Monday, June 15, 2026

जागो मोहन प्यारे - एक कलियुगी हास्य नाटिका

 

जागो मोहन प्यारे

(प्रस्तावना : एक कलियुगी हास्य नाटिका)

पात्र

  • आका
  • जिन्न
  • मच्छर महासंघ
  • निद्रा देवी

दृश्य 1 : कलियुग का महल

आका बिस्तर पर लेटे हुए हैं।

बाहर दुनिया में:

  • जलवायु परिवर्तन,
  • महंगाई,
  • युद्ध,
  • चुनाव,
  • क्रांति,
  • सोशल मीडिया,

सब चल रहा है।

लेकिन आका गहन चिंतन में हैं।


आका (करवट बदलते हुए):

मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ,

मुँह ढक के क्यों न सो जाऊँ।


इतने में जिन्न प्रकट हुआ।

"क्या हुकुम है मेरे आका?"


दृश्य 2 : काम की तलाश

जिन्न बेचैन था।

बोला—

"आका,

मुझे कोई काम बताइए।

बिना काम के मैं रह नहीं सकता।"


आका ने एक आँख खोलकर देखा।

फिर बोले—

"ओए जिन्न,

जब तक मैं सो रहा हूँ,

पंखा झेलते रहो।

एक भी मच्छर नहीं आना चाहिए।"


जिन्न ने तुरंत सलाम ठोका।

"जो हुकुम मेरे आका!"


दृश्य 3 : संकट

पाँच मिनट बाद जिन्न फिर आ गया।

"आका,

इसमें तो मेरा एक हाथ ही काफी है।"


आका:

"तो?"


जिन्न:

"दूसरे हाथ से क्या करूँ?"


आका ने फिर करवट बदली।

थोड़ी देर सोचा।

फिर बोले—

"खोपड़ी पकड़ ले अपनी।"


दृश्य 4 : राष्ट्रीय संकट

तभी मच्छर महासंघ का प्रतिनिधि आया।

"यह अन्याय है।

हमारे मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है।"


जिन्न बोला—

"दफा हो जाओ।

आका सो रहे हैं।"


मच्छर बोला—

"लेकिन देश में महंगाई बढ़ रही है।"


जिन्न:

"आका सो रहे हैं।"


"मौसम बिगड़ रहा है।"


"आका सो रहे हैं।"


"किसान परेशान हैं।"


"आका सो रहे हैं।"


"जनता प्रश्न पूछ रही है।"


"आका सो रहे हैं।"


दृश्य 5 : निद्रा देवी

तभी निद्रा देवी प्रकट हुईं।

उन्होंने आका के सिर पर हाथ रखा।

और बोलीं—

"सोने दो।

अभी कथा शुरू नहीं हुई।"


जिन्न ने पूछा—

"तो कथा कब शुरू होगी?"


निद्रा देवी मुस्कुराईं।

"जब मच्छर भी भाषण देने लगें,

जब बादल भी प्रश्न पूछने लगें,

जब जनता भी हिसाब माँगने लगे,

तब।"


दृश्य 6 : जागरण

अचानक दूर कहीं से आवाज़ आई—

"जागो मोहन प्यारे...

जागो..."


आका हड़बड़ाकर उठ बैठे।

"अरे!

यह किसने कहा?"


निद्रा देवी बोलीं—

"प्रभु,

यह अलार्म घड़ी नहीं है।"


"फिर?"


"यह समय है।

और समय जब पुकारता है,

तो सोने वालों को भी उठना पड़ता है।"


उपसंहार

जिन्न अभी भी पंखा झेल रहा है।

एक हाथ से।

दूसरे हाथ से अपनी खोपड़ी पकड़े हुए।

मच्छर महासंघ धरना दे रहा है।

निद्रा देवी मुस्कुरा रही हैं।

और दूर कहीं से फिर वही स्वर सुनाई देता है—

"जागो मोहन प्यारे..."

"जागो..."


(अब आगे पढ़िए : "सत नारायण कथा – जागो मोहन प्यारे")

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