Monday, June 22, 2026

राधे राधे बोलो भाई राधे राधे! थाली घंटा बजाओ — संतोष ढूँढो। गंगाजल लाऊँ क्या?

 

सुभाषितानि · व्यंग्य श्रृंखला · अक्षत अग्रवाल · Community Development ग्राम स्वराज
🔔 व्यंग्य कविता · Satirical Verse · June 2026

राधे राधे
बोलो भाई
राधे राधे!

थाली घंटा बजाओ — संतोष ढूँढो।
गंगाजल लाऊँ क्या?

दृश्य: एक सामान्य भारतीय दिन। टीवी पर जुमले। सड़क पर पनौती। अस्पताल में लाशें। चौराहे पर बेरोज़गार युवा। न्यूज़ चैनल पर शोर। और रात को — थाली-घंटा बजाओ, राधे राधे बोलो, और सो जाओ।
यह कविता उस दिन के लिए है।
पहला पड़ाव · जुमला-दर्शनसुबह उठो, चाय पियो,टीवी खोलो भाई —जुमला नंबर एक सुनो,जुमला नंबर दो सुनाई।अच्छे दिन आने वाले हैं,बस दो हफ़्ते और रुकाई।— यही सुनते-सुनतेदस साल बीत गए भाई।राधे राधे — बोलो राधे राधे!
दूसरा पड़ाव · पनौती-गिरीदोपहर हुई, खबर आई —पनौती फिर गई पधराई।क्रिकेट में हारे, बाढ़ में डूबे,मंदी ने मार लगाई।पर नहीं — यह सब विपक्ष की साज़िश,विदेशी हाथ की परछाई।हर हार का ठीकरा दूसरे पर —यही है इस युग की चतुराई।राधे राधे — बोलो राधे राधे!
तीसरा पड़ाव · मरते लोगशाम को खबर आई —अस्पताल में ऑक्सीजन नहीं,गरीब ने जान गँवाई।सड़क पर किसान लेटा है,ट्रेन तले आई।पर न्यूज़ चैनल व्यस्त है —मंदिर की नई कढ़ाई।जो मरे — वो तो मरे,विकास की रफ़्तार जाम न पाई!राधे राधे — बोलो राधे राधे!
चौथा पड़ाव · बेरोज़गार युवायुवा बैठे चौराहे पर,डिग्री हाथ में लाई।UPSC में पाँचवीं बार गए,पाँचवीं बार रुलाई।नेताजी ने समझाया —"पकौड़े तलो भाई!"MBA वाले पकौड़े तलें,यही है नई कमाई।राधे राधे — बोलो राधे राधे!
पाँचवाँ पड़ाव · महिलाओं का शोषणबेटी बचाओ का नारा लगा,पोस्टर पर तस्वीर छपाई।पर बेटी उसी पोस्टर के पीछे,खड़ी है सर झुकाई।संसद में सीटें घटाईं,मंच पर महिमा गाई।शोषण अंदर, नारा बाहर —यही है असली सफ़ाई।राधे राधे — बोलो राधे राधे!
छठा पड़ाव · थाली-घंटा समाधानरात हुई, नेताजी बोले —"थाली बजाओ, घंटा बजाओ,दीपक जलाओ भाई!"कोरोना भागेगा थाली से,यही है दवाई।और जो नहीं बजाया तो —देशद्रोही कहलाई!लाशें गिनते रहो भाई,थाली बजाते रहो भाई —थाली बजाने से वायरस जाई!राधे राधे — बोलो राधे राधे!
सातवाँ पड़ाव · संतोष और शांतिअब ढूँढो संतोष, ढूँढो शांति —मरते देखकर, लुटते देखकर,भूखे सोते देखकर।कहते हैं — "यह सब माया है,प्रभु की यही रज़ाई।"जो पूछे — वो "नकारात्मक" है,जो चुप रहे — वो "भाई।"संतोष उसका जो चुप रहे,शांति उसकी जो आँख मूँदे —बाकी सब "अर्बन नक्सल" भाई!राधे राधे — बोलो राधे राधे!
🏺 प्रतिप्रश्न · The Punchline
बावरे! तू इतने नशे में क्या बड़बड़ा रहा है?
गंगाजल लाऊँ क्या?!
— हाँ। लाओ। पर पहले पूछो —
गंगा में पानी बचा है क्या?

व्यंग्यकार का नोट: यह कविता किसी एक नेता, एक दल, या एक घटना के बारे में नहीं है। यह उस सामूहिक मानसिक अवस्था के बारे में है जहाँ हम सब कुछ देखते हैं, सब कुछ जानते हैं — और फिर भी थाली बजाकर सो जाते हैं। व्यंग्य का काम दर्पण दिखाना है, घाव करना नहीं। अगर यह कविता चुभे — तो शायद दर्पण सही जगह लगा है।
जुमला सुनो, पनौती देखो,मरते देखो, लुटते देखो —थाली बजाओ, राधे बोलो,और ढूँढते रहो शांति।
या फिर — उठो। बोलो। लिखो। अक्षत अग्रवाल · akshat08.blogspot.com · Substack @akshat08

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