Tuesday, June 23, 2026

स्त्री मोह की नई कथा : "दर्शन दो घनश्याम"

 

स्त्री मोह की नई कथा : "दर्शन दो घनश्याम"

बाबा जी के युग में विरह, भक्ति और भावनात्मक व्यापार की एक व्यंग्य कथा

अक्षत अग्रवाल


"याद पिया की आए, हाए राम!"

पुराने समय में यह पंक्ति सुनकर लोग समझ जाते थे कि कोई विरहिणी अपने प्रिय की प्रतीक्षा कर रही है।

उसका पिया कहीं दूर गया है।

उसका मन व्याकुल है।

उसकी आँखें पथरा गई हैं।

लेकिन कलियुग बड़ा चतुर निकला।

उसने विरह को भी बाजार बना दिया।


बिरहन और बाबा

वह स्त्री दुखी थी।

घर था।

पर मन नहीं था।

परिवार था।

पर संवाद नहीं था।

लोग थे।

पर सुनने वाला कोई नहीं था।

वह धीरे-धीरे गुनगुनाने लगी:

"याद पिया की आए, हाए राम।"

तभी किसी ने उसे नया भजन सिखा दिया:

"दर्शन दो घनश्याम,

नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी हैं।"

अब पिया अदृश्य हो गया।

घनश्याम प्रकट हो गए।


घनश्याम कौन है?

कभी कृष्ण।

कभी गुरु।

कभी बाबा।

कभी सत्संग।

कभी कोई दिव्य बहन।

कभी कोई आध्यात्मिक परिवार।

मनुष्य का मन रिक्त स्थान पसंद नहीं करता।

जहाँ संवाद नहीं मिलता, वहाँ कल्पना प्रवेश कर जाती है।

जहाँ प्रेम नहीं मिलता, वहाँ प्रतीक आ जाते हैं।


मैंने उस बिरहन से कहा

हे मातेश्वरी!

इतनी घनश्याम भक्ति भी ठीक नहीं।

ज़रा बाहर देखो।

घनघोर काले बादल छाए हैं।

"डर लागे गरजे बदरिया।"

यह केवल वर्षा नहीं।

यह भ्रम का मौसम है।

यह अज्ञान का मौसम है।

यह भावनाओं के व्यापार का मौसम है।


देखो, बिजली भी चमक रही है

दूर कहीं बिजली कौंधी।

मैंने कहा:

"देखो बिजली डोले बिन बादल के।"

ज्ञान की बिजली है।

प्रश्नों की बिजली है।

विवेक की बिजली है।

यह कभी-कभी गिरती भी है।

और जब गिरती है तो:

  • भ्रम टूट जाते हैं,
  • मोह टूट जाते हैं,
  • मिथक टूट जाते हैं।

बाबा जी का मौसम विभाग

आजकल हर बादल को घनश्याम घोषित कर दिया गया है।

हर आँसू को भक्ति।

हर अकेलेपन को अध्यात्म।

हर पीड़ा को कर्मफल।

हर प्रश्न को अहंकार।

और हर विरोध को अज्ञान।


विरह और विवेक

विरह बुरा नहीं।

भक्ति भी बुरी नहीं।

प्रेम भी बुरा नहीं।

लेकिन जब:

  • विवेक सो जाए,
  • प्रश्न समाप्त हो जाएँ,
  • और व्यक्ति स्वयं को भूल जाए,

तब विरह मोह बन जाता है।

और मोह व्यापार बन जाता है।


मैंने कहा — घर के भीतर चलो

मैंने उस बिरहन से कहा:

हे मातेश्वरी,

बहुत घनश्याम भक्ति हो गई।

बाहर बादल हैं।

बिजली चमक रही है।

कहीं यह बिजली तेरे सिर पर भी गिर सकती है।

चलो।

घर के भीतर चलो।


घर क्या है?

घर केवल ईंट नहीं।

घर है:

  • विवेक,
  • संवाद,
  • आत्मबोध,
  • संतुलन।

यदि घर भीतर नहीं है,

तो कोई भी बादल घनश्याम बन सकता है।


अंतिम बात

कृष्ण का प्रेम आत्मा को मुक्त करता है।

मोह आत्मा को बाँधता है।

भक्ति मनुष्य को गहरा बनाती है।

आसक्ति उसे निर्भर बना देती है।

आज आवश्यकता घनश्याम के दर्शन की नहीं,

बल्कि उस बिजली की है

जो अंधेरे में क्षणभर चमककर पूछती है:

"तू किसे खोज रही है?

घनश्याम को?

या स्वयं को?"


"डर लागे गरजे बदरिया।"

"देखो बिजली डोले बिन बादल के।"

और कभी-कभी वही बिजली ज्ञान बनकर गिरती है।

— अक्षत अग्रवाल

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