दिल का चमन उजड़ते देखा
राम, कला और सच्चे दिल की खोज
अक्षत अग्रवाल
**"दिल का चमन उजड़ते देखा,
प्यार का रंग उतरते देखा।
हमने हर जीने वाले को,
धन-दौलत पर मरते देखा।"**
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उम्र के एक पड़ाव पर पहुँचकर मनुष्य देखता है कि दुनिया बहुत कुछ जानती है।
धंधा।
निवेश।
प्रतिष्ठा।
चतुराई।
संपर्क।
लेकिन शायद सबसे महत्वपूर्ण वस्तु खो चुकी है:
सच्चा दिल।
राम कौन हैं?
राम केवल मंदिर की मूर्ति नहीं।
राम केवल कथा नहीं।
राम केवल राजनीति नहीं।
राम हैं:
- सत्य,
- करुणा,
- मर्यादा,
- निर्मलता।
राम का वास्तविक निवास कहाँ है?
तुलसीदास उत्तर देते हैं:
"निर्मल मन जन सो मोहि पावा।"
अर्थात:
राम केवल सच्चे दिल में निवास करते हैं।
सच्चा दिल क्या है?
जो:
- छल न करे।
- कपट न करे।
- दिखावा न करे।
- गणना न करे।
- प्रेम को व्यापार न बनाए।
इसीलिए राम स्वयं कहते हैं:
"मोहि कपट छल छिद्र न भावा।"
राम को:
- चालाकी नहीं चाहिए।
- धंधेबाज़ी नहीं चाहिए।
- दिखावटी भक्ति नहीं चाहिए।
उन्हें चाहिए:
सच्चा दिल।
कला क्या है?
कला केवल मनोरंजन नहीं।
कला वह है:
जो एक सच्चे दिल से निकलकर दूसरे सच्चे दिल को छू ले।
यदि संगीत:
- केवल कमाई है,
- केवल प्रसिद्धि है,
- केवल बाज़ार है,
तो वह उद्योग हो सकता है।
लेकिन कला नहीं।
कलाकार कौन है?
सच्चा कलाकार:
- दिल का व्यापारी नहीं।
- आत्मा का यात्री है।
वह:
- गीत गाता है,
- राग साधता है,
- शब्द खोजता है,
ताकि किसी दूसरे मनुष्य का सच्चा दिल जाग जाए।
धंधा और साधना
आज हर चीज़ से पूछा जाता है:
"इससे कमाई कितनी होगी?"
लेकिन कोई नहीं पूछता:
"इससे आत्मा कितनी जागी?"
कुछ लोग धंधे को पैशन समझ लेते हैं।
कुछ लोग पैशन को धंधा बना देते हैं।
लेकिन:
साधना कभी व्यापार नहीं बन सकती।
धन पर मरने वाले
हमने हर जीने वाले को धन-दौलत पर मरते देखा।
लेकिन जिनकी इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं होतीं,
वे सदैव भिखारी बने रहते हैं।
भिखारी केवल सड़क पर बैठा व्यक्ति नहीं।
भिखारी वह भी है:
- जिसे कभी पर्याप्त न लगे,
- जिसे सदा अधिक चाहिए।
राम और कलाकार
राम सच्चे दिल में निवास करते हैं।
और कला सच्चे दिल को स्पर्श करती है।
इसलिए:
राम और कला दोनों का घर एक ही है।
जहाँ:
- कपट नहीं,
- दिखावा नहीं,
- व्यापार नहीं।
वहीं:
- भक्ति जन्म लेती है।
- संगीत जन्म लेता है।
- कविता जन्म लेती है।
सच्ची भक्ति
सच्ची भक्ति:
- धन के लिए नहीं।
- प्रसिद्धि के लिए नहीं।
- चमत्कार के लिए नहीं।
सच्ची भक्ति वह है जिसमें:
दिल राम को खोजता है।
और सच्ची कला वह है जिसमें:
कलाकार मनुष्य के भीतर के राम को जगाता है।
अंतिम प्रार्थना
यदि धंधा करना हो —
ईमान से करो।
यदि कला करनी हो —
दिल से करो।
यदि भक्ति करनी हो —
निर्मल मन से करो।
क्योंकि:
राम सच्चे दिल में बसते हैं।
और:
कला सच्चे दिल को छू लेती है।
**दिल का चमन उजड़ते देखा,
प्यार का रंग उतरते देखा।
हमने हर जीने वाले को,
धन-दौलत पर मरते देखा।**
और अंत में यही समझ आया —
धन पेट भरता है।
धंधा जीवन चलाता है।
कला हृदय को छूती है।
और राम सच्चे दिल में निवास करते हैं।
"निर्मल मन जन सो मोहि पावा।"
"मोहि कपट छल छिद्र न भावा।"
— अक्षत अग्रवाल
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