Wednesday, June 24, 2026

दिल का चमन उजड़ते देखा - राम, कला और सच्चे दिल की खोज

 

दिल का चमन उजड़ते देखा

राम, कला और सच्चे दिल की खोज

अक्षत अग्रवाल


**"दिल का चमन उजड़ते देखा,

प्यार का रंग उतरते देखा।

हमने हर जीने वाले को,

धन-दौलत पर मरते देखा।"**

 https://youtube.com/shorts/Usi3zUFt4xw?si=SjNNB1DkLDP0ozuF

उम्र के एक पड़ाव पर पहुँचकर मनुष्य देखता है कि दुनिया बहुत कुछ जानती है।

धंधा।

निवेश।

प्रतिष्ठा।

चतुराई।

संपर्क।

लेकिन शायद सबसे महत्वपूर्ण वस्तु खो चुकी है:

सच्चा दिल।


राम कौन हैं?

राम केवल मंदिर की मूर्ति नहीं।

राम केवल कथा नहीं।

राम केवल राजनीति नहीं।

राम हैं:

  • सत्य,
  • करुणा,
  • मर्यादा,
  • निर्मलता।

राम का वास्तविक निवास कहाँ है?

तुलसीदास उत्तर देते हैं:

"निर्मल मन जन सो मोहि पावा।"

अर्थात:

राम केवल सच्चे दिल में निवास करते हैं।


सच्चा दिल क्या है?

जो:

  • छल न करे।
  • कपट न करे।
  • दिखावा न करे।
  • गणना न करे।
  • प्रेम को व्यापार न बनाए।

इसीलिए राम स्वयं कहते हैं:

"मोहि कपट छल छिद्र न भावा।"

राम को:

  • चालाकी नहीं चाहिए।
  • धंधेबाज़ी नहीं चाहिए।
  • दिखावटी भक्ति नहीं चाहिए।

उन्हें चाहिए:

सच्चा दिल।


कला क्या है?

कला केवल मनोरंजन नहीं।

कला वह है:

जो एक सच्चे दिल से निकलकर दूसरे सच्चे दिल को छू ले।

यदि संगीत:

  • केवल कमाई है,
  • केवल प्रसिद्धि है,
  • केवल बाज़ार है,

तो वह उद्योग हो सकता है।

लेकिन कला नहीं।


कलाकार कौन है?

सच्चा कलाकार:

  • दिल का व्यापारी नहीं।
  • आत्मा का यात्री है।

वह:

  • गीत गाता है,
  • राग साधता है,
  • शब्द खोजता है,

ताकि किसी दूसरे मनुष्य का सच्चा दिल जाग जाए।


धंधा और साधना

आज हर चीज़ से पूछा जाता है:

"इससे कमाई कितनी होगी?"

लेकिन कोई नहीं पूछता:

"इससे आत्मा कितनी जागी?"

कुछ लोग धंधे को पैशन समझ लेते हैं।

कुछ लोग पैशन को धंधा बना देते हैं।

लेकिन:

साधना कभी व्यापार नहीं बन सकती।


धन पर मरने वाले

हमने हर जीने वाले को धन-दौलत पर मरते देखा।

लेकिन जिनकी इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं,

वे सदैव भिखारी बने रहते हैं।

भिखारी केवल सड़क पर बैठा व्यक्ति नहीं।

भिखारी वह भी है:

  • जिसे कभी पर्याप्त न लगे,
  • जिसे सदा अधिक चाहिए।

राम और कलाकार

राम सच्चे दिल में निवास करते हैं।

और कला सच्चे दिल को स्पर्श करती है।

इसलिए:

राम और कला दोनों का घर एक ही है।

जहाँ:

  • कपट नहीं,
  • दिखावा नहीं,
  • व्यापार नहीं।

वहीं:

  • भक्ति जन्म लेती है।
  • संगीत जन्म लेता है।
  • कविता जन्म लेती है।

सच्ची भक्ति

सच्ची भक्ति:

  • धन के लिए नहीं।
  • प्रसिद्धि के लिए नहीं।
  • चमत्कार के लिए नहीं।

सच्ची भक्ति वह है जिसमें:

दिल राम को खोजता है।

और सच्ची कला वह है जिसमें:

कलाकार मनुष्य के भीतर के राम को जगाता है।


अंतिम प्रार्थना

यदि धंधा करना हो —

ईमान से करो।

यदि कला करनी हो —

दिल से करो।

यदि भक्ति करनी हो —

निर्मल मन से करो।

क्योंकि:

राम सच्चे दिल में बसते हैं।

और:

कला सच्चे दिल को छू लेती है।


**दिल का चमन उजड़ते देखा,

प्यार का रंग उतरते देखा।

हमने हर जीने वाले को,

धन-दौलत पर मरते देखा।**

और अंत में यही समझ आया —

धन पेट भरता है।

धंधा जीवन चलाता है।

कला हृदय को छूती है।

और राम सच्चे दिल में निवास करते हैं।


"निर्मल मन जन सो मोहि पावा।"

"मोहि कपट छल छिद्र न भावा।"

अक्षत अग्रवाल

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