मान्यताओं पर प्रश्न करने का साहस होना अलग-अलग बातें हैं।

दस सिरों वाला रावण तो काव्य का पात्र है; लेकिन अहंकार के अनेक सिर हमारे अपने भीतर भी हो सकते हैं।

5. ब्रह्म को मनुष्य मानने की भूल या काव्य को अपनी मान्यता में बाँधने की भूल?

यहाँ एक दार्शनिक प्रश्न उठता है।

यदि कोई व्यक्ति राम को ब्रह्म मानता है, तो वह अपनी आस्था व्यक्त कर रहा है।

यदि कोई व्यक्ति वाल्मीकि की रामायण में राम के मानवीय चरित्र का साहित्यिक अध्ययन करता है, तो वह काव्य का विश्लेषण कर रहा है।

यदि कोई व्यक्ति तुलसीदास की रामचरितमानस में राम की दिव्यता और भक्ति का अध्ययन करता है, तो वह धार्मिक काव्य की आध्यात्मिक दृष्टि को समझ रहा है।

इन तीनों कार्यों को एक-दूसरे का शत्रु बनाना आवश्यक नहीं।

अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत जैसे भारतीय दार्शनिक मत ईश्वर, जीव और जगत के संबंध को अलग-अलग ढंग से समझाते हैं। इन परंपराओं में मतभेद के बावजूद विचार और तर्क की समृद्ध परंपरा रही है।

फिर आज हम क्यों मान लें कि किसी काव्य-पात्र को समझने से पहले उसकी दिव्यता को स्वीकार करना ही पड़ेगा?

और यदि कोई व्यक्ति आस्था के आधार पर उसे ब्रह्म मानता है, तो उसे यह क्यों मानना चाहिए कि साहित्यिक अध्ययन उसकी आस्था का अपमान है?

काव्य-पात्र का मानवीय चित्रण किसी धार्मिक आस्था का स्वतः खंडन नहीं करता; धार्मिक आस्था भी साहित्यिक व्याख्या को अपने अधीन करने का स्वतः अधिकार नहीं देती।

यही वह अंतर है, जिसे समझना आवश्यक है।

6. और वाल्मीकि जी हँस क्यों रहे हैं?

अब उस कल्पनात्मक दृश्य में लौटिए।

एक सज्जन कहते हैं—

“राम को समझने के लिए पहले मेरी व्याख्या स्वीकार कीजिए!”

दूसरे कहते हैं—

“नहीं, राम का अर्थ वही है जो मेरी परंपरा बताती है!”

तीसरे कहते हैं—

“जो मेरी मान्यता से सहमत नहीं, वह रामकथा को समझ ही नहीं सकता!”

और वाल्मीकि जी मुस्कुराते हैं।

क्योंकि साहित्य के पात्रों पर विचार करने की जगह जब हम अपने विचारों को ही पात्रों के मुँह में डालने लगते हैं, तो काव्य की स्वतंत्रता समाप्त होने लगती है।

यहाँ वाल्मीकि जी की हँसी हमारी कल्पना है, कोई ऐतिहासिक संवाद नहीं। लेकिन इस कल्पना के माध्यम से एक वास्तविक प्रश्न पूछा जा सकता है—

क्या हम मूल रचना को समझने का प्रयास कर रहे हैं, या अपनी मान्यता की पुष्टि के लिए उसका इस्तेमाल कर रहे हैं?

क्या हम काव्य के प्रश्नों को सुनते हैं, या हर प्रश्न का उत्तर पहले से तय करके बैठे हैं?

और क्या किसी महाकाव्य की महत्ता इस बात में है कि वह हमें विचार करने के लिए प्रेरित करता है, या इस बात में कि हम उसे अपनी विचारधारा का प्रमाण बना सकें?

7. राम की स्थापना कहाँ हो—और किस अर्थ में?

इस प्रश्न के उत्तर में तीन अलग-अलग बातें समझनी होंगी।

धार्मिक अर्थ में: श्रद्धालु राम की मूर्ति मंदिर में स्थापित कर सकते हैं और उन्हें अपने आराध्य के रूप में पूज सकते हैं।

साहित्यिक अर्थ में: वाल्मीकि और तुलसीदास के रामकाव्यों का अध्ययन उनके अपने कथानक, भाषा, चरित्र-चित्रण, काव्य-दृष्टि और दार्शनिक संदर्भों में किया जाना चाहिए।

सामाजिक और नैतिक अर्थ में: राम के चरित्र से न्याय, मर्यादा, कर्तव्य और उत्तरदायित्व के प्रश्नों पर विचार किया जा सकता है—बिना यह दावा किए कि एक ही धार्मिक या राजनीतिक व्याख्या इन सभी प्रश्नों पर अंतिम अधिकार रखती है।

इन तीनों क्षेत्रों को एक-दूसरे में जबरन मिला देना ही विवाद का कारण बन सकता है।

महाकाव्य को आधुनिक राजनीतिक नारे में बदल देना, साहित्यिक पात्र को किसी सामुदायिक श्रेष्ठताबोध का प्रतीक बना देना, या आस्था को प्रश्नों से परे घोषित कर देना—इन सबमें विचार की स्वतंत्रता सीमित होती है।

रामकथा का अध्ययन इन सीमाओं से परे जाकर भी किया जा सकता है।

और शायद किया जाना चाहिए।


अंत में: रामकथा को पढ़िए, केवल अपनी मान्यता मत पढ़िए!

महर्षि वाल्मीकि की रामायण को साहित्य के रूप में पढ़िए।

गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस को उसके भक्ति और दार्शनिक संदर्भ में समझिए।

आस्था रखिए, तो उसे अपनी श्रद्धा के रूप में रखिए।

प्रश्न पूछिए, तो उन्हें अपनी जिज्ञासा के रूप में पूछिए।

लेकिन किसी एक दृष्टिकोण को सभी के लिए अनिवार्य बनाकर काव्य, दर्शन और इतिहास की जटिलताओं को समाप्त मत कर दीजिए।

किसी महाकाव्य के पात्र को मनुष्य के रूप में समझना और उसे ईश्वर मानना दो अलग-अलग बौद्धिक तथा आध्यात्मिक स्थितियाँ हो सकती हैं। दोनों पर चर्चा संभव है। दोनों की सीमाएँ और अर्थ समझे जा सकते हैं।

आखिरकार, साहित्य किसी एक युग, समुदाय या राजनीतिक विचारधारा की निजी संपत्ति नहीं होता।

तो अगली बार जब कोई पूछे—

“अच्छा, लल्लू राम की स्थापना कहाँ की जाए?”

तो मुस्कुराकर पूछिए—

“पहले यह तो स्पष्ट कीजिए कि हम किसकी स्थापना करना चाहते हैं—एक मूर्ति की, एक काव्य-पात्र की, एक धार्मिक मान्यता की, या अपनी हठधर्मिता की?”

क्योंकि इन चारों में बहुत अंतर है।

और शायद असली प्रश्न राम की स्थापना का नहीं, अपनी मान्यताओं और मूल रचना के बीच अंतर पहचानने का है।

वाल्मीकि जी की कल्पित हँसी यहीं सुनाई देती है।

और गोस्वामी जी के नाम पर रचा गया हमारा व्यंग्यात्मक प्रश्न भी—

“इसकी का गति हुई है?”

कहीं ऐसा तो नहीं कि रामकथा को समझने निकले थे, लेकिन रास्ते में अपनी ही मान्यता के रावण बन बैठे?

जय श्रीराम—और जय उस विवेक की, जो श्रद्धा को हठधर्मिता तथा काव्य को प्रचार में बदलने से बचाए।

 https://youtu.be/mAowb1wCmn8?si=MNYTBkpd6AYKuRvt

 जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।

 

ब्रह्म जो व्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत वेद।


लेखकीय टिप्पणी: वाल्मीकि और तुलसीदास के बीच प्रस्तुत संवाद तथा उनके नाम से दिए गए व्यंग्यात्मक उत्तर कल्पनात्मक हैं, मूल ग्रंथों से उद्धृत ऐतिहासिक संवाद नहीं। इस लेख में राम के साहित्यिक चित्रण, धार्मिक आस्था और आधुनिक राजनीतिक व्याख्या के बीच अंतर पर विचार किया गया है।

 

### मानस के बहाने — हठ के रावन

अवधी चौपाई शैली में एक विनम्र व्यंग्य-प्रयास। गोस्वामी तुलसीदास की काव्य-परंपरा से प्रेरित मौलिक रचना, मूल रामचरितमानस की चौपाइयाँ नहीं।

### मंगलाचरण

बंदउँ बुद्धि बिबेक के दाता। जिन बिनु मिटै न मन की भ्राता॥

प्रश्न करौं पर बैर न राखौं। सत्य मिलै तौ सीस नवावौं॥

रामहि मानै कोउ ब्रह्म अपारा। कोउ नरनायक कहै संसारा॥

भाव भिन्न सबके मन माहीं। हठ बस सत्य एक ठहराहीं॥

### वाल्मीकि जी की मुस्कान

कहहिं एक सुनु बंधु हमारा। रामकथा अलौकिक अपारा॥

ब्रह्म राम नर मानत भाई। देखि महर्षि मुसुकि मुस्काई॥

पूछत भक्त कहहु मुनिराया। हँसि काहे मोहि मोह उपाया॥

कहहिं वाल्मीकि सुनहु नर ज्ञानी। काव्यहि बूझहु कथा बखानी॥

चरित नायक नर कहि गावा। काहे मूर्ति-स्थापन बतलावा॥

काव्य एक अरु पूजन दूजा। दोनहुँ के मत भिन्नहि बूझा॥

भाव भक्ति मन माहिं समाई। काहे दूसरि बुद्धि मिटाई॥

### हठधर्मिता

निज मत सब पर जो थोपा। परमत सुनत तुरत मुख कोपा॥

आपन कथन परम सत्य बतावै। प्रश्न करै ते बैरी ठहरावै॥

यह हठधर्मिता जानहु भाई। जहँ बिबेक की राह न पाई॥

श्रद्धा मन के कमल समान। हठ तासु पर जमै पाषान॥

प्रश्न पवन जब बहि न पावै। बंद कली कैसे मुसुकावै॥

सुनहु साधु यह बात हमारी। हठ तजि बुद्धि करहु उजियारी॥

### हिंदुत्व का अभिमान

कोउ संस्कृति को धर्म कहावै। कोउ निज जाति-चिह्न बतलावै॥

कोउ हिंदुत्व कहै पहिचाना। कोउ राजनीति रूप बखाना॥

भिन्न-भिन्न मत जगत अपारा। काहे सब पर एकहि धारा॥

निज संस्कृति पर प्रेम सुहावै। पर परनिंदा मान न पावै॥

जो निज गौरव दूसरि गारी। कहहु कहाँ संस्कृति हितकारी॥

मानव-मान सबै करु भाई। परमत सुनहु, निंदा तजि जाई॥

धर्म बढ़ै सेवा के द्वारा। नहिं परपीड़ा, नहिं अहंकारा॥

### जाहिलता

जाहिल केवल सो नहिं भाई। जाहि अक्षर-विद्या न आई॥

पढ़ि-पढ़ि पोथी पदवी पावै। निज अज्ञान न कबहुँ जनावै॥

जो सब जानत आपहि माने। पर प्रश्नन ते दूरहि भागे॥

ज्ञान कहै निज दोष निहारा। अज्ञान कहै मैं सत्य हमारा॥

पढ़े शास्त्र पर भाव न बूझै। अर्थ छोड़ि निज स्वारथ सूझै॥

बिनु विवेक विद्वान कहावै। सो किमि ज्ञान-दीप जरावै॥

### रावण के दस सिर

दस सिर रावन जगत बखाना। भीतर सिर गन कौनहि जाना॥

एक अहं, दूजो अभिमाना। तीजो पद-धन मद मतवाना॥

चौथो जाति, पाँचवाँ पंथ। छठवाँ निज मत को अनुबंध॥

सातवाँ ज्ञान-गुमान अपारा। आठवाँ निज कुल-मद अति भारा॥

नवम विरोधी देखि रिसाना। दसम स्वयंहि सत्य ठहराना॥

बाहर रावन खोजत डोला। भीतर बैठा अहं न खोला॥

राम नाम मुख, मन अभिमाना। कहहु कहाँ मर्यादा ठाना॥

### राम ब्रह्म कि नर अवतारा?

कोउ कहि राम ब्रह्म अविनासी। कोउ नरचरित कहै सुखरासी॥

भक्ति-पंथ निज भावहि जानै। काव्य-पंथ चरितहि पहिचानै॥

रामहि ब्रह्म मानि मन लावै। कोउ चरित पढ़ि अर्थ बुझावै॥

दोनहुँ मत पर होइ बिचारा। काहे करहु विवाद अपारा॥

नर-चरितन ते सीखहु नीति। भक्ति करै मन होइ पुनीती॥

बिनु प्रमाण मत ठौर न पावै। बिनु बिबेक हठ बढ़तहि जावै॥

काव्यहि काव्य रूप पहिचानहु। आस्था के निज भावहि जानहु॥

एकहि मत सब पर न थोपा। प्रेम-पंथ क्यों करहु अनोखा॥

### लल्लू राम की स्थापना

पूछत कोउ सुनहु रघुराई। लल्लू राम कहाँ ठहराई॥

मंदिर माहिं करहु यदि पूजा। भाव सहित तजि मन की दूजा॥

काव्यहि बूझहु तौ पढ़ि बानी। खोजहु अर्थ कथा पहिचानी॥

राजनीति के मंच चढ़ावहु। पहिले कर्म-कसौटी लगावहु॥

नाम राम अरु कर्म अधर्मा। कहहु कहाँ ठहरै निज धर्मा॥

मूर्ति बसै मंदिर के माहीं। राम-मरम बिनु जीवन नाहीं॥

मर्यादा, करुणा, न्याय, बिचारा। इन बिनु नाम-जपै संसारा॥

रामहि बाहर खोजत धावै। भीतर कपट तजत नहिं आवै॥

### तुलसी के नाम पर

तुलसी-वाणी प्रेम सिखावै। भक्ति हृदय के द्वार खुलावै॥

मानस पढ़ि निज मत मतवारा। काहे दूसरि करहु नकारा॥

तुलसी के पद उद्धृत करिहौ। अर्थ सहित संदर्भ धरिहौ॥

अपने मन की बात बनायो। तुलसी के सिर दोष न लायो॥

मूल ग्रंथ अरु कल्पित बानी। भेद जानि कहु बात सयानी॥

संत-वचन के नाम सहारे। निज हठ को मत सत्य उचारे॥

### वाल्मीकि की हँसी

पुनि पूछत सब लोग अपारा। काहे हँसत मुनि पुनि-पुनि बारा॥

कहहिं मुनि सुनहु सकल संसारा। अपनी मति को सत्य तुम्हारा॥

रामकथा के अर्थ अनेक। काहे बंद करहु सब विवेक॥

रामहि खोजत जगत फिराहीं। निज अहंकार न कबहुँ निहारीं॥

दूसर दोष सहज जनावै। निज दोषहि परदा उढ़कावै॥

रावन मारा कथा सुनावै। भीतर रावन कौन मिटावै॥

### उपसंहार

धर्म रहै जब दया सहारे। ज्ञान रहै जब प्रश्न बिचारे॥

संस्कृति तब फल-फूल बढ़ावै। जब परमत को मान दिलावै॥

श्रद्धा हो पर हठ न होई। ज्ञान रहै पर गर्व न कोई॥

राम नाम मुख, राम आचारा। तब जीवन हो उजियारा॥

मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर। मानवता का मान प्रथमतर॥

निज मत राखहु प्रेम सहित। परमत सुनहु विवेक सहित॥

रामहि मानहु ब्रह्म अपारा। रामचरित पढ़हु पुनि बिचारा॥

राम-नाम के संग विवेका। तब मिटि जावै मन की टेका॥

जय सियाराम, जय सद्बिचारा। मिटै हठ, जागै विवेक हमारा॥
 

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