उड़ जाएगा हँस अकेला —
जग दर्शन का मेला
पहले यह सुनिए —
▶ यहाँ क्लिक करें — उड़ जाएगा हँस अकेला
सुन लिया?
अब बताइए — क्या यह सिर्फ एक पुराना Bollywood गाना है?
या कबीर का वो दोहा है जिसे किसी ने सुर में ढाल दिया?
ओ दूर के मुसाफिर, हमको भी साथ ले ले रे,
हमको भी साथ ले ले — हम रह गए अकेले।
यह आवाज़ — लता मंगेशकर की। यह फिल्म — उड़न खटोला, १९५५। यह बोल — शायद आज तक के सबसे गहरे।
और यह हँस — वही जिसे कबीर सदियों से बुला रहे थे।
"हँस अकेला, जग दर्शन का मेला —
देखे और चले, देखे और चले।"
— कबीर
हँस माने आत्मा। शुद्ध, उजला, अकेला।
यह जग — मेला है। रंग-बिरंगा, शोरगुल वाला, लुभावना।
आत्मा आई थी — देखने। सीखने। जागने।
और चली जाएगी — अकेले।
साथ कुछ नहीं जाएगा।
न लल्लू राम का फेसबुक account।
न टपोरी की WhatsApp group admin की पदवी।
न पनौती के YouTube subscribe का आँकड़ा।
सिर्फ — साधना जाएगी। या जाहिलत।
हमको जाहिलता ने क्या-क्या बना दिया
एक बड़ा सवाल पूछता हूँ।
आज का औसत भारतीय — जो WhatsApp पर forward करता है, Facebook पर react करता है, YouTube पर comment करता है — वो क्या सोचता है?
सोचता नहीं।
React करता है।
और यह दोष उसका नहीं — पूरा। एक व्यवस्था ने उसे ऐसा बनाया।
१८३५ में Macaulay ने एक policy बनाई — "भारतीय शरीर में, अंग्रेज़ दिमाग डालो।" School बने। Syllabus बना। Rote learning आई। सोचना — बंद हुआ।
फिर १९९० के बाद — cable TV आई। फिर smartphone। फिर algorithm।
Algorithm ने वो काम पूरा किया जो Macaulay ने शुरू किया था।
जब कुछ लिख-पढ़ न सके —
तो पनौती बना दिया।
जब कुछ समझ न सके —
तो टपोरी बना दिया।
जब कुछ सोच न सके —
तो लल्लू राम बना दिया।
और इन तीनों को — अंध भक्ति का चढ़ावा चढ़ा दिया।
अब वो किसी के भी पीछे चल देते हैं। जो सबसे ऊँचे स्वर में चिल्लाए — उसे Guru मान लो। जो सबसे चमकीला दिखे — उसे भगवान मान लो।
हँस अकेला उड़ रहा है — और ये तीनों मेले में खो गए।
ओ दूर के मुसाफिर — हमको भी साथ ले ले रे
यह गीत एक पुकार है।
आत्मा की पुकार — उस हँस से, जो जाने वाला है।
"रुको मत — हमें भी ले चलो।"
यह पुकार तब उठती है — जब कोई पहली बार सच में सुनता है। पहली बार किसी राग में डूबता है। पहली बार किसी Guru के शब्द में अपना सच पाता है।
उस एक पल में — लल्लू राम, पनौती और टपोरी तीनों गायब हो जाते हैं।
बचती है — बस आत्मा।
और वो आत्मा पूछती है —
"इतने साल मैं कहाँ था?"
नहीं Subscribe किया तो अब कर लो — वरना...
इस blog पर, Substack पर — जो लिखा जाता है वो इसीलिए नहीं लिखा जाता कि आँकड़े बढ़ें।
लिखा जाता है — इसलिए कि शायद एक हँस और जाग जाए।
शायद एक पनौती सोचने लगे।
एक टपोरी पढ़ने लगे।
एक लल्लू राम — संगीत सुनने लगे।
और अगर वो न हो — तो भी ठीक है।
हँस अकेला उड़ेगा — जग दर्शन का मेला।
पर Subscribe ज़रूर कर लो। वरना रह जाओगे — मेले में अकेले। 😄
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🎬 वो गाना फिर से सुनिए — उड़ जाएगा हँस अकेला
Akshat Agrawal | Sangeet Visharad, Bhatkhande | IIT–BHU
akshat08.blogspot.com · @akshat08 on Substack
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