ज़ीरो में हीरो ढूँढ़ते रहे हम
ज़ीरो में हीरो ढूँढ़ते रहे हम,
बारह सालों से यूँ ही घूमते रहे हम।
कभी डेटा के जंगल में भटके,
कभी आँकड़ों के महल में अटके,
जोखिम के चार्ट बनाते रहे हम,
ज़ीरो में हीरो ढूँढ़ते रहे हम।
कभी नेता में अवतार तलाशा,
कभी गुरु में उद्धार तलाशा,
हर चेहरे पर ताज सजाते रहे हम,
ज़ीरो में हीरो ढूँढ़ते रहे हम।
कभी बाज़ार को भगवान माना,
कभी विज्ञान को अंतिम ठिकाना,
समीकरणों में सत्य खोजते रहे हम,
ज़ीरो में हीरो ढूँढ़ते रहे हम।
कभी खुद को सिकंदर समझा,
कभी अपने ज्ञान पर इतराया,
अहंकार के किले बनाते रहे हम,
ज़ीरो में हीरो ढूँढ़ते रहे हम।
फिर शून्य ने धीरे से हँसकर पूछा—
"जिसे खोज रहे हो, वह कौन है?"
दर्पण सामने रखकर बोला—
"यहाँ न कोई राजा, न कोई दास है।
मैं ही आरंभ, मैं ही अंत हूँ,
मैं ही प्रश्न, मैं ही संत हूँ।
तुम बाहर-बाहर भटकते रहे,
मैं भीतर ही बैठा अनंत हूँ।"
तब समझ आया जीवन का मर्म,
न पद, न यश, न कोई धर्म।
जो खुद को शून्य बना पाया,
उसी ने सच्चा हीरो पाया।
बारह साल की सारी कथा का,
बस इतना ही निचोड़ रहा—
हीरो कोई और नहीं था,
ज़ीरो ही हीरो का दूसरा नाम रहा।
"चले थे हीरो बनने जग में,
शून्य ने ऐसा ज्ञान दिया—
जब 'मैं' मिटा तो सत्य मिला,
और ज़ीरो ने हीरो को जन्म दिया।"
ज़ीरो की धरती
सभा में नेता जी बोले हँसकर—
"भाइयों और बहनों,
ये जीरो की धरती है!"
इतना सुनना था कि पीछे से
एक स्वर आया तन कर—
"ओए पनौती!
जीरो की नहीं, वीरों की धरती है!"
भीड़ ने ताली खूब बजाई,
वीरों की गाथा फिर दोहराई।
किसी ने तलवार का मान गिनाया,
किसी ने अपना इतिहास सुनाया।
कोई बोला— "मैं विजेता हूँ!"
कोई बोला— "मैं नेता हूँ!"
कोई बोला— "मैं ज्ञानी हूँ!"
कोई बोला— "मैं बलिदानी हूँ!"
सब अपने-अपने ढोल बजाते,
अपने किस्से खुद सुनाते।
हीरो बनने की ऐसी होड़,
अहंकार की लगी थी दौड़।
तब शून्य कहीं कोने में हँसा,
समय भी धीरे-धीरे मुस्काया।
बोला—
"वीरों की धरती है, मान लिया,
पर वीर कहाँ से आते हैं भाई?
जिस शून्य को तुम भूल गए हो,
उसी की गोद से जन्मे हो भाई।
शून्य से संख्या बनी जगत की,
शून्य से विज्ञान खड़ा हुआ।
शून्य से ही गणित निकला,
शून्य से ही संसार बड़ा हुआ।
तुम वीर हो, इसमें क्या संशय,
पर सुन लो जीवन का रहस्य—
जो जितना ऊँचा उड़ता है,
वह उतना ही शून्य में लौटता है।
राजा, रंक, फकीर, सिकंदर,
सबका अंतिम लेखा एक।
इतिहास के लंबे कागज़ पर,
समय लिखता बस एक रेख—
०"
सभा में सन्नाटा छा गया,
अहंकार थोड़ा झुक सा गया।
फिर शून्य ने मुस्काकर कहा—
"वीरों की धरती है भारत,
इसमें कोई विवाद नहीं।
पर जो शून्य का अर्थ समझ ले,
उससे बड़ा वीर कोई नहीं।"
और समय ने अंतिम ठहाका लगाया—
**"चले थे हीरो बनने जग में,
यश का मुकुट पहनने को।
बारह साल तक खोजते रहे,
हीरो को उस ज़ीरो में...
फिर पता चला—
हीरो और ज़ीरो में
बस अहंकार भर का फ़र्क़ था!"** 🌿
"जो 'मैं' से भर गया, वह हीरो कहलाया,
जो 'मैं' से खाली हुआ, वह शून्य हो गया।
और जिसने शून्य को जान लिया,
वही सचमुच वीर हो गया।"
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