Sunday, June 14, 2026

कलियुग का कर्मयोग - मौजूद पाखंड, भ्रष्टाचार और दोहरे मापदंड !

 https://www.linkedin.com/posts/akshat-agrawal-45b59027b_risk-safety-security-activity-7472171729226985472-R44X?utm_source=share&utm_medium=member_android&rcm=ACoAAERAR4cBN2RH30KUQx-XnpD3kNjE8Tt7IAI

आपके व्यंग्य का लक्ष्य किसी जाति विशेष पर नहीं बल्कि समाज में मौजूद पाखंड, भ्रष्टाचार और दोहरे मापदंड होने चाहिए। इसी भावना में एक व्यंग्यात्मक कविता:

कलियुग का कर्मयोग

क्षत्रिय हो तो नाम कमाओ,
गुंडागर्दी को शौर्य बताओ।
राहजनी को नीति कहो,
फिर इतिहास में वीर कहलाओ।

ब्राह्मण हो तो ज्ञान बेचो,
धर्म का बढ़िया ब्रांड रचो।
स्वर्ग-नरक की फ्रेंचाइज़ी खोलो,
भोली जनता का मन मोलो।

वैश्य हो तो लेखा गढ़ लो,
कानूनों में सुराख पकड़ लो।
कर बचाने को कला बताओ,
फिर खुद को राष्ट्रनिर्माता कहाओ।

शूद्र हो तो खून बहाओ,
दिन-रात चक्की में पिस जाओ।
रोटी, कपड़ा, छत को तरसो,
फिर भी कर्मयोगी कहलाओ।

नेता हो तो वादे बोओ,
चुनाव बाद सब भूल भी जाओ।
सत्ता को सेवा बतलाकर,
अपने हित के फूल खिलाओ।

विशेषज्ञ हो तो आँकड़े लाओ,
जो चाहो वह सिद्ध कर जाओ।
जोखिम, डेटा, मॉडल, चार्ट,
सच को कर दो टुकड़े-टुकड़े आठ।

फिर सब मिलकर गीत सुनाएँ—
"यही व्यवस्था, यही विधान!"
जनता पूछे, "सच कहाँ है?"
उत्तर आए—"डेटा में है प्रमाण!"

कलियुग का यह अद्भुत मेला,
सबने पहना मुखौटा रंगीला।
सत्य खड़ा है कोने में चुप,
झूठ बजा रहा ढोल मंजीरा।

और ऊपर बैठा समय हँसता—
"कितना सुंदर खेल रचाया!
जिसने सबसे ज्यादा भ्रम बेचा,
उसी ने सबसे बड़ा सम्मान पाया!"

No comments:

Post a Comment