जजमेंट डे : जब तीसरी आँख खुलती है
अग्नि परीक्षा, लक्ष्मण रेखा और सत्य का क्षण
एक कलियुगी संवाद
माता बोलीं—
"पुत्र,
संसार में सबसे कठिन परीक्षा कौन सी है?"
मैंने कहा—
"IIT की परीक्षा?"
माता मुस्कुराईं।
"नहीं।"
"नौकरी की?"
"नहीं।"
"राजनीति की?"
"नहीं।"
फिर माता बोलीं—
"सबसे कठिन परीक्षा है—
जब मनुष्य को अपने ही भ्रमों के सामने खड़ा होना पड़ता है।"
लक्ष्मण रेखा
रामायण में लक्ष्मण रेखा केवल भूमि पर खींची गई एक रेखा नहीं है।
वह विवेक की रेखा है।
हर युग में मनुष्य के सामने कोई न कोई मायावी साधु आता है।
कभी सत्ता के रूप में।
कभी धन के रूप में।
कभी प्रसिद्धि के रूप में।
कभी धर्म के नाम पर।
कभी राष्ट्रवाद के नाम पर।
कभी क्रांति के नाम पर।
और कभी आध्यात्मिकता के नाम पर।
वह कहता है—
"बस एक कदम बाहर आ जाओ।"
और मनुष्य सोचता है—
"इसमें हानि ही क्या है?"
अग्नि परीक्षा का वास्तविक अर्थ
अग्नि परीक्षा का अर्थ आग में चलना नहीं।
अग्नि का अर्थ है—
सत्य।
जब जीवन के सारे बहाने,
सारे तर्क,
सारे मुखौटे,
सारे प्रमाणपत्र,
सारी उपाधियाँ
जलकर समाप्त हो जाती हैं।
तब जो बचता है,
वही सत्य है।
तीसरी आँख
और तभी तीसरी आँख खुलती है।
मैंने एक कविता लिखी थी—
तीसरी आँख
ये मेरी आँखें धोखा तो नहीं दे रहीं हैं?
या सचमुच कोई मायावी रूप फिर से जग को भरमा रहा है?
चमक-दमक का ऐसा मेला, झूठ-सच का ऐसा खेला, चेहरे पर मुस्कान सजाए, अंतर में कोई और ही मेला।
मेरी तीसरी आँख जो पड़ गई तुझ पर, यहीं भस्म हो जाएगा।
तेरा छल, तेरा बल, तेरा झूठा वैभव जल जाएगा।
...
क्योंकि तीसरी आँख क्रोध की नहीं होती,
वह विवेक की होती है।
वह चेहरा नहीं, चरित्र देखती है।
वह शब्द नहीं, भाव देखती है।
वह प्रचार नहीं, उद्देश्य देखती है।
जजमेंट डे क्या है?
बहुत लोग सोचते हैं कि जजमेंट डे किसी भविष्य की घटना है।
किसी विशेष धर्म का सिद्धांत है।
किसी महाप्रलय का दिन है।
परंतु शायद जजमेंट डे प्रतिदिन घटता है।
जब—
- झूठ सत्य से टकराता है,
- अहंकार विनम्रता से टकराता है,
- प्रचार वास्तविकता से टकराता है,
- भ्रम अनुभव से टकराता है।
तब जजमेंट डे होता है।
एक और संवाद
एक व्यक्ति आया।
बोला—
"महादेव,
मैंने चालीस नहीं,
तीस साल भीख माँगकर खाया है।"
महादेव मुस्कुराए।
"पुत्र,
समस्या भीख माँगने की नहीं है।
समस्या यह है कि तूने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि तेरे भीतर क्या सामर्थ्य था।"
फिर गणेश जी की ओर देखकर बोले—
"इसको दंड मत दो।
इसे समझ दो।"
IITian और धोबी
कलियुग का एक और भ्रम बड़ा रोचक है।
कोई कहता है—
"मैं IITian हूँ।"
कोई कहता है—
"मैं साधु हूँ।"
कोई कहता है—
"मैं नेता हूँ।"
कोई कहता है—
"मैं विद्वान हूँ।"
लेकिन जजमेंट डे पर न IIT बचता है,
न सिंहासन,
न वेशभूषा,
न उपाधि।
केवल कर्म बचते हैं।
केवल चरित्र बचता है।
केवल चेतना बचती है।
अंतिम निर्णय
जजमेंट डे पर ईश्वर शायद यह नहीं पूछेंगे—
"तुम किस धर्म के थे?"
"किस दल के थे?"
"किस जाति के थे?"
"किस विश्वविद्यालय से पढ़े थे?"
वे शायद केवल इतना पूछेंगे—
"क्या तुमने सत्य को पहचाना?"
"क्या तुमने भय से ऊपर उठकर जीवन जिया?"
"क्या तुमने अपने भीतर की तीसरी आँख को जगाया?"
निष्कर्ष
रावण का अंत इसलिए नहीं हुआ कि उसके दस सिर थे।
उसका अंत इसलिए हुआ क्योंकि वह स्वयं को देखने की क्षमता खो बैठा।
सीता की अग्नि परीक्षा इसलिए नहीं थी कि उन्हें कुछ सिद्ध करना था।
वह संसार के सामने सत्य की ज्योति थी।
और जजमेंट डे?
वह किसी भविष्य की तारीख नहीं।
वह वह क्षण है
जब मनुष्य अपने सारे बहानों से मुक्त होकर
अपने वास्तविक स्वरूप के सामने खड़ा हो जाता है।
उसी दिन तीसरी आँख खुलती है।
उसी दिन माया भस्म होती है।
उसी दिन घर वापसी शुरू होती है।
🙏
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