Monday, June 29, 2026

गिरो — और एक संभला हुआ आदमी की गुज़ारिश

 गिरो — और एक संभला हुआ आदमी की गुज़ारिश
Giro by Khoobnath Pandey | A Kavita and Its Politics
by Akshat Agrawal
संभला हूं मैं, गिर गिर के मुझे फिर न गिराओ,
अब चैन से रहने दो मेरे पास न आओ।


छोडूंगा नहीं, बस इतना याद रखना!


कुछ कविताएं बोली जाती हैं।
कुछ कविताएं चिल्लाई जाती हैं।
और कुछ — बहुत कम — आईना बन जाती हैं।
खूबनाथ पांडे की गिरो उस तीसरी श्रेणी की कविता है।
गिरो
— खूबनाथ पांडे

गिरो गिरो के भी और गिरने की संभावनाएं भरपूर हैं।
इतना गिरो कि गुरुत्वाकर्षण बल भी शर्म के मारे गिर पड़े।
गिरो।
गिरो कि अभी तो गिरने की शुरुआत है।
गिरने के अपने सामर्थ्य पर भरोसा गिरने मत दो।
सारा विश्व तुम्हारा गिरना देख रहा है।
और खुद ना गिर पाने पर अफसोस कर रहा है।
गिरो। गिरो पर अकेले मत गिरो।
रुपए के साथ गिरो।
चरित्र के साथ गिरो।
गर्व के साथ गिरो।
एक तुम ही हो जिसमें गिरने का इतना साहस है।
उस साहस के साथ गिरो।
बेशर्मी के साथ गिरो।
बेदर्दी के साथ गिरो कि दुनिया तुमसे गिरना सीख रही है।
किसी एक ही मामले में सही —
तुम्हें विश्वगुरु होने से कोई नहीं रोक सकता।
आने वाली पीढ़ियां तुम्हारे गिरने में
अपने गिरने की संभावनाएं तलाश करेंगी
और वो तुमसे भी ज्यादा गिरने का पराक्रम करेंगी।
उनके पराक्रम पर यकीन करते हुए जरा और जोर से गिरो।
थोड़े शोर से गिरो। चारों ओर से गिरो।
निपट भोर से गिरो।
और गिरते रहो, गिरते रहो।
ये सच है कि इससे पहले तुम्हारी तरह कोई नहीं गिरा।
इसका कोई नहीं गिरा।
बल्कि तुम्हें ही तो खुश होना चाहिए
कि सदियों से खड़े समाज को तुम गिरना सिखा रहे हो।
एक ही जगह खड़े-खड़े लोग जड़ हो गए थे।
उन्हें जड़ से तुम ही हटा रहे हो।
ये कोई आसान काम नहीं है जो तुम जमाने को बता रहे हो।
हो कि जो गिरने में असमर्थ है वो तुम्हारी आलोचना करेंगे।
तुम्हारी निंदा करेंगे।
पर इन सब से घबराना नहीं।
गिरने से डगमगाना नहीं।
आज तक जो कुछ ना गिरने के लिए प्रतिबद्ध था — वो सब ले गिरो।
धर्म लेकर गिरो, कर्म लेकर गिरो,
देश लेकर गिरो, भाषा लेकर गिरो,
पेड़ लेकर गिरो, नदी लेकर गिरो,
पानी लेकर गिरो, पहाड़ लेकर गिरो,
सावन लेकर गिरो, भालू लेकर गिरो,
प्रकृति लेकर गिरो, संस्कृति लेकर गिरो,
विकृति लेकर गिरो।
गिरो।
गिरो — वर्तमान सदी के महानतम महापुरुष —
पूरी कायनात को दिखा दो कि तुम और कितना गिर सकते हो।
कल हो सकता है कि तुम्हारा गिरना देखकर ही
लोगों में उठने की कामना जाग उठे।
और आने वाली पीढ़ियों को उठने का अर्थ बताने के लिए कम
और ज्यादा गिरने का फर्क बताने के लिए गिरो।
बिना किसी की फिक्र सिर्फ और सिर्फ गिरो।
गिरते रहो। गिरते रहो जब तक कि गिरने की प्रक्रिया निष्क्रिय ना हो जाए।
गिरो। गिरो।
धन्यवाद।


I. विधा और शस्त्र — The Form as the Weapon
यह कविता व्यंग्य-काव्य की उस परंपरा में है जहाँ शब्द तलवार की तरह नहीं — दर्पण की तरह काम करते हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, धूमिल, रघुवीर सहाय — इन्हीं की विरासत।
पर Pandey ji का शिल्प-कौशल अनूठा है। उन्होंने आज्ञाकारक मूड को व्यंग्य का हथियार बना दिया है। हर "गिरो" एक साथ आदेश भी है और निंदा भी। कवि कुछ सीधे नहीं कहता — न नाम लेता है, न आरोप लगाता है। दर्शक खुद रिक्त स्थान भर लेते हैं।
गिरो का सत्रह बार से अधिक दोहराव अनाफ़ोरा है — ताल की तरह, ढोल की थाप की तरह। यह एक गिरती हुई सभ्यता की लय है।
यह Jonathan Swift की A Modest Proposal है — हिंदी में, 2024 में।
 

II. प्राथमिक लक्ष्य — What the Poem Indicts
"रुपए के साथ गिरो"
मुद्रा का अवमूल्यन। डॉलर के सामने रुपए का पतन। एक भी अर्थशास्त्री का नाम लिए बिना — सम्पूर्ण आर्थिक नीति पर प्रश्नचिह्न।
"विश्वगुरु"
यही कविता का सबसे तीखा क्षण है —
"किसी एक ही मामले में सही — तुम्हें विश्वगुरु होने से कोई नहीं रोक सकता।"
भारत को विश्वगुरु बनाने की राजनीतिक आकांक्षा — एक aspirational brand — को कवि ने एक वाक्य में ध्वस्त कर दिया। तुम वाकई विश्वगुरु हो — गिरने की कला में।
"धर्म लेकर गिरो, कर्म लेकर गिरो, देश लेकर गिरो, भाषा लेकर गिरो..."
यह catalogue — यह सूची — दरअसल एक शोक-गीत है। हर चीज़ जो गिराई जा रही है:
धर्म — पहचान-राजनीति के हथियार में बदला हुआ
भाषा — हिंदी थोपने और क्षेत्रीय भाषाओं के दमन का संघर्ष
पेड़, नदी, पहाड़ — पर्यावरणीय विनाश जो नीतिगत चुनाव है, दुर्भाग्य नहीं
संस्कृति — इतिहास का पुनर्लेखन, स्मृति का राजनीतिकरण
विकृति — और अंत में यह भी — क्योंकि जो विकृत था, वह भी साथ जा रहा है
"एक ही जगह खड़े-खड़े लोग जड़ हो गए थे / उन्हें जड़ से तुम ही हटा रहे हो"
यहाँ जड़ का दोहरा अर्थ कविता को एक नई ऊंचाई देता है —
जड़ = rooted, stationary (जो परम्परा में, स्थान में, समुदाय में जमे थे)
जड़ = mindless, rigid (जो बौद्धिक रूप से ठहर गए थे)
एक शब्द — दो आरोप। जो जमे हुए थे उन्हें उखाड़ा जा रहा है। और जो ठहरे हुए थे उन्हें भी। दोनों पर प्रहार।
 

III. द्वितीयक लक्ष्य — The Complicit Citizen
Giro की महानता सिर्फ नेता को नहीं — दर्शक को भी कटघरे में खड़ा करती है।
"सारा विश्व तुम्हारा गिरना देख रहा है।
और खुद ना गिर पाने पर अफसोस कर रहा है।"
दुनिया देख रही है — और ईर्ष्या कर रही है। Hungary, Turkey, Brazil — वे नोट ले रहे हैं। भारत का लोकतांत्रिक विघटन का jugaad export हो रहा है।
और वह मध्यवर्ग — "जो गिरने में असमर्थ है" — जो आलोचना करता है — उसे भी कवि नहीं बख्शता। तुम्हारी आलोचना दरअसल तुम्हारी असमर्थता की ईर्ष्या है। यह कविता की सबसे क्रूर पंक्ति है।
 

IV. संरचनात्मक उत्कर्ष — The Philosophical Turn
3:46 पर कविता अपना viparyaya — उलटफेर — करती है:
"कल हो सकता है कि तुम्हारा गिरना देखकर ही
लोगों में उठने की कामना जाग उठे।"
यह आशा नहीं है। यह सबसे अंधेरी विडंबना है — हम तब उठेंगे जब तुम पूरी तरह गिर जाओगे। नाद पूरा होने पर ही प्रतिनाद जन्म लेगा।
यहाँ Pandey धूमिल की परम्परा में हैं — नकारात्मक उत्प्रेरण — यह विचार कि पतन का पूर्ण प्रकाशन स्वयं एक राजनीतिक कर्म है।
 

V. "गिरो" बनाम "संभला हूं" — The Dialectic
और यहाँ एक व्यक्तिगत स्वीकारोक्ति।
जब मैंने यह कविता सुनी — पहली बार, दूसरी बार, तीसरी बार — मेरे मन में यही पंक्तियां उठीं:
संभला हूं मैं, गिर गिर के मुझे फिर न गिराओ,
अब चैन से रहने दो मेरे पास न आओ।
छोडूंगा नहीं, बस इतना याद रखना!
Pandey कहते हैं: गिरते रहो।
मैं कहता हूं: संभला हूं।
यह दो स्वरों का संवाद है।
एक — समाज का सामूहिक पतन। बाहर का।
दूसरा — व्यक्ति का संघर्ष। भीतर का।
Pandey का गिरो सभ्यता का निदान है।
मेरा संभला हूं उस व्यक्ति का उत्तर है जो उसी सभ्यता में जी रहा है, गिरा है, और — किसी तरह — फिर खड़ा हुआ है।
"गिर गिर के" — गिरना स्वीकार है। हुआ। बार-बार हुआ।
"मुझे फिर न गिराओ" — अब agent बदल गया है। संस्था नहीं, व्यवस्था नहीं — एक नज़दीकी खतरा है। एक रिश्ता, एक परिस्थिति, एक आदत — जो नए सिरे से गिराने आती है।
और "छोडूंगा नहीं" — यह Pandey के अंतिम वाक्य का व्यक्तिगत counterpoint है।
Pandey: गिरते रहो जब तक कि गिरने की प्रक्रिया निष्क्रिय ना हो जाए।
मैं: छोडूंगा नहीं — यह ज़मीन जो मिली है, यह संतुलन जो साधा है।
दोनों पंक्तियां मिलकर एक पूरी कहानी बनाती हैं —
सभ्यता गिर रही है। और उसी सभ्यता में एक आदमी खड़ा है। गिरा हुआ। संभला हुआ। और इस बार — ज़िद के साथ — टिका हुआ।
यही शायद प्रतिरोध का सबसे छोटा और सबसे ज़रूरी रूप है।
गिरना नहीं।
 

VI. अंतिम बात — Why This Poem Now
Giro 2024-25 के भारत की कविता है। पर इसके पूर्वज हैं — Swift (1729), Premchand का कफ़न (1936), Harishankar Parsai, Gorakh Pandey।
महान व्यंग्य की एक पहचान होती है — वह argue नहीं करता, accuse नहीं करता, oppose नहीं करता। वह बस सहमत होता है — इतने उत्साह से, इतनी ऊर्जा से, कि वह सहमति ही सबसे बड़ा विरोध बन जाती है।
Pandey की गिरो यही करती है।
और शायद हम सबको — जो इसे पढ़ रहे हैं, सुन रहे हैं, महसूस कर रहे हैं — यह तय करना है:
क्या हम गिरने वालों में हैं?
या गिरते देखने वालों में?
या उन थोड़े लोगों में — जो गिर चुके हैं, संभल चुके हैं — और अब छोड़ने से इनकार कर रहे हैं?
गिरो। गिरो।
धन्यवाद।
— Akshat Agrawal
akshat08.substack.com | akshat08.blogspot.com

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