Saturday, June 13, 2026

देवी दर्शन और 500 रुपये का नाश्ता

 

देवी दर्शन और 500 रुपये का नाश्ता

मंदिर से अंतर्यात्रा तक

एक दिन मैं देवी के दर्शन करने निकला।

सुबह-सुबह स्नान किया।

नए कपड़े पहने।

प्रसाद लिया।

मन में बड़ी श्रद्धा थी।

सोचा—

"आज माता के दर्शन होंगे,

जीवन धन्य हो जाएगा।"

लेकिन मंदिर पहुँचते ही आध्यात्मिकता की पहली परीक्षा शुरू हो गई।


भाग 1 : मोक्ष की लाइन

सबसे पहले दिखी एक लंबी लाइन।

इतनी लंबी कि लगा

देवी माँ नहीं,

सरकारी राशन की दुकान खुली हो।

आगे बढ़ो तो पीछे से धक्का।

पीछे हटो तो आगे से धक्का।

बाएँ देखो तो कोई कोहनी मार रहा।

दाएँ देखो तो कोई पैर पर चढ़ रहा।

मैंने सोचा—

"हे माता, आपके दर्शन करने आया हूँ या महाभारत का युद्ध लड़ने?"


भाग 2 : गाय-बकरी दर्शन योजना

किसी तरह मुख्य द्वार तक पहुँचा।

तभी पंडा जी प्रकट हुए।

उनकी गति और ऊर्जा देखकर लगा

मानो स्वयं वायु देवता का अवतार हों।

जो भी भक्त सामने आता,

उसे ऐसे धकेलते

जैसे चरवाहा भेड़-बकरियों को हाँक रहा हो।

मैंने हाथ जोड़कर कहा—

"महाराज, जरा दो सेकंड रुकने दीजिए।"

उन्होंने कहा—

"चलो चलो, आगे बढ़ो, लाइन रोको मत!"

मैं सोचता रह गया—

"देवी से मिल रहा हूँ या रेलवे प्लेटफॉर्म पर ट्रेन पकड़ रहा हूँ?"


भाग 3 : 500 रुपये का दिव्य दर्शन

फिर किसी सज्जन ने कान में कहा—

"विशेष दर्शन कर लो।"

मैंने पूछा—

"कितना?"

बोले—

"केवल 500 रुपये।"

अब तक श्रद्धा और अर्थशास्त्र का सुंदर संगम हो चुका था।

500 रुपये अर्पित किए।

तब जाकर

भीड़ के समुद्र में

देवी की एक झलक दिखाई दी।

लगभग तीन सेकंड।

फिर पीछे से धक्का।

और दर्शन समाप्त।


भाग 4 : वापसी में विचार

मंदिर से बाहर निकला।

मन में एक नया विचार आया।

मैंने हिसाब लगाया।

500 रुपये में तो—

अच्छा नाश्ता हो जाता।

गरमा-गरम कचौड़ी।

जलेबी।

दही।

चाय।

और शायद दो मित्रों को भी खिला देता।

मैं मुस्कुरा पड़ा।

फिर तुरंत अपराधबोध हुआ।

"हे माता, यह मैं क्या सोच रहा हूँ?"


भाग 5 : देवी का उत्तर

तभी भीतर से एक आवाज़ आई।

माँ हँस रही थीं।

बोलीं—

"पुत्र,

मैं तीन सेकंड की झलक में नहीं रहती।"

मैं चुप।

माँ फिर बोलीं—

"इतनी देर लाइन में खड़े रहे।

धक्का खाते रहे।

पंडा से बहस करते रहे।

लेकिन एक बार भी अपने भीतर झाँका?"


भाग 6 : असली दर्शन

मैंने पूछा—

"माँ, फिर आपके दर्शन कहाँ होंगे?"

माँ बोलीं—

"जब मन शांत होगा।

जब करुणा जागेगी।

जब किसी भूखे को भोजन कराओगे।

जब किसी दुखी को सांत्वना दोगे।

जब अपने अहंकार को थोड़ा कम करोगे।

तब मैं वहीं मिलूँगी।"


भाग 7 : नया निमंत्रण

मैंने हाथ जोड़कर कहा—

"माते,

इतनी भागदौड़,

इतनी लाइन,

इतनी धक्का-मुक्की,

और इतना हिसाब-किताब

मुझसे नहीं होता।"

फिर धीरे से बोला—

"नमस्ते।
आज से आप मेरे अंतर में पधारो दर्शन देने।"

माँ मुस्कुराईं।

"मैं तो पहले से वहीं बैठी हूँ।

तुम ही बाहर-बाहर मुझे खोजते फिर रहे थे।"


उपसंहार

उस दिन समझ आया कि

मंदिर जाना गलत नहीं।

तीर्थ करना भी गलत नहीं।

दर्शन करना भी गलत नहीं।

लेकिन यदि देवी केवल मंदिर में मिलतीं,

तो संत जंगलों में उन्हें कैसे पा लेते?

यदि देवी केवल मूर्ति में रहतीं,

तो भक्त अपने आँसुओं में उन्हें कैसे अनुभव करते?

और यदि देवी केवल विशेष दर्शन टिकट से मिलतीं,

तो गरीब का क्या होता?

शायद देवी आज भी मुस्कुराकर कहती हैं—

"पुत्र,

मंदिर आते रहो।

पर कभी-कभी अपने हृदय में भी झाँक लिया करो।

वहाँ लाइन नहीं है।

वहाँ कोई धक्का नहीं है।

और वहाँ दर्शन के लिए 500 रुपये भी नहीं लगते।"

🙏🙏

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