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ये बातें झूठी बातें हैं, ये बातें झूठी बातें हैं
ये लोगों ने फैलाई हैं
ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम इन्शा जी का नाम ना लो
तुम इन्शा जी का नाम ना लो
क्या इन्शा जी सौदाई हैं
ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं
ये बातें, ये बातें
हैं लाखों रोग ज़माने में क्यों इश्क़ है रुसवा बेचारा
हैं और भी वजहें वहशत की इन्सां को रखती दुखियारा
हां बेकल बेकल रहता है हो प्रीत में जिसने दिल हारा
पर शाम से ले कर सुबहों तलक यूं कौन खड़े है आवारा
ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं
ये बातें, ये बातें
गर इश्क़ किया है तब क्या है क्यों शाद नही आबाद नहीं
जो जान लिये बिन टल ना सके ये ऐसी भी उफताद नहीं
ये बात तो तुम भी मानोगे वो कैश नहीं फ़रीहाद नहीं
क्या हिज़्र का दारु मुश्किल है क्या वस्ल की नुस्खे याद नहीं
ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं
ये बातें, ये बातें
जो हमसे कहो हम करते हैं क्या इन्शा को समझाना है
उस लड़की से भी कह लेंगे वो अब कुछ और ज़माना है
या छोड़े या तकमील करें ये इश्क है या अफ़साना है
ये कैसा गोरख धंधा है, ये कैसा ताना बाना है
ये बातें झूठी बातें हैं, ये बातें झूठी बातें हैं
ये लोगों ने फैलाई हैं, तुम इन्शा जी का नाम ना लो
तुम इन्शा जी का नाम ना लो क्या इन्शा जी सौदाई हैं
ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं
ये बातें, ये बातें, ये बातें, ये बातें, ये बातें
निर्बल के बल राम
ये बातें झूठी बातें हैं, ये पंडितों ने फैलाई है,
"जय हनुमान ज्ञान गुण सागर", पर बात समझ न आई है।
जो राक्षसों के अभिमान और भय दूर करे, वही हनुमान कहलाई है,
एकहि बाण प्राण हरि लीन्हा, यही राम का प्रण, नीति कहलाई है
एक मुक्के से ही राक्षस का भय आतंक दूर कर दीन्हा, वही राम का दास, चरण सुखदायी है
उपजत हैं झाड़ी हरियाली में, चाणक्य नीति झाड़ी काट कर रास्ता बनाई है,
झाड़ी मतलब काँख के बाल, जहां खून पसीना की कमाई है, ता कर दुर्गंध नशाई है।
जो पेड़ फल फूल छाँव और सुकून देते हैं, वही शुभ चरित, संत स्वभाव जनाई है,
ज्यों रेगिस्तान की कटीली मरुभूमि में, डेट्स खजूर के साथ कहवा चाय पिलाई है।
राम नाम की महिमा गाते, दुनिया भर में ढोल बजाई है,
पर भूखे के खाली पेट में, कितनी बार खिचड़ी पकाई है?
मंदिर में चढ़ता है सोना, बाहर निर्धन की शामत आई है,
पत्थर के भगवान सजाए, जीवित जनता ठुकराई है।
हनुमान की गदा का मतलब, निर्बल पर बल दिखलाना नहीं,
दुष्टों के अभिमान मिटाना, अन्याय के आगे झुक जाना नहीं।
रामराज्य की बातें करते, नीति की खूब दुहाई है,
पूछो उस मजदूर से जिसने, भूखे पेट रात बिताई है।
जो दिन भर धूप में जलता है, जो मेहनत से अन्न उगाता है,
उसके हिस्से में क्या आता, जो महलों को बनवाता है?
जिसके हाथों में हैं छाले, जिसने जीवन खपाया है,
उसकी मेहनत का फल किसने, अपने नाम लिखाया है?
चाणक्य नीति पढ़ने वाले, पहले इतना ज्ञान कमाओ,
काँटों से जो राह बनाते, उनका भी सम्मान बढ़ाओ।
झाड़ी काटो, राह बनाओ, पर वृक्षों को मत कटवाना,
जो छाया देते हैं सबको, उनका अस्तित्व न मिटवाना।
खजूर खड़ा है तपती रेत में, फिर भी फल बरसाता है,
काँटों के इस कठिन सफर में, मीठा रस दे जाता है।
कहवा हो या चाय की प्याली, प्रेम जहाँ पर छलकाई है,
वहीं पर मानवता ने अपनी, सबसे सुंदर छवि दिखाई है।
जाति-धर्म के झगड़े छोड़ो, कर्मों की पहचान करो,
जो निर्बल का हाथ थाम ले, उसका तुम सम्मान करो।
राम नहीं केवल राजमहल में, राम झोपड़ी में भी रहते हैं,
जहाँ किसी की पीड़ा सुनकर, लोग सहायता को बहते हैं।
हनुमान नहीं केवल मूर्ति, साहस का प्रतिरूप बताए,
जो भयभीत जनों के मन में, विश्वास का दीप जलाए।
रावण केवल दस सिर वाला, इतना भर इतिहास नहीं,
अहंकार जब सिर पर चढ़ जाए, उससे बड़ा विनाश नहीं।
किसी गरीब का हक छीनकर, धर्म ध्वजा लहराई है,
फिर किस मुँह से कहता है तू, तेरी भक्ति सच्चाई है?
जो अपने से कमजोरों पर, अपनी ताकत आजमाए,
वह कैसा बलवान हुआ जो, निर्बल को ही डरवाए?
बलवान वही जो संकट में, दूसरों की ढाल बने,
धनवान वही जो बाँट सके, दुखियों का भी ख्याल करे।
पंडित हो या ज्ञानी कोई, पहले मन का मैल मिटाओ,
पोथी के अक्षर बाद में पढ़ना, पहले इंसान बन जाओ।
ज्ञान वही जो राह दिखाए, गुण वह जो व्यवहार में आए,
भक्ति वही जो दीन-दुखी के, आँसू पोंछने काम में आए।
निर्बल के बल राम हैं, यह बात पुरानी सच्ची है,
पर राम को समझने वालों की, दुनिया में कमी ही कमी है।
जयकारों से पेट न भरता, भाषण से दुख जाता नहीं,
केवल नाम जपाने से, अन्याय कहीं मिटता नहीं।
राम का प्रण, हनुमान का साहस, चाणक्य की बुद्धिमानी,
इन सबका सच्चा अर्थ समझना, यही मनुज की निशानी।
जो निर्बल के साथ खड़ा है, वही राम का प्यारा है,
जो अन्याय के आगे झुकता, वह खुद से भी हारा है।
निर्बल के बल राम कहाए, यही हमारी वाणी है,
मानवता की रक्षा करना, सबसे बड़ी कहानी है।
पढ़ाई क्या होत है भाई?
एक व्यंग्यात्मक कविता
पढ़ाई क्या होत है भाई,
ये जुमलेबाज पंडिताई करने वाले,
लट्ठबाज लम्पट से पूछोगे?
अरे भाई, जरा ठहरो,
पहले शब्दों का अर्थ तो समझो,
कौन पढ़ा है, कौन गढ़ा है,
कौन ज्ञान का ठेकेदार है,
और कौन बस जुमलों का दुकानदार है!
पढ़ाई क्या होत है?
पढ़ाई का मतलब डिगरी नहीं,
न कंठस्थ किए हुए चार श्लोक हैं,
न ऊँची आवाज में भाषण देना,
न हर बहस में जीत के शौक हैं।
पढ़ाई वह जो प्रश्न उठाए,
तर्क करे, प्रमाण दिखाए,
गलती अपनी सामने आए,
तो सिर झुकाकर उसे सुधारे।
पर जिसने अक्षर तो पढ़ डाले,
अर्थ समझने से इनकार किया,
उसने पोथी सिर पर रख ली,
पर विवेक को बाहर कर दिया!
जुमलेबाज कौन है?
जिसकी बात में शब्द बहुत हैं,
पर बातों में सार नहीं,
जो हर प्रश्न का उत्तर दे दे,
पर उत्तर में आधार नहीं।
आज कहे कि चाँद उतारूँ,
कल कह दे आकाश झुकाऊँ,
जब हिसाब माँगो वादों का,
तो इतिहास तुम्हें समझाऊँ!
न काम का कोई लेखा-जोखा,
न वादों का हिसाब है,
बस नारों की ऊँची मीनारें,
और जनता से सवाल—
बताओ, इससे बड़ा विकास क्या है?
जुमले से पेट नहीं भरता,
न भाषण से खेत लहलहाते हैं,
मेहनत करने वाले हाथ ही,
घर-परिवार चलाते हैं।
पंडिताई क्या है?
पंडित होना दोष नहीं है,
ज्ञान साधना का मान है,
दोष वहाँ है जहाँ विद्वता,
केवल दिखावे की दुकान है।
पंडिताई जब पाखंड बने,
जब ज्ञान अहंकार बढ़ाए,
जब प्रश्न पूछने वाले को,
मूर्ख कहकर चुप करवाए।
जब पोथी की आड़ में कोई,
अपना ही व्यापार चलाए,
जब धर्म का मर्म छोड़कर,
बस अपना प्रभुत्व जमाए।
तब पूछो उससे—हे ज्ञानी,
ज्ञान तुम्हारे किस काम आया?
अगर मनुष्य से प्रेम न सीखा,
तो क्या पढ़ा और क्या पाया?
लट्ठबाज कौन है?
जिसके पास तर्क नहीं है,
वह लट्ठ का सहारा लेता है,
जिससे प्रश्नों का उत्तर न बने,
वह डर का कारोबार करता है।
वह समझता है बल ही सत्य है,
जिसकी लाठी, उसकी बात,
पर लाठी से मौन मिलेगा,
कहाँ मिलेगा तर्क का साथ?
जो बहस में प्रमाण न दे पाए,
वह धमकी पर उतर आए,
जो विचार से जीत न सके,
वह सामने वाले को डराए।
अरे भाई, बल का अर्थ बताओ,
क्या निर्बल को दबाना है?
या अन्याय के सम्मुख खड़े होकर,
कमजोर का साथ निभाना है?
लम्पट कौन है?
यह शब्द भी जरा समझ लो,
केवल पहनावे से पहचान नहीं,
लम्पट वह आचरण है जिसमें,
मर्यादा और सम्मान नहीं।
जो दूसरों को उपदेश सुनाए,
पर खुद सीमा लाँघता जाए,
जो सम्मान की बातें करके,
दूसरों का सम्मान मिटाए।
जो पद, धन या ताकत पाकर,
अपने को भगवान समझे,
दूसरों की गरिमा कुचलकर,
अपने को महान समझे।
ऐसे चरित्र से पूछोगे,
कि शिक्षा का अर्थ क्या होता है?
जिसके आचरण में ज्ञान न झलके,
उसका उपदेश किस काम का होता है?
अब बताओ, पढ़ाई क्या होत है भाई?
पढ़ाई वह जो आँखें खोले,
अंधविश्वास पर प्रश्न उठाए,
सत्य अगर अपने विरुद्ध हो,
तो भी सत्य को अपनाए।
पढ़ाई वह जो भेद मिटाए,
मेहनत का सम्मान कराए,
जाति, पद और धन से ऊपर,
इंसान को इंसान बनाए।
पढ़ाई वह जो सत्ता से पूछे,
वादों का हिसाब कहाँ है?
जो धर्म के नाम पर पूछे,
मानवता का स्थान कहाँ है?
जो विद्वान को भी परखे,
जो अपने विचारों को जाँचे,
जो प्रमाण बिना किसी दावे को,
आँख मूँदकर कभी न माने।
ज्ञान का अर्थ नहीं अकड़ना,
न हर बात पर जीत मनाना,
ज्ञान का अर्थ है सच के आगे,
अपनी भूल को पहचानना।
इसलिए भाई, प्रश्न यही है,
किससे ज्ञान की बात करोगे?
जो तर्क छोड़कर लट्ठ उठाए,
उससे शिक्षा की बात करोगे?
जो जुमलों से जनता बहलाए,
जो पंडिताई का ढोंग रचाए,
जो अपने आचरण से गिरकर,
दूसरों को धर्म सिखाए।
पढ़ाई क्या होत है भाई?
डिगरी से पहले समझ जरूरी,
शब्दों से पहले विचार,
ज्ञान से पहले विनम्रता जरूरी,
और सबसे ऊपर सदाचार।
क्योंकि पढ़ा-लिखा होना अलग है,
और शिक्षित होना अलग;
अक्षर पढ़ना आसान है भाई,
अपने भीतर का अंधकार मिटाना कठिन!
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