नीयत का आईना और कर्म का जाल
जब धर्म, कर्म, योग और ध्यान—सत्ता की भाषा के अलंकार बन जाएँ
राजनीतिक विमर्श में आजकल शब्दों की कोई कमी नहीं है।
धर्म है। कर्म है। योग है। ध्यान है। भक्ति है। सेवा है। राष्ट्र है। त्याग है।
शब्द इतने पवित्र हैं कि सुनने वाला कुछ क्षण के लिए स्वयं को आध्यात्मिक सभा में समझने लगता है।
लेकिन एक छोटा-सा प्रश्न अक्सर छूट जाता है—
कर्म के पीछे नीयत क्या है?
क्योंकि उद्देश्य, प्रयोजन और नीयत एक ही बात नहीं हैं।
उद्देश्य बताया जा सकता है।
प्रयोजन समझाया जा सकता है।
लेकिन नीयत अक्सर कर्मों के बीच से दिखाई देती है।
कोई कह सकता है—
“मेरा उद्देश्य जनसेवा है।”
बहुत सुंदर।
लेकिन यदि उसी सेवा के पीछे सत्ता पाने की इच्छा, विरोधी से प्रतिशोध, अपना वर्चस्व स्थापित करने की लालसा या अपनी कुर्सी बचाने की चिंता हो, तो प्रश्न उद्देश्य का नहीं, नीयत का बन जाता है।
नीयत, प्रयोजन और उद्देश्य
सरल भाषा में कहें तो—
उद्देश्य है — मैं हासिल क्या करना चाहता हूँ?
प्रयोजन है — यह काम किसलिए किया जा रहा है?
और नीयत है — अंदर से मैं वास्तव में चाहता क्या हूँ?
यहीं राजनीति और आध्यात्मिकता का एक दिलचस्प संगम दिखाई देता है।
क्योंकि राजनीति में घोषित उद्देश्य और वास्तविक नीयत के बीच का अंतर ही कभी-कभी पूरे विमर्श को उलझा देता है।
और जब उस उलझन को ढकने के लिए गीता, धर्म, योग, ध्यान और भक्ति जैसे शब्दों का इस्तेमाल होने लगे, तब व्यंग्य अपने आप जन्म लेता है।
शब्दों का जाल
धर्म लिया, कर्म लिया,
योग लिया, ध्यान लिया,
भक्ति की भी चादर ओढ़ी,
और सत्ता का मान लिया!
कहते हैं—“निष्काम कर्म है,
जनसेवा ही धर्म हमारा,”
पीछे देखा तो कुर्सी बोली—
“भाई! मुझसे है प्यार तुम्हारा!”
भाव अगर हो अहंकार का,
कर्म बने फिर कैसा योग?
बदले की अग्नि भीतर जलती,
ऊपर गीता का सुंदर श्लोक!
कभी वर्चस्व, कभी प्रतिशोध,
कभी सम्मान की भूख निराली,
शब्दों से साधु बनने निकले,
नीयत निकली सत्ता वाली।
धर्म-कर्म के मंत्र बहुत थे,
योग-ध्यान के भाषण भारी,
पर मकड़ी ने जाल बुना था—
धागे सारे अपने ही थे प्यारे!
अब फँसे हैं अपने जाल में,
फड़फड़ करते रात-दिन,
जितना खींचें “धर्म” की डोरी,
उतना उलझें कर्मों में फिर।
गीता शायद चुपचाप पूछे—
“कर्म नहीं, भाव भी देखो;
कुर्सी बचाने निकले हो तो
‘निष्काम’ शब्द को थोड़ा छोड़ो!”
सत्ता आए, सत्ता जाए,
शब्दों का बाजार रहे;
पर अंतर्मन के आईने में
चेहरा अपना साफ रहे।
कर्म की ऊँची बातें करने से
कर्मयोगी कोई नहीं बनता;
भाव शुद्ध हो, अहंकार शून्य हो,
तभी निष्काम कर्म जन्मता।
असली प्रश्न कर्म का नहीं, कर्ता का है
गीता का कर्मयोग केवल यह नहीं कहता कि कर्म करते रहो।
प्रश्न यह भी है कि कर्म करते समय तुम्हारा आंतरिक भाव क्या है?
यदि कर्म के पीछे—
- अहंकार है,
- प्रतिशोध है,
- व्यक्तिगत लाभ है,
- प्रतिष्ठा की भूख है,
- सत्ता का विस्तार है,
- वर्चस्व स्थापित करने की इच्छा है,
- या केवल अपनी कुर्सी बचाने की चिंता है,
तो बाहर से कर्म चाहे कितना भी महान दिखाई दे, भीतर का प्रश्न फिर भी बना रहता है—
क्या यह निष्काम कर्म है, या किसी कामना का अत्यंत सुंदर राजनीतिक पैकेज?
यही वह जगह है जहाँ धर्म की भाषा और धर्मभाव अलग हो जाते हैं।
धर्म का नाम लेना सरल है।
धर्म के अनुरूप आचरण करना कठिन।
गीता का श्लोक उद्धृत करना सरल है।
उसके भाव को अपने आचरण में उतारना कठिन।
योग की बात करना सरल है।
अपने अहंकार से योग करना कठिन।
मकड़ी का जाल
राजनीति में शब्द कभी-कभी मकड़ी के जाले की तरह होते हैं।
पहले एक शब्द—
धर्म।
फिर दूसरा—
कर्म।
फिर—
योग।
फिर—
ध्यान।
फिर—
भक्ति।
फिर—
सेवा।
और अंततः इन सबको जोड़कर एक ऐसा जाल तैयार हो जाता है जिसमें स्वयं बोलने वाला ही फँस जाता है।
क्योंकि शब्दों से बनाई गई छवि और कर्मों से दिखाई देने वाली नीयत के बीच यदि दूरी बहुत बढ़ जाए, तो एक दिन वही शब्द प्रश्न बनकर सामने खड़े हो जाते हैं।
तब समस्या विरोधियों की नहीं रहती।
समस्या अपने ही शब्दों की हो जाती है।
राजनीति का सबसे कठिन प्रश्न
किसी भी राजनीतिक व्यक्ति या विचार को समझने के लिए केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि—
“उसने क्या कहा?”
यह भी देखना होगा—
“उसने क्या किया?”
और उससे भी आगे—
“उसके कर्मों से कौन-सा हित साकार हुआ?”
लेकिन अंतिम प्रश्न फिर भी सबसे कठिन है—
“उस कर्म के पीछे नीयत क्या थी?”
यह प्रश्न किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं के विवेक को जागृत रखने के लिए है।
क्योंकि सत्ता में बैठे व्यक्ति ही नहीं, हम सब कभी-कभी अपने कर्मों को सुंदर शब्दों से सजाने लगते हैं।
दान को प्रतिष्ठा बना देते हैं।
सेवा को पहचान बना देते हैं।
त्याग को अहंकार बना देते हैं।
धर्म को पहचान की राजनीति बना देते हैं।
और कभी-कभी आध्यात्मिकता को भी सामाजिक वर्चस्व का साधन बना देते हैं।
इसलिए यह व्यंग्य केवल राजनीति पर नहीं है।
यह हम सबके भीतर बैठे उस छोटे-से अहंकार पर भी है, जो अपने स्वार्थ को सदैव किसी महान उद्देश्य का नाम देना चाहता है।
निष्काम कर्म की असली परीक्षा
निष्काम कर्म का अर्थ कर्म छोड़ देना नहीं है।
बल्कि शायद उल्टा—
कर्म करते हुए अपने भीतर के स्वार्थ को पहचानना।
सम्मान मिले तो ठीक।
न मिले तो भी ठीक।
सत्ता मिले तो ठीक।
न मिले तो भी ठीक।
प्रशंसा मिले तो ठीक।
आलोचना मिले तो भी कर्म का धर्म न बदले।
तब शायद कर्म, केवल राजनीतिक रणनीति नहीं रहता।
वह साधना बन सकता है।
और शायद यही वह अंतर है जहाँ—
“धर्म की बात करने वाला”
और
“धर्मभाव से कर्म करने वाला”
दो अलग व्यक्तित्व बन जाते हैं।
अंत में एक सवाल
अगली बार जब कोई बहुत सुंदर शब्दों में धर्म, कर्म, योग, ध्यान, भक्ति और निष्काम सेवा की बात करे, तो उसके शब्दों से प्रभावित होने से पहले बस एक प्रश्न अपने भीतर उठाइए—
“सुंदर शब्दों के पीछे नीयत क्या है?”
क्योंकि—
उद्देश्य बताया जाता है,
प्रयोजन समझाया जाता है,
लेकिन नीयत…
कर्मों में दिखाई देती है।
और अंततः—
शब्दों से नहीं,
कर्मों के पीछे छिपे भाव से
मनुष्य का असली परिचय होता है।
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