अपने भीतर के रावण को पहचानो!
रावण एक सत्ता है। प्रश्न यह है कि तुम्हारे शरीररूपी राज्य में शासन किसका है—रावण का या राम का?
पहचान लो अपने अंदर किस रावण और राक्षसों को बैठाया है।
वह मारा, या अभी भी तुम्हारी वाणी, विचार और कर्म में उसी का प्रभाव है?
जन-जन में, कण-कण में व्याप्त सार्वभौमिक चेतना—दीन-दुःखियों की वेदना और करुणा के रूप में प्रकट होने वाले राम—क्या तुम्हारे अंतर में जागे हैं?
या तुमने भी झूठी आन-बान-शान, अहंकार और स्वार्थ की लंका बना रखी है?
इन प्रश्नों को केवल धार्मिक आस्था या पौराणिक कथा के रूप में मत देखिए। ये हमारे अस्तित्व, हमारी चेतना और हमारे जीवन पर शासन करने वाली सत्ता के प्रश्न हैं।
रावण केवल एक व्यक्ति नहीं, एक सत्ता है। एक ऐसी सत्ता, जो शरीररूपी राज्य में राज करती है, बुद्धि को अपना मंत्री बनाती है, अहंकार को अपना सिंहासन और इंद्रियों को अपने शासन का माध्यम।
प्रश्न यह नहीं कि हम हर साल रावण का पुतला जलाते हैं या नहीं।
प्रश्न यह है कि हमारे भीतर स्थापित रावण की सत्ता आज भी कायम है या उसका अंत हुआ है?
1. शरीररूपी राज्य और रावण की सत्ता
कल्पना कीजिए कि यह शरीर एक राज्य है।
इस राज्य में मन है, बुद्धि है, विवेक है, इच्छाएँ हैं, आकांक्षाएँ हैं और कर्म करने की क्षमता है।
इस राज्य की सत्ता जिस प्रवृत्ति के हाथ में होगी, जीवन उसी दिशा में चलेगा।
यदि अहंकार शासक बन जाए, तो मनुष्य स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है।
यदि लोभ सत्ता में आ जाए, तो आवश्यकता की सीमा समाप्त हो जाती है और संग्रह ही जीवन का उद्देश्य बन जाता है।
यदि क्रोध शासन करने लगे, तो विवेक मौन हो जाता है।
यदि मोह निर्णय लेने लगे, तो अन्याय भी अपने लोगों के पक्ष में उचित दिखाई देने लगता है।
यदि सत्ता का नशा चढ़ जाए, तो मनुष्य दूसरों की स्वतंत्रता और गरिमा को अपने अधिकार के नीचे दबाने लगता है।
यही रावण की सत्ता का स्वरूप है।
यह सत्ता हमेशा किसी बाहरी शत्रु के रूप में नहीं आती। यह हमारे अपने विचारों, इच्छाओं, मान्यताओं और आदतों के माध्यम से स्थापित होती है।
धीरे-धीरे हम उसके अधीन हो जाते हैं, लेकिन हमें लगता है कि हम स्वतंत्र हैं।
हम कहते हैं, यह मेरा स्वभाव है।
यह मेरा अधिकार है।
यह मेरी प्रतिष्ठा है।
यह मेरी उपलब्धि है।
यह मेरी इच्छा है।
लेकिन क्या हमने कभी पूछा कि इन इच्छाओं का स्वामी कौन है? हमारे निर्णयों को दिशा कौन दे रहा है? हमारे भीतर शासन कौन कर रहा है?
जिस सत्ता के अधीन होकर हम अपने विवेक के विरुद्ध आचरण करते हैं, उसी सत्ता की पहचान करना आत्ममंथन की पहली सीढ़ी है।
2. रावण केवल बाहर नहीं, भीतर भी शासन करता है
हम रावण को बाहर खोजने के अभ्यस्त हो गए हैं।
हम दूसरे व्यक्ति में अहंकार देखते हैं, दूसरे समुदाय में दोष खोजते हैं, दूसरे शासक में अत्याचार पहचानते हैं और दूसरे के व्यवहार पर निर्णय सुनाते हैं।
लेकिन अपने भीतर स्थापित सत्ता की जाँच करना भूल जाते हैं।
हमारी वाणी में अपमान है, लेकिन हमें अपना अधिकार दिखाई देता है।
हमारे कर्मों में स्वार्थ है, लेकिन हमें अपनी मजबूरी दिखाई देती है।
हमारे निर्णयों में पक्षपात है, लेकिन हमें अपने संबंध दिखाई देते हैं।
हमारे व्यवहार में अन्याय है, लेकिन हमें अपनी प्रतिष्ठा दिखाई देती है।
यह कैसी सत्ता है, जो हमारे दोषों को गुण और दूसरों के गुणों को दोष में बदल देती है?
यह कैसी व्यवस्था है, जिसमें अपने लिए नियम अलग और दूसरों के लिए अलग हो जाते हैं?
यही भीतर की सत्ता का खेल है।
रावण की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसकी सामर्थ्य नहीं थी। उसकी कथा हमें यह सोचने का अवसर देती है कि ज्ञान, शक्ति और वैभव के होते हुए भी मनुष्य अपने अहंकार और आसक्ति के अधीन कैसे हो सकता है।
अतः प्रश्न केवल ज्ञान प्राप्त करने का नहीं, बल्कि यह जानने का भी है कि उस ज्ञान पर किसका नियंत्रण है।
प्रश्न केवल शक्ति अर्जित करने का नहीं, बल्कि यह भी है कि शक्ति का उपयोग कौन-सी चेतना कर रही है।
प्रश्न केवल प्रतिष्ठा पाने का नहीं, बल्कि यह भी है कि उस प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए हम क्या-क्या करने को तैयार हैं।
जब ज्ञान पर अहंकार, शक्ति पर लोभ और कर्म पर स्वार्थ का शासन हो, तब बाहरी वैभव के बावजूद भीतर की स्वतंत्रता समाप्त होने लगती है।
3. राम का अर्थ है सत्ता से मुक्ति या सत्ता का रूपांतरण?
यदि रावण हमारे शरीररूपी राज्य में स्थापित एक ऐसी सत्ता है, जो हमें अहंकार, लोभ, मोह और असंवेदनशीलता के अधीन रखती है, तो राम किसका प्रतीक हैं?
इस चिंतन में राम उस सार्वभौमिक चेतना के प्रतीक हैं, जो मनुष्य को अपने संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठकर समस्त जीवन के साथ अपने संबंध को पहचानने की प्रेरणा देती है।
वह चेतना, जो दूसरे के दुःख को देखकर उदासीन नहीं रह सकती।
वह विवेक, जो अपने लाभ के लिए अन्याय को उचित नहीं ठहराता।
वह करुणा, जो किसी मनुष्य की गरिमा को उसकी जाति, धर्म, संपत्ति, पद या प्रतिष्ठा से नहीं मापती।
वह मर्यादा, जो शक्ति होते हुए भी उसके दुरुपयोग से रोकती है।
और वह आत्मबोध, जो हमें अपनी सीमाओं तथा अपने दोषों को स्वीकार करने का साहस देता है।
राम का जागरण केवल किसी नाम का उच्चारण नहीं है। इस लेख में यह अपने भीतर ऐसी चेतना को स्थान देने का प्रतीक है, जो हमारे विचारों और कर्मों को अधिक न्यायपूर्ण, करुणामय और उत्तरदायी बनाती है।
यहाँ प्रश्न किसी धार्मिक पहचान का नहीं, बल्कि जीवन को संचालित करने वाले मूल्यों का है।
क्या हमारी बुद्धि अहंकार की सेवक है या विवेक का माध्यम?
क्या हमारी वाणी दूसरों को अपमानित करने का हथियार है या संवाद का साधन?
क्या हमारी शक्ति दूसरों को अधीन करने के लिए है या उनकी रक्षा और सहायता के लिए?
क्या हमारा ज्ञान स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए है या अज्ञान को दूर करने के लिए?
क्या हमारी संपत्ति केवल हमारे उपभोग के लिए है या उसमें दूसरों के प्रति उत्तरदायित्व की भी कोई जगह है?
इन प्रश्नों के उत्तर से ही पता चलता है कि हमारे शरीररूपी राज्य में किस प्रकार की सत्ता प्रभावी है।
4. रावण की लंका केवल सोने की नहीं होती
रावण की सत्ता को बनाए रखने के लिए लंका आवश्यक है।
लेकिन हर लंका सोने, महलों और भौतिक वैभव से नहीं बनती।
कुछ लंकाएँ हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा से बनती हैं।
कुछ पद और अधिकार से।
कुछ जाति, धर्म और समुदाय के श्रेष्ठ होने के दंभ से।
कुछ ज्ञान और विद्वत्ता के अहंकार से।
और कुछ हमारी उस छवि से, जिसे बनाए रखने के लिए हम सत्य तक को छिपाने लगते हैं।
हम चाहते हैं कि लोग हमारा सम्मान करें, लेकिन हम दूसरों का सम्मान करना भूल जाते हैं।
हम चाहते हैं कि लोग हमारी बात सुनें, लेकिन हम किसी कमजोर की आवाज सुनने को तैयार नहीं होते।
हम न्याय की माँग करते हैं, लेकिन अपने हितों के विरुद्ध न्याय होने लगे तो उसके सिद्धांत बदल देते हैं।
हम सत्य का समर्थन करते हैं, लेकिन सत्य हमारे अहंकार को चोट पहुँचाए तो उससे बचने लगते हैं।
इस प्रकार लंका केवल बाहर निर्मित नहीं होती। उसका निर्माण हमारे भीतर भी होता है।
उसकी दीवारें हमारे बहानों से बनती हैं।
उसके द्वार हमारे पूर्वाग्रहों से बंद होते हैं।
उसके प्रहरी हमारी असुरक्षाएँ होती हैं।
और उसका सिंहासन हमारा अहंकार होता है।
हम उस लंका की रक्षा करते रहते हैं, क्योंकि हमें लगता है कि उसके नष्ट होने से हमारी पहचान मिट जाएगी।
लेकिन क्या हमारी पहचान इतनी कमजोर है कि सत्य स्वीकार करने से समाप्त हो जाए?
क्या हमारी प्रतिष्ठा इतनी खोखली है कि गलती मानने से गिर जाए?
क्या हमारी महानता दूसरों को छोटा किए बिना स्थापित नहीं हो सकती?
जिस लंका की रक्षा के लिए हमें अपने विवेक, करुणा और सत्य का त्याग करना पड़े, वह हमारी उपलब्धि नहीं, हमारी पराधीनता है।
5. सत्ता केवल राजनीतिक नहीं होती
सत्ता की चर्चा करते समय हम अक्सर राजा, शासक, सरकार और संस्थाओं के बारे में सोचते हैं।
लेकिन सत्ता का एक सूक्ष्म स्वरूप हमारे दैनिक जीवन में भी मौजूद है।
माता-पिता की सत्ता, जो प्रेम के नाम पर संतान की स्वतंत्रता को नियंत्रित कर सकती है।
शिक्षक की सत्ता, जो ज्ञान देने के बजाय प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता छीन सकती है।
धनवान की सत्ता, जो आर्थिक निर्भरता का लाभ उठाकर कमजोर व्यक्ति का शोषण कर सकती है।
संस्था की सत्ता, जो अपने पद और प्रतिष्ठा को बचाने के लिए अन्याय को छिपा सकती है।
समाज की सत्ता, जो परंपरा के नाम पर विवेकपूर्ण प्रश्नों को दबा सकती है।
और व्यक्ति की अपनी आंतरिक सत्ता, जो उसे अपनी इच्छाओं, भय, क्रोध और अहंकार का बंदी बना सकती है।
इन सभी परिस्थितियों में एक प्रश्न महत्त्वपूर्ण है:
सत्ता किसके लिए और किस प्रकार प्रयोग की जा रही है?
क्या वह जीवन को अधिक स्वतंत्र, न्यायपूर्ण और गरिमामय बना रही है?
या वह किसी व्यक्ति अथवा समूह को दूसरों पर अनुचित नियंत्रण स्थापित करने का साधन बन रही है?
सत्ता का अस्तित्व अपने आप में रावण नहीं है। शासन, अनुशासन और अधिकार की आवश्यकता हो सकती है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब सत्ता विवेक और उत्तरदायित्व से मुक्त होकर अपने ही विस्तार को उद्देश्य बना लेती है।
यही बात हमारे भीतर भी लागू होती है।
इच्छाओं का होना समस्या नहीं है। समस्या तब है, जब इच्छाएँ हमारे विवेक को नियंत्रित करने लगें।
ज्ञान का होना समस्या नहीं है। समस्या तब है, जब ज्ञान हमें विनम्र बनाने के बजाय अहंकारी बना दे।
शक्ति का होना समस्या नहीं है। समस्या तब है, जब शक्ति हमें दूसरों के अधिकारों की अवहेलना करने लगे।
इसलिए रावण की सत्ता को पहचानना, सत्ता के हर स्वरूप को नकारना नहीं है। यह उस प्रवृत्ति को पहचानना है, जो स्वयं को सर्वोच्च मानकर किसी मर्यादा को स्वीकार नहीं करना चाहती।
6. अपने भीतर के राज्य में सत्ता परिवर्तन कैसे होगा?
केवल यह कह देने से कि हमारे भीतर राम जागने चाहिए, कुछ नहीं बदलेगा।
सत्ता का परिवर्तन व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।
जब क्रोध उठे और हम उसके प्रभाव में किसी को अपमानित करने से स्वयं को रोकें, तो विवेक को स्थान मिलता है।
जब स्वार्थ हमें किसी कमजोर व्यक्ति का लाभ उठाने के लिए प्रेरित करे और हम ऐसा करने से इनकार करें, तो न्याय को स्थान मिलता है।
जब अपनी गलती स्वीकार करने से प्रतिष्ठा गिरने का भय हो और हम फिर भी सत्य बोलें, तो ईमानदारी को स्थान मिलता है।
जब किसी दूसरे की पीड़ा हमारे निजी लाभ से अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाए, तो करुणा को स्थान मिलता है।
जब हम किसी से असहमत होते हुए भी उसके मानवीय सम्मान की रक्षा करें, तो मर्यादा को स्थान मिलता है।
और जब हम अपने भीतर के दोषों को दूसरों पर आरोपित करने के बजाय स्वयं में पहचानें, तो आत्मबोध की शुरुआत होती है।
यह कोई एक दिन में पूरा होने वाला परिवर्तन नहीं है।
रावण की सत्ता हमारे भीतर अनेक रूपों में लौट सकती है। अहंकार कभी ज्ञान बनकर आएगा, कभी विनम्रता का दिखावा बनकर, कभी धार्मिक श्रेष्ठता बनकर और कभी सामाजिक प्रतिष्ठा की चिंता बनकर।
इसलिए आत्ममंथन भी निरंतर होना चाहिए।
हमें बार-बार स्वयं से पूछना होगा:
मेरे निर्णयों को कौन संचालित कर रहा है?
मेरी वाणी पर किसका प्रभाव है?
मेरे कर्म किस चेतना से उत्पन्न हो रहे हैं?
मैं अपनी शक्ति का उपयोग किसके हित में कर रहा हूँ?
और सबसे महत्त्वपूर्ण—क्या मैं अपने भीतर की सत्ता को प्रश्नों के सामने खड़ा करने का साहस रखता हूँ?
7. दशहरा: पुतले का दहन या सत्ता का अंत?
हर वर्ष रावण का पुतला जलता है।
लेकिन पुतला जलने और सत्ता समाप्त होने में अंतर है।
किसी व्यक्ति का प्रतीकात्मक दहन करना आसान है। अपनी प्रवृत्तियों को बदलना कठिन है।
बाहरी उत्सव में हम दर्शक हो सकते हैं, लेकिन आंतरिक परिवर्तन में हमें स्वयं भाग लेना पड़ता है।
यदि पुतला जलने के बाद भी हमारी वाणी में अपमान, कर्म में अन्याय, विचार में घृणा और व्यवहार में असंवेदनशीलता बनी रहती है, तो उत्सव ने हमारे भीतर की सत्ता को नहीं बदला।
यदि हम राम का नाम लेते हुए भी दीन-दुःखियों की वेदना से अनजान बने रहते हैं, तो हमें अपने आचरण पर विचार करना चाहिए।
यदि हम धर्म और संस्कृति की महानता का गुणगान करते हुए मनुष्य की गरिमा भूल जाते हैं, तो हमें अपनी प्राथमिकताओं की समीक्षा करनी चाहिए।
और यदि हम अपने से कमजोर व्यक्ति को दबाकर स्वयं को विजयी मानते हैं, तो हमें यह समझने की आवश्यकता है कि हर विजय नैतिक विजय नहीं होती।
सच्चा प्रश्न यह नहीं कि हमने रावण के पुतले को कितनी बार जलाया।
सच्चा प्रश्न यह है कि हमने अपने भीतर की किस सत्ता को चुनौती दी।
किस अन्याय का समर्थन करना बंद किया।
किस अहंकार को पहचाना।
किस पीड़ित की आवाज सुनी।
और किस अवसर पर अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर न्याय का साथ दिया।
यही वे छोटे-छोटे कर्म हैं, जिनसे हमारे भीतर की सत्ता का स्वरूप बदल सकता है।
अंतिम प्रश्न: तुम्हारे शरीररूपी राज्य में राज किसका है?
अपने भीतर झाँको।
पहचानो कि तुम्हारे शरीररूपी राज्य में कौन शासन कर रहा है।
क्या तुम्हारी बुद्धि स्वतंत्र है, या अहंकार के आदेशों का पालन करती है?
क्या तुम्हारा विवेक जागृत है, या स्वार्थ के सामने मौन हो जाता है?
क्या तुम्हारी वाणी करुणा से संचालित होती है, या क्रोध और घृणा से?
क्या तुम्हारे कर्म न्याय को स्थापित करते हैं, या तुम्हारी निजी प्रतिष्ठा और लाभ को?
क्या तुम्हारे भीतर जन-जन में, कण-कण में व्याप्त उस सार्वभौमिक चेतना के प्रति संवेदना है, जो हमें दीन-दुःखियों की वेदना से जोड़ती है?
या तुम्हारी चेतना झूठी आन-बान-शान की लंका में कैद है?
रावण को केवल मारना नहीं है। उस सत्ता को पहचानना है, जो हमारे भीतर राज करती है।
और राम को केवल पूजना नहीं है। उस चेतना को अपने जीवन में स्थान देना है, जो हमें अहंकार से विनम्रता, स्वार्थ से करुणा और अन्याय से न्याय की ओर ले जाती है।
क्योंकि जब तक भीतर की सत्ता नहीं बदलती, तब तक बाहर का उत्सव अधूरा है।
जब तक वाणी और कर्म नहीं बदलते, तब तक विजय का दावा अधूरा है।
और जब तक हम अपने भीतर बैठे शासक से प्रश्न नहीं करते, तब तक हम अपनी ही चेतना के राज्य में स्वतंत्र नहीं हैं।
पहचान लो अपने अंदर किस रावण को बैठाया है।
वह तुम्हारे शरीररूपी राज्य में राज कर रहा है, या तुम्हारे भीतर रामरूपी चेतना जाग उठी है?
यही दशहरा है। यही आत्ममंथन है। और शायद यही मनुष्य की वास्तविक मुक्ति की शुरुआत है।
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