ब्रह्म को नहीं जान सकते, तो पहले माया को ही जान लेते हैं!
https://youtu.be/81_go1O3lfM?si=0p8MAXVsmwEe5dT2
कभी-कभी सोचता हूँ—
ब्रह्म को नहीं जान सकते,
तो पहले माया को ही जान लेते हैं!
और तभी भीतर से कबीर की आवाज़ आती है—
“माया महा ठगनी हम जानी…”
अरे, लूट लियो रे!
माया की सबसे बड़ी चाल यही है कि
वह हमेशा माया के रूप में दिखाई नहीं देती।
कभी धन बनकर आती है,
कभी प्रतिष्ठा बनकर,
कभी संबंध बनकर,
कभी अहंकार बनकर।
और कभी-कभी तो
धर्म और संगीत का चोला पहनकर भी आ जाती है।
यहीं सावधान होने की आवश्यकता है।
धर्म यदि जीवन को ऊँचा उठाने के बजाय
सिर्फ कमाई का माध्यम बन जाए—
तो धर्म कहाँ रहा?
संगीत यदि साधना से हटकर
केवल बाजार की वस्तु बन जाए—
तो संगीत कहाँ रहा?
लेकिन दूसरी तरफ़
क्या संगीत सिखाने वाला गुरु
अपनी आजीविका भी न चलाए?
क्या कलाकार अपने श्रम का पारिश्रमिक न ले?
क्या किसी संगीत संस्था के
हॉल, वाद्ययंत्र, बिजली, यात्रा, शिक्षण और आयोजन की लागत
शून्य हो जाती है?
नहीं।
यहीं माया की एक और सूक्ष्म चाल सामने आती है—
हमने “व्यवसाय” और “व्यावसायिकता” को
“व्यापारीकरण” और “धंधे” का पर्याय बना दिया।
किसी कलाकार को उसके श्रम का सम्मानजनक पारिश्रमिक देना
धर्म का धंधा नहीं है।
किसी गुरु को दक्षिणा देना
संगीत का व्यापार नहीं है।
किसी गुरुकुल को चलाने के लिए
शुल्क, दान या सदस्यता लेना
अपने आप में साधना का अपमान नहीं है।
धंधा तब शुरू होता है
जब साधना साधन न रहकर
सिर्फ़ साध्य बन जाए—
और पैसा ही अंतिम उद्देश्य हो।
यही फर्क है—
संगीत से आजीविका कमाना
और
संगीत को केवल आजीविका बना देना।
पहले में कला जीवित रहती है।
दूसरे में कला धीरे-धीरे वस्तु बन जाती है।
और यही बात धर्म पर भी लागू होती है।
धर्म के नाम पर
भय बेचो,
मोक्ष बेचो,
चमत्कार बेचो,
दर्शन बेचो,
प्रसाद बेचो—
तो यह आध्यात्मिकता नहीं,
माया का बाजार है।
लेकिन किसी मंदिर की व्यवस्था चलाना,
किसी आश्रम में भोजन कराना,
किसी गुरु के जीवन-निर्वाह की व्यवस्था करना,
किसी धार्मिक या सांस्कृतिक संस्था को
दान और सदस्यता से चलाना—
इन सबको स्वतः “धर्म का धंधा” कह देना भी
उतना ही अधूरा दृष्टिकोण है।
क्योंकि प्रश्न यह नहीं कि
धन आया या नहीं।
प्रश्न यह है कि—
धन साधना का साधन है
या साधना धन का साधन बन गई है?
यही कसौटी संगीत पर भी है।
यदि कोई गुरुकुल
बच्चों को राग सिखाता है,
गुरु-शिष्य परंपरा से जोड़ता है,
सत्संग कराता है,
शास्त्रीय संगीत की बैठक करता है,
और उसके लिए उचित शुल्क या दान लेता है—
तो केवल इसलिए कि
“यहाँ पैसे का लेन-देन हुआ”
उसे “commercial activity” कहना
क्या माया को पहचानना है
या स्वयं एक नई भ्रांति पैदा करना?
कभी-कभी लगता है
आज की माया की ठगी बहुत सूक्ष्म हो गई है।
वह अब केवल यह नहीं कहती—
“पैसा कमाओ।”
वह यह भी कहती है—
“जिस काम में पैसा आया,
उसे अपवित्र घोषित कर दो।”
और फिर मनुष्य
साधना और आजीविका के बीच
एक झूठी दीवार खड़ी कर देता है।
जबकि भारतीय परंपरा में
अर्थ और धर्म एक-दूसरे के शत्रु नहीं थे।
प्रश्न था—
अर्थ किसके लिए?
और किस मार्ग से?
इसलिए शायद आज
ब्रह्म को जानने से पहले
माया को थोड़ा समझना ज़रूरी है।
माया कभी धन बनकर ठगती है,
कभी मोह बनकर,
कभी अहंकार बनकर—
और कभी “पवित्रता” के नाम पर
दूसरे की साधना को ही संदेह के घेरे में डाल देती है।
कबीर की ठगनी बड़ी चालाक है।
वह केवल बाजार में नहीं बैठी।
वह मंदिर में भी हो सकती है,
मंच पर भी,
गुरुकुल में भी,
घर में भी—
और सबसे अधिक,
हमारे अपने मन में।
इसलिए प्रश्न यह नहीं—
“यह commercial है या spiritual?”
प्रश्न यह है—
“इसमें मेरी चेतना ऊपर उठ रही है
या मेरा लोभ?”
यदि संगीत से जीवन चलता है
और संगीत भी जीवित रहता है—
तो उसमें दोष क्या है?
यदि धन साधना की सेवा करता है—
तो वह साधना का शत्रु कैसे हुआ?
पर यदि धन ही गुरु बन जाए,
प्रसिद्धि ही साध्य बन जाए,
और धर्म तथा संगीत
केवल बाजार की वस्तु बन जाएँ—
तब सावधान!
अरे… लूट लियो रे!
वही माया महा ठगनी
फिर से आ गई।
और शायद मुक्ति की पहली सीढ़ी यही है—
माया को दूसरों में ढूँढना बंद करो।
पहले देखो—
कहीं वह मेरे भीतर तो नहीं बैठी?
क्योंकि ब्रह्म को जानना
शायद बहुत दूर की बात है।
पर इतना तो हम आज से जान सकते हैं—
कहाँ साधना है,
कहाँ सेवा है,
कहाँ आजीविका है,
और कहाँ सचमुच “धंधा” शुरू हो गया है।
बस यही विवेक
शायद माया की पहली गाँठ खोल देता है।
“माया महा ठगनी हम जानी…”
और इस बार मन हँसकर कहे—
अरे माया!
तू ठगनी सही,
पर अब हम भी थोड़े समझदार हो गए हैं। 🙏
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