घर वापसी : मंदिर, मस्जिद और मन के पार
एक संत का संदेश
"बेटा, जिस दिन शुद्धिकरण हुआ — बुद्धि का, चित्त का — उस दिन घर वापसी होगी।"
मैंने पूछा —
"प्रभु, कौन सा घर?
कानपुर वाला?
अयोध्या वाला?
काशी वाला?
या स्वर्ग वाला?"
वे मुस्कुराए।
बोले —
"तुम अभी भी पता पूछ रहे हो।
घर कोई जगह नहीं है।
घर एक अवस्था है।"
भाग 1 : हम सब घर से बाहर हैं
मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह स्वयं को घर में समझता है।
वह मकान बना लेता है।
जमीन खरीद लेता है।
रिश्ते बना लेता है।
धर्म चुन लेता है।
पार्टी चुन लेता है।
राष्ट्र चुन लेता है।
और सोचता है —
"अब मैं स्थापित हो गया।"
लेकिन भीतर कहीं एक बेचैनी बनी रहती है।
कुछ अधूरा।
कुछ छूटा हुआ।
कुछ ऐसा जिसे शब्द नहीं मिलते।
यही संकेत है कि आत्मा अभी घर नहीं पहुँची।
भाग 2 : घर वापसी क्या है?
हमने "घर वापसी" को धर्म परिवर्तन और पहचान की बहसों में सीमित कर दिया है।
लेकिन संतों की भाषा में घर वापसी का अर्थ कुछ और है।
जब मन शांत हो जाए।
जब बुद्धि का अहंकार पिघल जाए।
जब चित्त की अशुद्धियाँ धुल जाएँ।
जब "मैं" और "मेरा" का शोर धीमा पड़ जाए।
तब आत्मा अपने मूल स्वरूप में लौटती है।
यही वास्तविक घर वापसी है।
भाग 3 : वहाँ कोई मंदिर-मस्जिद नहीं
संत आगे बोले —
"फिर न वहाँ कोई मंदिर होगा, न मस्जिद।"
यह धर्म विरोध नहीं है।
यह धर्म की पराकाष्ठा है।
नदी का उद्देश्य समुद्र तक पहुँचना है।
समुद्र तक पहुँचकर नदी अपना नाम खो देती है।
गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र —
सब समुद्र में एक हो जाते हैं।
इसी प्रकार साधना की अंतिम अवस्था में
नाम, पंथ, सम्प्रदाय,
सब पीछे छूट जाते हैं।
भाग 4 : वहाँ कोई भारत-पाकिस्तान नहीं
सीमाएँ आवश्यक हैं।
राज्य आवश्यक हैं।
राष्ट्र आवश्यक हैं।
लेकिन आत्मा का भूगोल अलग होता है।
वह पासपोर्ट नहीं पूछती।
वह वीज़ा नहीं मांगती।
वह भाषा, जाति, धर्म से परे होती है।
इसलिए संत कहते हैं —
"वहाँ न भारत होगा, न पाकिस्तान।"
क्योंकि वहाँ विभाजन का आधार ही नहीं बचता।
भाग 5 : वहाँ राम और रावण भी नहीं
यह सुनकर लोग चौंक जाते हैं।
"क्या राम भी नहीं?"
संत कहते हैं —
जब तक द्वैत है,
तब तक राम भी हैं और रावण भी।
कृष्ण भी हैं और कंस भी।
धर्म भी है और अधर्म भी।
प्रकाश भी है और अंधकार भी।
लेकिन जहाँ अद्वैत का अनुभव होता है,
वहाँ विरोध समाप्त हो जाते हैं।
लहरें अलग दिखती हैं।
समुद्र एक होता है।
भाग 6 : सीता की मुद्रा
अशोक वाटिका में सीता की एक कल्पना मुझे बार-बार आकर्षित करती है।
माथा घुटनों के ऊपर।
दृष्टि भीतर की ओर।
बाहर लंका है।
बाहर सत्ता है।
बाहर भय है।
बाहर युद्ध की तैयारी है।
पर भीतर मौन है।
प्रतीक्षा है।
विश्वास है।
सीता की यह मुद्रा केवल दुःख की नहीं।
यह आत्मनिष्ठा की मुद्रा है।
भाग 7 : ऋष्यमूक पर राम
उधर ऋष्यमूक पर्वत पर राम हैं।
राज्य गया।
परिवार बिखरा।
पत्नी दूर।
भविष्य अनिश्चित।
फिर भी यात्रा जारी है।
क्यों?
क्योंकि बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों,
आंतरिक ध्रुव बना रह सकता है।
सीता और राम दोनों एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं —
स्थिति नहीं, चेतना महत्वपूर्ण है।
भाग 8 : शून्यता और नीरवता
आख़िरकार साधक उस बिंदु पर पहुँचता है
जहाँ शब्द भी साथ छोड़ देते हैं।
न कोई विचार।
न कोई तर्क।
न कोई वाद-विवाद।
न कोई पहचान।
केवल —
शून्यता।
नीरवता।
और उसी नीरवता में एक ध्वनि सुनाई देती है।
न कानों से।
न बुद्धि से।
बल्कि अस्तित्व से।
"एक ओंकार सतनाम।"
भाग 9 : तब तक स्वांग चलता रहे
लेकिन हम अभी वहाँ नहीं पहुँचे हैं।
अभी तो हम भूमिकाएँ निभा रहे हैं।
कोई नेता है।
कोई भक्त है।
कोई नास्तिक है।
कोई गुरु है।
कोई शिष्य है।
कोई राम का पक्षधर है।
कोई रावण का।
कोई भारत का।
कोई पाकिस्तान का।
कोई मंदिर का।
कोई मस्जिद का।
संसार का रंगमंच चल रहा है।
इसलिए संत हँसकर कहते हैं —
"तब तक, जितना स्वांग रचना है, रच ले।"
भाग 10 : एक रहस्यमय टेलीफोन कॉल
उसी समय साधक का फ़ोन बजा।
ट्रिंग... ट्रिंग...
"हेलो?"
दूसरी ओर से आवाज़ आई —
"कौन बोल रहा है?"
साधक बोला —
"पहले आप बताइए।"
आवाज़ फिर आई —
"नाम-पता कुछ है आपका?"
साधक थोड़ा सोच में पड़ गया।
बचपन से अब तक कितने नाम मिले थे।
बेटा।
भाई।
पति।
पिता।
इंजीनियर।
हिंदू।
भारतीय।
मतदाता।
भक्त।
नागरिक।
लेकिन इनमें से कौन सा उसका वास्तविक नाम था?
वह चुप रहा।
आवाज़ फिर बोली —
"किससे बात करनी है?"
साधक ने कहा —
"शायद स्वयं से।"
दूसरी ओर कुछ क्षण मौन रहा।
फिर उत्तर आया —
"यहाँ कोई पनौती-रनौती नहीं रहता।
न कोई राम।
न कोई रावण।
न कोई भारत।
न कोई पाकिस्तान।
न कोई विजेता।
न कोई पराजित।
गलत नंबर लग गया है।"
साधक घबरा गया।
"तो फिर यह कौन सी जगह है?"
उत्तर आया —
"जहाँ नाम समाप्त हो जाते हैं और पहचानें उतर जाती हैं।
जहाँ प्रश्न बचते हैं, प्रश्नकर्ता नहीं।
जहाँ केवल मौन है।"
साधक कुछ और पूछता,
उससे पहले ही आवाज़ आई —
"फोन ब्लॉक कर रहा हूँ।"
क्लिक।
लाइन कट गई।
साधक देर तक मोबाइल को देखता रहा।
फिर मुस्कुराया।
शायद पहली बार उसे समझ आया कि
जिसे वह जीवन भर बाहर खोज रहा था,
वह किसी फ़ोन डायरेक्टरी में नहीं मिलने वाला।
क्योंकि अंतिम सत्य का न कोई मोबाइल नंबर है,
न कोई पता।
वह केवल अनुभव है।
उपसंहार : अंतिम घर
शायद जीवन का उद्देश्य किसी विचारधारा की जीत नहीं है।
किसी धर्म की जीत नहीं।
किसी राष्ट्र की जीत नहीं।
बल्कि उस आंतरिक घर तक पहुँचना है
जहाँ पहुँचकर जीत और हार दोनों अर्थ खो देते हैं।
जहाँ प्रश्न समाप्त नहीं होते,
पर प्रश्नकर्ता विलीन हो जाता है।
जहाँ मंदिर और मस्जिद अपने उद्देश्य को पूरा कर चुके होते हैं।
जहाँ राम और रावण दोनों कथा बन चुके होते हैं।
जहाँ केवल मौन शेष रहता है।
और उस मौन में,
अनंत की धीमी फुसफुसाहट सुनाई देती है —
"बेटा, घर आ गया।"
🙏🙏
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