Tuesday, June 23, 2026

भूत की छाँव और जागृत आत्मा

 

भूत की छाँव और जागृत आत्मा

महादेवी वर्मा की पंक्तियों से आधुनिक मनुष्य के लिए एक चेतावनी

(नीचे महादेवी वर्मा की पंक्तियाँ इस लेख की प्रेरणा हैं।)


"बाँध लेंगे क्या तुझे, यह मोम के बंधन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?
विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?
तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना।
जाग तुझको दूर जाना।"

महादेवी वर्मा


क्या इस भवसागर में डूब जाओगे?

आज का मनुष्य समुद्र में नहीं डूबता।

वह डूबता है:

  • भावनाओं में,
  • उन्मादों में,
  • नारों में,
  • जुमलेबाजी में,
  • झूठ और फरेब में,
  • पाखंड में,
  • अंधविश्वास में।

हर युग का अपना समुद्र होता है।

कभी वह लोभ का होता है।

कभी सत्ता का।

कभी धर्म के नाम पर।

कभी विचारधारा के नाम पर।

कभी किसी बाबा के पीछे।

कभी किसी नेता के पीछे।

और कभी अपने ही मन की कल्पनाओं के पीछे।


अपनी छाया को शेरखान मत समझो

मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह अपनी ही छाया को स्वयं समझ बैठता है।

कभी:

  • पद की छाया,
  • जाति की छाया,
  • धर्म की छाया,
  • संगठन की छाया,
  • परिवार की छाया,
  • अनुयायियों की छाया।

और वह सोचने लगता है:

"मैं बहुत बड़ा हूँ।"

किन्तु महादेवी वर्मा चेतावनी देती हैं:

"तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना।"

मैं कहता हूँ:

तू अपनी भूत की छाँव को देखकर अपने को शेरखान मत समझना।

जो बीत गया, वह भूत है।

जो पद चला गया, वह भूत है।

जो प्रतिष्ठा चली गई, वह भूत है।

जो अहंकार बचा है, वह केवल छाया है।


तुम पिछले जन्म का भूत नहीं हो

भारतीय समाज में लोग अक्सर कहते हैं:

  • पिछले जन्म का कर्म,
  • पिछले जन्म का ऋण,
  • पिछले जन्म का संबंध।

लेकिन मनुष्य का वास्तविक धर्म क्या है?

तुम कोई भटकती हुई आत्मा नहीं हो।

तुम कोई अतीत का भूत नहीं हो।

तुम कोई भयग्रस्त जीव नहीं हो।

तुम जागृत आत्मा हो।


चार पुरुषार्थों की भूल

भारतीय दर्शन ने जीवन के चार उद्देश्य बताए:

  1. धर्म
  2. अर्थ
  3. काम
  4. मोक्ष

लेकिन आधुनिक मनुष्य:

  • अर्थ को लोभ बना बैठा,
  • काम को मोह बना बैठा,
  • धर्म को पहचान बना बैठा,
  • और मोक्ष को कथा बना बैठा।

वास्तविक शिक्षा यह थी:

काम और अर्थ का धर्मपूर्वक उपभोग करो।

तभी:

मोक्ष की पात्रता उत्पन्न होती है।


जागृत आत्मा कौन है?

जागृत आत्मा:

  • प्रश्न पूछती है।
  • भय से मुक्त होती है।
  • विवेक का उपयोग करती है।
  • किसी भीड़ में स्वयं को नहीं खोती।
  • किसी नारे में स्वयं को नहीं बेचती।
  • किसी गुरु में अपना विवेक समर्पित नहीं करती।

भवसागर की नई लहरें

आज की लहरें हैं:

  • सोशल मीडिया,
  • राजनीतिक उन्माद,
  • धार्मिक उत्तेजना,
  • आध्यात्मिक व्यापार,
  • पहचान की राजनीति,
  • झूठे गौरव की कथाएँ।

मनुष्य इनमें बहता जाता है।

और फिर सोचता है:

"मैं जाग गया हूँ।"

जबकि कई बार वह केवल नई नींद में प्रवेश करता है।


महादेवी की पुकार

महादेवी वर्मा ने बहुत पहले कहा था:

"जाग तुझको दूर जाना।"

यह केवल कवि की पंक्ति नहीं।

यह आत्मा का आह्वान है।

जागो।

क्योंकि:

  • भीड़ तुम्हें जगाने नहीं आएगी।
  • नारे तुम्हें मुक्त नहीं करेंगे।
  • पाखंड तुम्हें सत्य नहीं देगा।

अंतिम संदेश

क्या इस भवसागर,

भावनाओं,

उन्मादों,

नारों,

जुमलेबाजी,

झूठ,

फरेब,

पाखंड,

और अंधविश्वास में डूब जाओगे?

या फिर स्मरण करोगे:

तू न अपनी भूत की छाँव को देखकर अपने को शेरखान समझना।

तुम पिछले जन्म का भूत नहीं हो।

तुम जागृत आत्मा हो।

जो:

काम और अर्थ का धर्मपूर्वक उपभोग करके मोक्ष की अधिकारी बनती है।

और शायद यही महादेवी की "जागृति" है।


"तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना।
जाग तुझको दूर जाना।"

— महादेवी वर्मा

— अक्षत अग्रवाल

No comments:

Post a Comment