॥ संतवाणी ॥
साधो, अहम का ताज त्यागो
कोरी पंडिताई पर प्रहार और आत्मबोध का संदेश
१. पंडिताई का अभिमान
साधो, अहम का ताज त्यागो,
समता दृष्टि लाओ।
पोथी के अभिमान को छोड़ो,
सतगुरु की शरण में आओ॥
पोथी बाँची, वेद बखाने,
मुख से ज्ञान सुनाय।
मन के भीतर झाँका नाहीं,
काहे पंडित कहलाय?
अक्षर-अक्षर रटत उमर बीती,
मन का मैल न जाय।
परनिंदा और अहंकार में,
ज्ञान कहाँ रह जाय?
ऊँचे आसन बैठकर साधो,
नीचा जग बतलाय।
अपने भीतर झाँके नाहीं,
दूजे को समझाय॥
कंठ बसे हैं वेद-पुराण,
मन में भरा विकार।
ऐसी कोरी पंडिताई से,
कैसे हो उद्धार?
साखी
पोथी सिर पर धरि फिरै, मन में भरा गुमान।
अंतर निर्मल जो नहीं, व्यर्थ ज्ञान का मान॥
२. ज्ञान और आचरण
साधो, ज्ञान न वाणी भर है,
ज्ञान न शब्द-विधान।
ज्ञान वही जो अहं गलावे,
जागे सत्य-विवेक पहचान॥
कथनी मीठी, करनी खोटी,
मुख पर धर्म सजाय।
मन में लोभ, कपट की गठरी,
किसको राह दिखाय?
दूजे को उपदेश सुनावे,
अपने दोष छिपाय।
अपनी आँख का अंधियारा,
पर की आँख बताय॥
राम-नाम मुख से उच्चारे,
मन में कपट समाय।
ऐसे सुमिरन से क्या साधो,
मन का मैल मिटाय?
माथे तिलक, गले में माला,
वाणी में सद्भाव।
पर दुखिया को देखत ही,
मन में उठे दुराव॥
साखी
कथनी से क्या होत है, करनी कहे प्रमाण।
मन निर्मल, व्यवहार सम, ताहि कहो गुणवान॥
३. शास्त्र और सत्य
वेद पढ़े, उपनिषद बखाने,
शब्दों का विस्तार।
पर जीवित प्राणी का दुख न समझे,
कैसा ज्ञान-विचार?
शब्द ब्रह्म की बात करे,
ब्रह्म न सके पहचान।
कण-कण में जो चेतन व्यापे,
उससे बना अनजान॥
कहता मेरा ज्ञान अनोखा,
मेरे मत में सार।
सत्य किसी की बपौती नाहीं,
खोल विवेक-द्वार॥
शास्त्र अगर अहंकार बढ़ावें,
फिर कैसी विद्वत्ता?
ज्ञान अगर समता न लावे,
कैसी उसकी महत्ता?
गुरु का अर्थ न दास बनाना,
न भय का व्यापार।
सच्चा गुरु वह जो दिखलावे,
भीतर का उजियार॥
साखी
वेद पढ़े तो क्या हुआ, यदि मन रहा विकार।
ज्ञान वही जो खोल दे, अंतर का अंधकार॥
४. जाति-पाँति का अभिमान
काहे जाति-पाँति का झगड़ा,
काहे कुल का मान?
एकहि माटी तन सबका,
एकहि प्राण-विधान॥
कोई ऊँचा जन्म से नाहीं,
कोई नीचा जात।
कर्म, करुणा और सत्य से,
होती मनुज की बात॥
जाति बताकर गर्व करे जो,
दूजे को ठुकराय।
अपने भीतर झाँके साधो,
कौन बड़ा कहलाय?
मंदिर में जाकर शीश नवावे,
घर आकर अपमान।
निर्बल की आवाज दबावे,
कैसा धर्म-अभिमान?
जिसमें दया नहीं जीवों पर,
जिसमें समता नाहिं।
लाख करे वह धर्म का दावा,
सार समझा नाहिं॥
साखी
जाति-पाँति का मान तज, देख हृदय के बीच।
जिस घट प्रेम-दया नहीं, तहाँ ज्ञान सब नीच॥
५. माया और मान-प्रतिष्ठा
साधो, अहम का ताज उतारो,
किस बात का मान?
चार दिनों का जगत पसारा,
माटी का अभिमान॥
धन-संपदा, मान-शान,
झूठो सब सामान।
काल चक्र जब सम्मुख आवे,
कौन करे अभिमान?
महल-अटारी, राज-सिंहासन,
सब यहीं रह जाय।
कर्मों की सुगंध मुसाफिर,
साथ तुम्हारे जाय॥
माया के बाजार में साधो,
सबका अलग हिसाब।
प्रेम-दया के मोल पर,
नहीं बिके सद्भाव॥
लोभ की गठरी सिर पर धरकर,
तीर्थ हजारों जाय।
मन का मैल उतारे बिन,
कौन मुक्ति को पाय?
साखी
माटी का यह देह है, माटी का अभिमान।
सत्य-प्रेम की राह चल, यही जीवन की शान॥
६. इंद्रियों का द्वार खोल
सत की ज्योति जलाकर साधो,
विषय-अँधेरा टार।
इंद्रिय के पट खोलकर,
देखो जग विस्तार॥
आँखों से केवल रूप न देखो,
गुण-दोष पहचान।
कानों से केवल बात न सुनो,
परखो सत्य-विधान॥
जिह्वा मीठी बोलती,
मन में भरा विकार।
वाणी तब तक व्यर्थ है,
जब तक झूठ व्यवहार॥
क्रोध अगन को शांत करो,
लोभ की गाँठ छुड़ाय।
ईर्ष्या-द्वेष मिटाकर साधो,
प्रेम-दीप जलाय॥
मन चंचल, इंद्रिय चंचल,
माया का विस्तार।
विवेक की लगाम थाम ले,
तब हो भव से पार॥
साखी
इंद्रिय के बस जो रहा, भटका बारंबार।
मन को साधे प्रेम से, खुले मुक्ति का द्वार॥
७. सत्संग और सच्चा गुरु
माया को संग त्याग,
सत्संग में मन रमा लो।
मोह-ममता के भ्रम मिटाकर,
आस-निराश के पार जाओ॥
सत्संग केवल बैठना नाहीं,
नहीं वचन की धार।
संगति वह जो सत्य जगावे,
मिटे कपट-अहंकार॥
गुरु वह नाहीं जो डर दिखलावे,
बाँधे अपना दास।
गुरु वह जो स्वतंत्र बनाए,
सत्य का दे प्रकाश॥
गुरु-वाणी को आँख मूँदकर,
मत मानो अंतिम ज्ञान।
सत्य परखकर हृदय में धारो,
यही विवेक की शान॥
जो प्रश्नों से भय खाता है,
कैसा उसका ज्ञान?
सत्य परीक्षा से न डरे,
यही ज्ञान की पहचान॥
साखी
सतगुरु ऐसा चाहिए, जो मन का भ्रम मिटाय।
बाँधे नाहीं मोह में, सत्य-पंथ दिखलाय॥
८. समता और करुणा
निर्बल में भी प्रभु को देखो,
सबको गले लगाय।
जिसको जग ने ठुकराया,
उसको हृदय बसाय॥
भूखे को भोजन दे साधो,
प्यासे को दे नीर।
दुखिया के दुख में जो दुखे,
उसका मन गंभीर॥
धर्म न केवल पोथी में है,
न केवल उपदेश।
जहाँ दया, सेवा और समता,
वहीं सत्य का वेश॥
हाथ कर्म में, मन में करुणा,
वाणी सत्य सुनाय।
अपने सुख के साथ मुसाफिर,
पर का दुख भी भाय॥
न मैं ऊँचा, न तू नीचा,
न कोई गैर हमारा।
एकहि चेतन, एकहि जीवन,
एकहि जग पसारा॥
साखी
दीन-दुखी की पीर जो, अपने मन में जान।
उसके हृदय में प्रेम है, वही सच्चा इंसान॥
९. आत्मबोध
काहे खोजत दूर गगन में,
काहे वन-वन धाय?
जिस चेतन से जग प्रकाशित,
उसको भीतर पाय॥
मंदिर-मस्जिद सिर नवायो,
तीर्थ हजारों नाय।
अपने घट का भेद न जाना,
फिर भी ज्ञानी कहाय॥
मन की हलचल शांत कर,
साक्षी भाव जगाय।
आते-जाते भाव को देख,
निज स्वरूप पहचान॥
जब 'मैं' का अभिमान गलैगा,
'मेरा' दूर पलाय।
समता-दृष्टि हृदय में जागे,
प्रेम सहज हो जाय॥
आत्मज्ञान का अर्थ न साधो,
जग से नाता तोड़।
मोह-अहंकार त्यागकर,
सत्य से नाता जोड़॥
साखी
अपने भीतर झाँक ले, छोड़ बाहरी शोर।
जिस दिन मन निर्मल हुआ, खुल जाएगा ठौर॥
१०. अंतिम उपदेश
साधो अहम का ताज त्यागो,
समता दृष्टि लाओ।
कोरी पंडिताई छोड़कर,
सत्य-प्रेम अपनाओ॥
पोथी का सम्मान करो,
पर मत करो गुमान।
ज्ञान तभी सार्थक बने,
जब बदले इंसान॥
धर्म अगर अभिमान बढ़ाए,
फिर सोचो सौ बार।
भक्ति अगर भेदभाव सिखाए,
खोलो विवेक-द्वार॥
कथनी-करनी एक कर साधो,
सत्य को जीवन बनाओ।
दीन-दुखी की सेवा करके,
मन का मैल मिटाओ॥
अंतिम साखी
पोथी पढ़कर गर्व न कर, मन को देख सँवार।
जिस दिन मिटे अहंकार रे, उस दिन खुले द्वार॥
साधो अहम का ताज त्यागो,
समता दृष्टि लाओ।
सत की ज्योति हृदय में धरकर,
प्रभु का सत्य पहचानो॥
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