Tuesday, September 29, 2026

केहि आराधहु का तुम्ह चहहू? मो सन सत्य बात किन कहहू।

 

केहि आराधहु का तुम्ह चहहू?

मो सन सत्य बात किन कहहू।

**एक प्रश्न से यात्रा शुरू हुई थी।

शायद अब उसी प्रश्न के सामने स्वयं को खड़ा करने का समय है।**

हमने संगीत सीखा।

स्वर सीखे।
राग सीखे।
ताल समझे।
बंदिशें सीखीं।
गुरु से परम्परा ग्रहण की।
रियाज़ किया।
शास्त्र पढ़ा।
शोध किया।

फिर पूछा—

संगीत क्या है?

उत्तर मिला—

नाद।

फिर पूछा—

नाद क्या है?

उत्तर खोजते-खोजते पहुँचे—

स्वर तक।

स्वर से—

राग।

राग से—

रस।

रस से—

भाव।

भाव से—

भक्ति।

और भक्ति से—

आराधना।

लेकिन यहीं आकर यात्रा समाप्त नहीं होती।

यहीं से सबसे कठिन प्रश्न प्रारम्भ होता है—

“केहि आराधहु का तुम्ह चहहू?”

तुम किसकी आराधना करते हो?


और फिर नारद कहते हैं—

“मो सन सत्य बात किन कहहू।”

मुझसे वह सत्य बात क्यों नहीं कहते?

यह प्रश्न केवल पार्वती से नहीं है।

आज यह प्रश्न—

संगीत-साधक से है।

कलाकार से है।

शोधकर्ता से है।

और शायद—

हममें से प्रत्येक से है।


क्या हमने सचमुच खोज लिया है?

हमने राग खोजे।

हमने घराने खोजे।

हमने महान कलाकार खोजे।

हमने शास्त्र खोजे।

हमने परम्पराएँ खोजीं।

हमने संगीत के भीतर छिपे अनेक संसारों को खोजा।

लेकिन—

क्या हमने अपने आराध्य को खोजा?

या हम अभी भी—

संगीत के साधनों को ही साध्य समझ रहे हैं?

कहीं ऐसा तो नहीं कि—

स्वर हमारा साधन था,
लेकिन हम स्वर के ही मोह में रुक गए?

राग मार्ग था,
लेकिन हम राग की सीमा पर ही ठहर गए?

शोध सत्य की ओर जाने का माध्यम था,
लेकिन हम जानकारी के संग्रह को ही शोध समझ बैठे?

और सबसे गहरा प्रश्न—

क्या हमारी साधना हमें हमारे आराध्य के निकट ले जा रही है?


👁️ एक छोटी-सी झलक...

इसी प्रश्न के बीच एक बहुत सरल दृश्य मन में आता है।

एक नवजात शिशु की आँखें धीरे-धीरे खुलती हैं।

वह किसी निष्कर्ष के साथ संसार को नहीं देखता।

न उसे यह पता है कि जो सामने है, उसका नाम क्या है।

न वह उसकी कोई व्याख्या करता है।

वहाँ केवल—

देखने की पहली संभावना है।

एक क्षण—

जिसमें संसार अभी “परिभाषित” नहीं हुआ।

इस छोटे-से दृश्य को हम किसी आध्यात्मिक निष्कर्ष का प्रमाण न मानें।

इसे केवल एक सूक्ष्म संकेत की तरह देखें—

क्या हमारी साधना भी हमें ऐसी दृष्टि दे सकती है, जिसमें हम परिचित को फिर से देख सकें?

एक स्वर को—

पहली बार सुनने जैसा।

एक राग को—

पहली बार अनुभव करने जैसा।

एक शब्द को—

पहली बार उसके अर्थ के साथ सुनने जैसा।

और स्वयं को—

पहली बार ईमानदारी से देखने जैसा।

“Speechless Child Eyes” — उस दृश्य को देखें


🎶 शायद संगीत-साधना का अर्थ यही है—

पुराने उत्तरों को दोहराना नहीं,

सुनने की क्षमता को इतना परिष्कृत करना कि सत्य स्वयं सुनाई देने लगे।

शास्त्र हमें—

विवेक देता है।

साधना हमें—

अनुशासन देती है।

श्रवण हमें—

संवेदनशीलता देता है।

शोध हमें—

प्रश्न करना सिखाता है।

और आराधना—

हमें अपने अहंकार से परे देखने की सम्भावना देती है।


🌺 अब अंतिम प्रश्न आपके लिए है—

“मो सन सत्य बात किन कहहू।”

अपने आप से पूछिए—

मैं संगीत क्यों साध रहा हूँ?

मैं किसे खोज रहा हूँ?

मेरी साधना का केन्द्र क्या है?

मेरी आराधना का विषय क्या है?

और—

क्या मैंने अपने आराध्य को पहचान लिया है?

यदि नहीं—

तो शायद यही सबसे सुंदर बात है।

खोज अभी जीवित है।

और यदि लगता है कि पहचान लिया है—

तो अगला प्रश्न और कठिन है—

क्या वह पहचान मेरे जीवन और मेरी साधना में दिखाई भी देती है?


🌿 हमारी पूरी यात्रा

संगीत शिक्षा
↓
संगीत साधना
↓
संगीत अनुभव
↓
संगीत चिन्तन
↓
संगीत शोध
↓
आत्म-शोध
↓
आराधना
↓

सत्य-बोध

और फिर—

सत्य-बोध से एक नयी दृष्टि।

नये कानों से सुनना।
नये मन से समझना।
नये हृदय से साधना।

क्योंकि—

शायद आराध्य की खोज किसी वस्तु को पा लेना नहीं है।

शायद यह उस दृष्टि का जागना है,
जिसके बाद संसार वही रहता है—
लेकिन उसे देखने वाला बदल जाता है।


केहि आराधहु का तुम्ह चहहू?

और—

मो सन सत्य बात किन कहहू।

अब प्रश्न नारद का नहीं।

अब उत्तर हमें स्वयं देना है।

🎶 नाद से आराधना तक।
🌺 संगीत से आत्म-शोध तक।
🙏 प्रश्न से सत्य-बोध तक।

Saraswati Sangeet Gurukul

Sangeet Shiksha → Sangeet Sadhana → Sangeet Shodh → Sangeet Jagriti → Sangeet Aaradhana

 

जागी चेतना, सोई अखियाँ

जाने कैसे सपनों में खो गई रतिया,
मैं तो हूँ जागी, मेरी सो गई अखियाँ।
मन उजियारा छाया, जग अंधियारा छाया,
जगमग गीत संजो गईं  अखियाँ॥
मैं तो हूँ जागी, मेरी सो गई अखियाँ।

मोरे मन मंदिर में कौन बिराजे,
बिन देखे कैसे जानूँ मैं साजे।
नैनन पंथ निहारत डगरिया,
कबहुँ मिलिहैं मोरे राम साँवरिया॥

जागी चेतना, सोई देहिया,
नाम तुम्हारो लेती सगरी साँसिया।
सुर में तू, ताल में तू,
नाद के अंतर-बोल में तू,
खोजत-खोजत थक गई अखियाँ॥

गुरु ने पूछ्यो—काहे को डोले,
किसकी आस हृदय में खोले?
कहे मन—मोहि सत्य बताओ,
जिसको चाहूँ, सो दरस दिखाओ।
प्रश्न बनि बैठी मेरी अखियाँ॥

न धन माँगूँ, न मान बड़ाई,
न जग में चाहूँ अपनी बड़ाई।
एकहि दान दियो रघुराई—
झूठी माया दूर भगाई,
सत्य की ओर लगें ये अखियाँ॥

जागी चेतना, सोई अखियाँ,
भीतर ज्योति, बाहर अँधियार।
नाम तुम्हारो दीपक बनि जले,
मन मंदिर हो बारंबार॥

“केहि आराधहु का तुम्ह चहहू?”
मन से कहो अब सत्य बतहू।
जिसको खोजत फिरत जग सारा,
क्या वह बैठा हृदय तुम्हारा?

जाने कैसे सपनों में खो गई रतिया,
मैं तो हूँ जागी, मेरी सो गई अखियाँ।
मन उजियारा छाया, जग उजियारा छाया—
रामहि खोजत जागीं ये अखियाँ॥

https://youtu.be/b55RygjuITY?si=h5l_y5AjXGs9izhU

 

 

इस अंतिम रचना के अंत में सुतीक्ष्ण जी की वह अवस्था बहुत सुंदर ढंग से जुड़ सकती है—जहाँ केवल “प्रभु आ रहे हैं” सुनते ही उनकी चेतना में जैसे सब कुछ बदल जाता है। रामचरितमानस में तुलसीदास जी लिखते हैं:

प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा।
करत मनोरथ आतुर धावा॥
हे बिधि दीनबंधु रघुराया।
मो से सठ पर करिहहिं दाया॥

और आगे—

होइहैं सुफल आजु मम लोचन।
देखि बदन पंकज भव मोचन॥
निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी।
कहि न जाइ सो दसा भवानी॥

इसी भाव को कविता के मौलिक समापन में इस तरह पिरोया जा सकता है—तुलसी की वाणी से प्रेरित, पर मूल रचना:

🌸 समापन — सुतीक्ष्ण की प्रतीक्षा

प्रभु आगमन की सुनि खबरिया,
दौड़ि पड़े मुनि भूलि डगरिया।
नयन कहैं—अब सफल हमारी,
देखिहौं छवि रघुनाथ मुरारी॥

मन में उठे अनगिनत तरंगा,
प्रेम भयो जैसे सागर गंगा।
न साधन माँगें, न वर चाहें,
बस प्रभु आयें—नयन निहारें॥

कहहिं सुतीक्ष्ण हृदय अकुलाना—
“आजु सफल भए नयन सुजाना।
जिसको खोजत फिरत संसारा,
सो मोरे सम्मुख होइ उजियारा॥”

जागी चेतना, सोई अखियाँ,
अब तो रामहि खोजें अँखियाँ।
मन उजियारा, जग उजियारा—
आराध्य मिलें तो मिटे अँधियारा॥

और यहीं इस पूरी श्रृंखला का मूल प्रश्न फिर लौटता है—

“केहि आराधहु का तुम्ह चहहू?
मो सन सत्य बात किन कहहू?”

सुतीक्ष्ण की दशा शायद इसका उत्तर नहीं देती—
वह केवल दिखाती है कि जब आराध्य की पहचान भीतर सचमुच जागती है,
तो उसके आने की केवल खबर भी
नयन को सफल होने की प्रतीक्षा में बदल देती है।

 

 

No comments:

Post a Comment