Wednesday, August 19, 2026

वापसी — एक आत्ममंथन

 [19/08, 3:38 pm] Akshat Agrawal: वापसी — एक आत्ममंथन

बैठा था Rockies की पर्वत-गोद में,
बर्फ़ीली चोटियों को निहार रहा था,
सोच रहा था—
मेरे भाग्य कहाँ थे
कि भारत में जन्म हुआ मेरा?

जिस धरती पर वेदों ने स्वर साधे,
जहाँ नाद को ब्रह्म कहा गया,
जहाँ राग केवल संगीत नहीं,
साधना हुआ करता था—
क्या सचमुच उसी भारत का
मैं पुत्र हूँ?

दूर परदेस की उस शांति में
भारत की स्मृतियाँ उमड़ती थीं—
मंदिर की घंटियाँ,
गुरु की डाँट,
तानपुरे का अनाहत कंपन,
और किसी अनजान गली से आती
बाँसुरी की वह पुकार
जो सीधे हृदय में उतर जाती थी।

तब लगता था—
धन्य हूँ मैं,
कि उस भूमि में जन्मा
जहाँ संगीत जीवन था,
जहाँ कला उपासना थी,
जहाँ गुरु के चरणों में बैठकर
मनुष्य स्वयं को पहचानता था।

फिर एक दिन लौट आया मैं—
अपने ही देश की मिट्टी पर,
अपने ही लोगों के बीच,
अपने ही उस भारत की तलाश में
जिसे स्मृतियों में सँजोकर रखा था।

लेकिन लौटकर देखा तो
एक अजीब दृश्य सामने था।

जिस संगीत को
कभी साधना कहा जाता था,
उसे अब
“commercial activity” कहकर
कटघरे में खड़ा किया जा रहा था।

जहाँ कुछ स्वर उठे,
वहाँ सवाल उठे—
“इससे किसे परेशानी है?”
“यह गतिविधि क्यों हो रही है?”
“क्या इसकी अनुमति ली गई है?”

और मैं सोचता रहा—
क्या रियाज़ भी अब
किसी अनुमति का मोहताज है?

क्या तानपुरे की झंकार
व्यवसाय हो गई?
क्या गुरु-शिष्य का संवाद
“commercial activity” हो गया?
क्या संस्कृति बाँटना
अब किसी गतिविधि की श्रेणी में आता है?

जिस देश में
कभी गुरुकुलों में
ज्ञान का दान होता था,
जहाँ कलाकार
राजदरबार से लेकर
मंदिर की चौखट तक
अपनी कला अर्पित करते थे—
वहीं आज
यदि कोई अपने घर में
कुछ बच्चों को राग सिखाना चाहे,
कुछ मित्रों के साथ
शास्त्रीय संगीत की बैठक करना चाहे,
तो सबसे पहले पूछा जाता है—
“इससे कमाई कितनी हो रही है?”

और शायद यही
हमारी सबसे बड़ी विडंबना है।

हमने संगीत से
उसकी आत्मा अलग कर दी,
कला से साधना अलग कर दी,
और संस्कृति से
उसका सहज जीवन।

हमने विश्वविद्यालय तो बहुत बनाए,
पर गुरुकुल भूल गए।

हमने डिग्रियाँ बाँटीं,
पर दिशा नहीं।

हमने मनोरंजन बढ़ाया,
पर अंतर्मन का नाद खो दिया।

और फिर शिकायत करते हैं
कि युवा भटक रहे हैं।

कभी उन्हें
कुसंग घेरता है,
कभी peer pressure,
कभी आभासी दुनिया,
कभी उपभोग की अंधी दौड़।

पर क्या हमने उन्हें
एक ऐसा स्थान दिया
जहाँ वे बैठ सकें,
सुन सकें,
सीख सकें,
और अपने भीतर लौट सकें?

गुरुकुल शायद उसी प्रश्न का उत्तर है।

यह कोई commercial venture नहीं—
यह उस परंपरा को
फिर से जीवित करने का एक छोटा-सा प्रयास है
जिसमें गुरु केवल विषय नहीं सिखाता,
जीने की दृष्टि देता है।

जहाँ गुरु-भाई और गुरु-बहन
सिर्फ सहपाठी नहीं होते,
बल्कि जीवन-यात्रा के सहयात्री होते हैं।

जहाँ मित्रता
प्रतिस्पर्धा से नहीं,
साधना से जन्म लेती है।

जहाँ राग
सिर्फ कानों को नहीं,
चरित्र को भी संस्कारित करता है।

और जहाँ संगीत
मंच पर प्रदर्शन करने से पहले
मनुष्य के भीतर उतरता है।

आज जब मैं फिर उसी भारत की धरती पर बैठा हूँ,
तो Rockies की वह स्मृति
बार-बार लौटती है।

तब मैंने सोचा था—
“मेरे भाग्य कहाँ थे कि भारत में जन्म हुआ मेरा!”

आज सोचता हूँ—
भाग्य तो था ही।

पर उस भाग्य का ऋण
क्या मैंने चुकाया?

शायद यही मेरी वापसी का कारण है।

मैं भारत से कुछ लेने नहीं,
कुछ लौटाने आया हूँ।

एक स्वर लौटाने,
एक परंपरा लौटाने,
एक संवाद लौटाने,
और शायद—
एक छोटी-सी गुरुकुल-परंपरा
फिर से जलाने।

क्योंकि जिस दिन
किसी बच्चे के हाथ में
मोबाइल की जगह तानपुरा होगा,
जिस दिन किसी युवा को
कुसंग की जगह
गुरु-संग मिलेगा,
जिस दिन संगीत को
“commercial activity” नहीं,
जीवन की साधना समझा जाएगा—

शायद उस दिन
Rockies की उस चोटी पर बैठा
वह आदमी मुस्कुराकर कह सकेगा—

हाँ, भारत में जन्म लेना
वास्तव में मेरा सौभाग्य था।


[19/08, 3:49 pm] Arvind Srivastava Tabla: धैर्य वह सवारी है जो अपने सवार को कभी गिरने नहीं देती।
[19/08, 3:51 pm] Akshat Agrawal: धैर्य रखें कि धीर रखें,

वो निर्मोही, मोह न जाने, जिनका मोह करे।
[19/08, 3:56 pm] Akshat Agrawal: छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए

छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए,
ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए।

अपने हिस्से का आकाश मत छोड़,
किसी और की परछाईं के लिए।
अपनी धुन, अपना राग, अपना सफ़र—
मत रोक किसी की रज़ामंदी के लिए।

मोह में इतना भी मत डूब जाना,
कि स्वयं को ही भूल जाए आदमी;
प्रेम अगर सच है तो मुक्त करेगा,
क्यों बने फिर वो बंदगी के लिए?

धैर्य रख, मगर स्वयं को मत खो,
प्रतीक्षा कर, मगर जीवन मत रोक।
जिसे आना है, वह आएगा स्वयं,
क्यों बिछे हर राह किसी के लिए?

वो निर्मोही है—मोह न जाने,
जिनका मोह करे, उन्हें छोड़ता नहीं;
पर उसके निर्णय पर विश्वास रख,
क्यों अधीर हो हर घड़ी के लिए?

कभी किसी को अपना समझकर
अपना अस्तित्व मत गिरवी रखना;
प्रेम करो, मगर प्रेम के भीतर
अपने स्वत्व को मत मरने देना।

तुम्हारी भी कोई मंज़िल है,
तुम्हारा भी कोई प्रयोजन है;
तुम केवल किसी की कहानी नहीं,
तुम स्वयं भी एक सृजन हो।

किसी के आने से जीवन सुंदर हो—
तो स्वागत है उस आगमन का;
पर किसी के जाने से जीवन शून्य हो जाए—
तो यह अन्याय है अपने ही जीवन का।

साथ मिले तो साथ चलो,
राह अलग हो तो राह बदलो;
पर अपने भीतर के दीपक को
किसी की अनुपस्थिति में मत बुझने दो।

किसी के प्रेम में स्वयं को पाना—
यह प्रेम है;
किसी के प्रेम में स्वयं को खो देना—
यह मोह है।

और मोह से ऊपर उठकर
जो प्रेम बचता है,
वही धैर्य है,
वही धीरज है,
वही स्वतंत्रता है।

इसलिए—

छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए,
ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए।
प्रेम कर, मगर स्वयं से भी कर,
कुछ बचा रख अपनी ख़ुशी के लिए।

जो तुम्हारा है, वह छिनेगा नहीं,
जो छूट गया, वह तुम्हारा था ही नहीं;
और जो सच में तुम्हारे जीवन का है—
उसे पाने के लिए
अपने आप को खोना नहीं पड़ेगा।

चलते रहो अपनी राह पर,
अपने राग को जीवित रखो;
किसी के इंतज़ार में भी
अपने जीवन का उत्सव मत रोक।

क्योंकि—

धैर्य वह सवारी है
जो अपने सवार को गिरने नहीं देती;
और प्रेम वह प्रकाश है
जो रास्ता दिखाता है—
मगर राह चलना
हर मनुष्य को स्वयं ही पड़ता है।

छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए—
यह मुनासिब नहीं आदमी के लिए।

किसी को प्रेम में स्थान दो,
अपना सम्पूर्ण जीवन नहीं।
किसी का हाथ थामो,
अपनी दिशा नहीं।
और किसी की प्रतीक्षा करो तो
इतने धैर्य से करो
कि प्रतीक्षा भी
तुम्हारी साधना बन जाए।
[19/08, 4:06 pm] Akshat Agrawal: भटको मेरे मन इतरा के,

साधना क्यों छोड़ी मोह बढ़ा के !
[19/08, 4:07 pm] Akshat Agrawal: भटको मेरे मन इतरा के

भटको मेरे मन इतरा के,
साधना क्यों छोड़ी मोह बढ़ा के।

जिस राह पे चलकर पाया था
मन का अपना एक किनारा,
क्यों लौट चले फिर उस दुनिया में
जिसने तुझको बार-बार पुकारा?

किसके लिए यह बेचैनी है,
किसके लिए यह रात जगाना?
जिसको होना है, होगा होकर—
क्यों अपने को रोज़ मिटाना?

प्रेम मिला तो फूल समझना,
काँटा मिले तो धैर्य रखना;
किसी के आने से मत खिलना,
किसी के जाने से मत बिखरना।

भटको मेरे मन इतरा के,
पर अपनी जड़ मत भूल जाना;
राग मिले तो राग साधना,
मोह मिले तो मोह मिटाना।

तूने जिसको प्रेम समझा था,
कहीं वही तो बंधन नहीं?
जिसके पीछे भाग रहा है,
क्या वह तेरा जीवन नहीं?

गुरु ने तुझसे इतना ही कहा—
“पहले अपने भीतर उतर;
बाहर जिसको ढूँढ रहा है,
उसका दीपक है तेरे अंदर।”

वो निर्मोही मोह न जाने,
जिनका मोह करे, उन्हें छोड़े नहीं;
तू भी प्रेम कर—पर ऐसा कर,
जिसमें स्वयं को खोए नहीं।

धैर्य रख, धीरज धर मन,
समय बड़ा बलवान है;
जिसे तू अपना समझ रहा है,
सब कुछ उस परमात्मा का दान है।

किसी के लिए संसार न छोड़,
किसी के लिए साधना न छोड़;
प्रेम अगर तेरा सच्चा है तो
प्रेम में अपना स्वत्व न छोड़।

भटको मेरे मन इतरा के,
फिर लौट आ अपनी राह;
जिस दिन भीतर नाद जगेगा,
मिट जाएगी सारी चाह।

फिर न कोई आने की चाहत,
फिर न जाने का कोई डर;
फिर हर स्वर में वही सुनाई दे—
वही भीतर, वही बाहर।

और तब समझेगा मेरा मन—
मोह बढ़ाकर क्या पाया?

जिसे पाने को दौड़ा जग में,
वह तो भीतर ही मुस्काया।

भटको मेरे मन इतरा के,
साधना क्यों छोड़ी मोह बढ़ा के?
चल वापस उस शांत डगर पर,
जहाँ तूने स्वयं को पाया था—
किसी को पाने के लिए नहीं,
स्वयं में लौट आने के लिए।
[19/08, 4:44 pm] Akshat Agrawal: [19/08, 4:25 pm] DM Mitra: Pl revisit your thought of SSG before any further investment of Energy and hardwork
[19/08, 4:42 pm] Akshat Agrawal: दिल की लहरों में उतरता चढ़ता हूं,

गहरे उतरे कि डूब गए !
[19/08, 4:44 pm] Akshat Agrawal: यहाँ आपकी पंक्ति में SSG के प्रति आकर्षण, संदेह, और फिर भी भीतर से उससे अलग न हो पाने का भाव बहुत प्रभावशाली है। इसे इस तरह आगे बढ़ाया जा सकता है:

दिल की लहरों में उतरता-चढ़ता हूँ,
गहरे उतरे तो डूब गए।
किनारे बैठकर सोचूँ तो लगता है—
चलो लौट चलें,
पर लहरों ने फिर पुकार लिया।

किसे समझाऊँ इस मन को,
यह तर्क कहाँ मानता है;
जिसे लोग कहते हैं—
“सोचो, क्या आवश्यकता है?”
वही भीतर से पूछता है—
“अगर न किया तो जीवन भर
क्या यही प्रश्न सताएगा?”

ऊर्जा लगती है,
समय जाता है,
पर कुछ स्वप्न
लाभ-हानि की गणना से नहीं चलते।

कभी-कभी आदमी
किसी काम को इसलिए नहीं करता
कि वह आसान है,
बल्कि इसलिए करता है
क्योंकि उसके बिना भीतर कुछ अधूरा रह जाता है।

SSG भी शायद
मेरे लिए कोई परियोजना नहीं,
एक प्रयोग है—
क्या आज भी
संगीत को साधना मानकर
कुछ मनुष्य साथ बैठ सकते हैं?

क्या एक घर
सिर्फ रहने की जगह न रहकर
राग, संवाद और सत्संग का स्थान बन सकता है?

क्या कुछ युवा
प्रतिस्पर्धा से हटकर
गुरु-संग और संगीत-संग में
अपने भीतर उतर सकते हैं?

और यदि इन प्रश्नों के उत्तर
अभी स्पष्ट नहीं हैं,
तो शायद यही समय है
धैर्य रखने का—
न कि स्वप्न छोड़ देने का।

दिल की लहरों में
उतरता-चढ़ता रहूँगा;
कभी किनारा दिखाई देगा,
कभी गहराई डराएगी।

पर शायद जीवन का अर्थ ही यही है—

कुछ गहराइयाँ
किनारे खड़े होकर नहीं समझी जातीं।

गहरे उतरे तो डूब गए—
हाँ, डूबे भी।

पर कभी-कभी
डूबना ही यह जानने का रास्ता होता है
कि भीतर वास्तव में मोती है
या केवल भ्रम।


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