भूत निवारण अष्टक
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(कलियुग, अहंकार और विचार-भूतों से मुक्ति हेतु एक व्यंग्यात्मक स्तुति)
१
ओए, कौन है रे भीतर बैठा? कौन चला रहा देह? बोली तेरी अपनी लगती, पर कुछ गड़बड़ से नेह।
"तेरी अम्मा!" उत्तर आया, बड़ा प्रचंड प्रभाव। अम्मा तो पहचान रहे हैं, ये कैसा विकृत स्वभाव?
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२
वो तो हमको दिख रही है, बैठी रोटी सेंक। पर तेरे हाव-भाव निराले, ज्यों नेता बदले फेंक।
बोली चाली, भाव भंगिमा, सब कुछ हुआ विकार। लगता है कोई पुराना भूत करता भीतर व्यापार।
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३
रुक जा दुष्ट! बताता हूँ मैं, नाम बता पहचान। जाति, पंथ, दल, संगठन क्या? किसका लेता नाम?
भूत हँसा फिर धीरे बोला, "रूप बदलता जाऊँ। कभी विचार, कभी अहंकार, कभी भीड़ बन आऊँ।"
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४
कभी धर्म के नाम चढ़ूँ मैं, कभी राष्ट्र के नाम। कभी प्रगति, कभी क्रांति बनकर, कर दूँ सब बदनाम।
कभी गुरुओं पर सवार होऊँ, कभी नेता के माथ। कभी भक्त को उन्मत्त बनाऊँ, छोड़ विवेक का साथ।
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५
भागो रे! कोई भूत सवार है, प्रभु इसके ऊपर। सुनता नहीं किसी की बात, बैठा अहं के कूप पर।
अपने को ही सत्य समझता, बाकी सब अज्ञान। ऐसे जन के भीतर बैठे, दंभ-पिशाच महान।
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६
तब हनुमत की ध्वजा उठी, गूँजा मंगल नाम। भय से काँपे भूत-पिशाच, सुनकर बजरंग धाम।
भूत पिशाच निकट नहीं आवै,
महावीर जब नाम सुनावै।
यह केवल मंत्र नहीं है, गहरा इसका अर्थ। जहाँ विवेक और साहस जागे, वहाँ मिटे अनर्थ।
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७
हनुमान का नाम न केवल भूत भगाने हेतु। अहंकार, भय, मोह मिटाने, चेतनता का सेतु।
जो प्रश्न करे, जो सत्य खोजे, जो सेवा में रत। उसके ऊपर टिक न पाए भूत-प्रेत की गत।
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८
अंत समय जब भूत भागे, हँसे स्वयं भगवान। "पुत्र, भूत बाहर कम होते, भीतर उनका स्थान।"
जिस दिन मन का शुद्धिकरण हो, छूटे मिथ्या जाल। उस दिन घर वापसी होगी, मिटे सकल विकराल।
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फलश्रुति
न यह केवल भूत उतारे, न केवल डर हरे। यह अष्टक स्मरण करावे — मन के भूतों से डरे।
अहंकार, अंधी भक्ति, क्रोध, लोभ, अभिमान। इनसे जो मुक्ति पा लेता, वही बने इंसान।
🙏 जय हनुमान ज्ञान गुण सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर। 🙏 :::
Wednesday, June 10, 2026
भूत निवारण अष्टक
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