मूर्ति, मंदिर और ईमान
धर्म का सबसे पुराना प्रश्न
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एक दिन मैंने एक विचित्र दृश्य देखा।
एक तरफ बैठे थे—
महान विद्वान।
शास्त्रों के ज्ञाता।
संस्कृत के प्रकांड पंडित।
धर्माचार्य।
जगद्गुरु।
और दूसरी तरफ बैठा था एक साधारण आदमी।
न कोई विशेष शिक्षा।
न कोई बड़ा पद।
न कोई प्रतिष्ठा।
सिर्फ एक प्रश्न।
भाग 1 : साधारण आदमी का प्रश्न
उसने हाथ जोड़कर पूछा—
"महाराज, एक बात ईमानदारी से बताइए।"
सभा शांत हो गई।
वह बोला—
"यदि कोई व्यक्ति मंदिर जाता है,
पूजा करता है,
दान देता है,
लेकिन झूठ बोलता है,
छल करता है,
गरीबों का शोषण करता है,
तो क्या वह धार्मिक है?"
महाराज कुछ क्षण मौन रहे।
क्योंकि प्रश्न नया नहीं था।
लेकिन कठिन अवश्य था।
भाग 2 : मूर्ति पूजा या मन की पूजा?
भारत में यह विवाद नया नहीं है।
उपनिषदों ने प्रश्न पूछा।
बुद्ध ने प्रश्न पूछा।
कबीर ने प्रश्न पूछा।
नानक ने प्रश्न पूछा।
क्या ईश्वर पत्थर में है?
या मनुष्य के व्यवहार में?
कबीर ने कहा—
"पाहन पूजे हरि मिले,
तो मैं पूजूँ पहाड़।"
लेकिन उसी भारत में भक्तों ने मूर्ति के माध्यम से प्रेम भी पाया।
मीरा ने पाया।
रामकृष्ण परमहंस ने पाया।
तुलसीदास ने पाया।
तो फिर सत्य क्या है?
भाग 3 : समस्या मूर्ति नहीं
शायद समस्या मूर्ति नहीं है।
समस्या वह मन है,
जो सोचता है कि पूजा से पाप का हिसाब मिट जाएगा।
समस्या वह मानसिकता है,
जो धर्म को लेन-देन बना देती है।
"थोड़ा दान,
थोड़ी पूजा,
और फिर जैसा मन चाहे वैसा व्यवहार।"
यहाँ धर्म साधना नहीं,
व्यापार बन जाता है।
भाग 4 : गुरुजी, क्या पढ़ा रहे हो?
फिर एक पिता क्रोधित होकर बोला—
"गुरुजी!
मेरे बच्चों को क्या सिखा रहे हो?
क्या जीवन भर केवल संतोष की बातें करते रहोगे?"
प्रश्न कठोर था।
लेकिन महत्वपूर्ण भी।
क्योंकि संतोष का अर्थ आलस्य नहीं है।
संतोष का अर्थ यह नहीं कि
अन्याय सहते रहो।
गरीबी को महिमा मंडित करो।
अयोग्यता को आध्यात्मिकता कह दो।
भाग 5 : संतोष और पुरुषार्थ
भारतीय दर्शन चार पुरुषार्थों की बात करता है:
- धर्म
- अर्थ
- काम
- मोक्ष
सिर्फ मोक्ष नहीं।
सिर्फ त्याग नहीं।
सिर्फ धन भी नहीं।
संतुलन।
यही भारतीय दृष्टि है।
भाग 6 : ईमानदार आदमी और धर्माचार्य
अब दृश्य और रोचक हो गया।
साधारण आदमी ने पूछा—
"यदि कोई व्यक्ति मूर्ति पूजा नहीं करता,
लेकिन ईमानदारी से जीवन जीता है,
सत्य बोलता है,
दूसरों का शोषण नहीं करता,
तो क्या वह अधार्मिक है?"
यह प्रश्न केवल हिंदू धर्म से नहीं।
हर धर्म से पूछा जा सकता है।
भाग 7 : राम क्या कहते?
यदि तुलसीदास के राम उत्तर देते,
तो शायद कहते—
"मुझे सोने के मंदिर से अधिक प्रिय
एक सत्यवादी हृदय है।"
राम का जीवन यज्ञों से नहीं,
मर्यादा से महान हुआ।
भाग 8 : कबीर की अदालत
कल्पना कीजिए।
एक ओर विशाल मंदिर।
दूसरी ओर एक ईमानदार मजदूर।
कबीर किसके पक्ष में खड़े होंगे?
शायद वे कहेंगे—
"मंदिर बुरा नहीं।
मूर्ति बुरी नहीं।
पर यदि मन झूठा है,
तो पूजा अधूरी है।"
उपसंहार : धर्म की अंतिम परीक्षा
धर्म की अंतिम परीक्षा मंदिर में नहीं होती।
मस्जिद में नहीं होती।
मठ में नहीं होती।
वह होती है—
जब कोई देख नहीं रहा होता।
जब लाभ और सत्य में चुनाव करना होता है।
जब शक्ति और न्याय में चुनाव करना होता है।
जब स्वार्थ और करुणा में चुनाव करना होता है।
उस क्षण जो निर्णय होता है,
वही मनुष्य का वास्तविक धर्म है।
क्योंकि अंततः
ईश्वर को शायद हमारे मंत्रों से कम,
और हमारे चरित्र से अधिक मतलब है।
और यदि पूजा हमें अधिक सत्यवादी,
अधिक करुणामय,
अधिक विनम्र,
और अधिक न्यायप्रिय नहीं बनाती,
तो हमें पूजा नहीं,
स्वयं को पुनः समझने की आवश्यकता है।
🙏
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