भस्मासुर और भरतनाट्यम
— एक हास्य कविता, शक्ति की महिमा में
ये भस्मासुर पार्वती जी को पकड़ने चला है,
अरे रुक जा दुष्ट — मैं आती हूँ तेरे साथ
भरतनाट्यम करने! 😄
ऐसे अपने सिर के ऊपर हाथ रखके
ठुमका लगाओ ज़रा —
कि तुम्हारा अस्तित्व ही समाप्त हो जाए।
पनौती कहीं के! 😂
अरे अपनी उमर देखो —
और रनौती की।
दोनों को मिला दो —
तब भी दिमाग नहीं आएगा! 🤣
यही हाल है उस कलाकार का —
जो सोचता है —
"मैंने यह राग बनाया!"
"मेरी पंडिताई है यह!"
"मेरी कलाकारी का कमाल!"
अरे भाई —
तू भी भस्मासुर है!
शक्ति ने वरदान दिया —
और तू उसी को पकड़ने चला! 😂
रुक जा दुष्ट —
यहाँ भरतनाट्यम हो रहा है —
सिर के ऊपर हाथ वाला।
तेरी पंडिताई स्वयं तुझे डुबोएगी। 🙏
जिसने अहंकार छोड़ा —
उससे शक्ति प्रगट हुई।
जिसने पकड़ने की कोशिश की —
उसने अपना ही सिर जलाया। 😄
तनसेन ने हुनर से गाया —
वाहवाही मिली।
स्वामी हरिदास ने समर्पण से गाया —
अकबर खुद चलकर आया। 🎵
बात समझ आई?
नहीं आई?
भस्मासुर ही रहोगे फिर।
पनौती + रनौती = दोनों का जोड़! 😂
देवी कह रही हैं —
"साधना करो।
अहंकार छोड़ो।
और जब छोड़ोगे —
मैं खुद प्रगट हो जाऊँगी।
जिस रूप में चाहूँ।
जिस क्षण चाहूँ।"
बस इतना काफी है।
बाकी सब —
भस्मासुर की कहानी है। 🙏😄
भस्मासुर को वरदान मिला था —
जिसके सिर पर हाथ रखे, वो भस्म हो जाए।
पार्वती जी ने नृत्य में उसी से अपना हाथ
उसके सिर पर रखवा दिया।
अहंकार हमेशा खुद को ही जलाता है।
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Akshat Agrawal | Sangeet Visharad, Bhatkhande | IIT–BHU
akshat08.blogspot.com · @akshat08 on Substack
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