कव्वाली मुसलमानों की और अंताक्षरी हिंदुओं की?
रसोई, राग, भाषा और पहचान की राजनीति पर एक छोटी सी ग़ज़ल और एक लंबी बातचीत
अक्षत अग्रवाल
कव्वाली मुसलमानों की और अंताक्षरी हिंदुओं की।
हिंदी हिंदुओं की और हिंदुस्तानी / उर्दू मुसलमानों की।
बिरयानी मुस्लिमों की और खिचड़ी हिंदुओं की।
तंदूरी पराठा मुस्लिमों का और रोटी हिंदुओं की।
इला, अल्लाह मुस्लिमों के और ईशा, ईश्वर हिंदुओं के!वाह वाह वाह!
कभी-कभी लगता है कि हमने इस देश को नक्शे से कम और रसोई, भाषा और संगीत से ज़्यादा बाँट दिया है।
एक छोटी सी ग़ज़ल
मतला
किसी ने बाँट दीं आवाज़ें, किसी ने बाँट दी थाली,
मगर गंगा की लहर बोली — कहाँ जाती है खुशहाली।
कव्वाली को उधर लिख दो, इधर लिख दो भजन सारे,
हवा पूछे — बताओ तो, किसी मज़हब की है ताली?
उधर बिरयानी महकी है, इधर खिचड़ी की सौंधी भाप,
चूल्हे हँसकर कहें — हमको न आती जात की गाली।
किसी ने उर्दू को रोका, किसी ने हिंदी को बाँटा,
ज़ुबाँ बोली — मैं माँ हूँ, न मेरी कोई रखवाली।
अज़ाँ भी गूँजती दिल में, शंख भी बजते हैं भीतर,
सुनो तो एक ही सुर है, बदल जाती है बस लय-ताली।
मक़ता
अक्षत यह सोचता बैठा घाटों की सांझ में अक्सर,
कहाँ से आ गई दीवार इस मिट्टी की घरवाली?
किसकी भाषा?
हिंदी और उर्दू दोनों सदियों की साझी बोलियों से बनीं।
कई शब्द:
- संस्कृत से आए,
- फ़ारसी से आए,
- अरबी से आए,
- लोकभाषाओं से आए।
जब कोई कहता है:
"यह भाषा उनकी है, यह हमारी।"
तो शायद भाषा स्वयं मुस्कुराती होगी।
किसका भोजन?
खिचड़ी भारत की सबसे प्राचीन सामुदायिक रसोई हो सकती है।
बिरयानी भारतीय इतिहास की सबसे सफल सांस्कृतिक यात्राओं में से एक है।
रोटी, पराठा, तहरी, पुलाव, कबाब, खीर — सबने यात्राएँ की हैं।
रसोई कभी सीमा रेखाओं को नहीं मानती।
संगीत किसका?
कव्वाली हो या भजन।
ठुमरी हो या कीर्तन।
दादरा हो या आलाप।
संगीत का जन्म प्रायः मनुष्य की साझा पीड़ा और आनंद से होता है।
जब आवाज़ ऊपर उठती है, वह पहले मनुष्य होती है, बाद में पहचान।
काशी और अवध की सीख
काशी कहती है:
मृत्यु सबकी एक है।
अवध कहती है:
स्वाद सबका साझा है।
बिस्मिल्लाह ख़ाँ शहनाई बजाते हैं।
तुलसी रामचरित लिखते हैं।
कबीर दोनों को चुनौती देते हैं।
और गंगा चुपचाप बहती रहती है।
अंतिम प्रश्न
क्या:
- कव्वाली केवल मुसलमानों की है?
- भजन केवल हिंदुओं के हैं?
- उर्दू केवल एक समुदाय की है?
- हिंदी केवल दूसरे की?
या फिर यह सब उस साझा सभ्यता की धरोहर है जिसे हम कभी हिंदुस्तान कहते थे?
अज़ाँ भी मेरी, शंख भी मेरा,
गंगा भी मेरी, जमुना भी।
जो बाँटना चाहे साँसों को,
उससे कह दो — धरती सबकी।
प्रेरणा
संगीत लिंक:
"जब रोटी तवे पर सिकती है, वह धर्म नहीं पूछती।
जब राग उठता है, वह भाषा नहीं पूछता।"
— अक्षत अग्रवाल
No comments:
Post a Comment