सुभाषितानि · व्यंग्य श्रृंखला · अक्षत अग्रवाल · Community Development ग्राम स्वराज
दृश्य: एक सामान्य भारतीय दिन। टीवी पर जुमले। सड़क पर पनौती। अस्पताल में लाशें। चौराहे पर बेरोज़गार युवा। न्यूज़ चैनल पर शोर। और रात को — थाली-घंटा बजाओ, राधे राधे बोलो, और सो जाओ।
यह कविता उस दिन के लिए है।
यह कविता उस दिन के लिए है।
व्यंग्यकार का नोट: यह कविता किसी एक नेता, एक दल, या एक घटना के बारे में नहीं है। यह उस सामूहिक मानसिक अवस्था के बारे में है जहाँ हम सब कुछ देखते हैं, सब कुछ जानते हैं — और फिर भी थाली बजाकर सो जाते हैं। व्यंग्य का काम दर्पण दिखाना है, घाव करना नहीं। अगर यह कविता चुभे — तो शायद दर्पण सही जगह लगा है।
जुमला सुनो, पनौती देखो,मरते देखो, लुटते देखो —थाली बजाओ, राधे बोलो,और ढूँढते रहो शांति।
या फिर — उठो। बोलो। लिखो।— अक्षत अग्रवाल · akshat08.blogspot.com · Substack @akshat08
या फिर — उठो। बोलो। लिखो।— अक्षत अग्रवाल · akshat08.blogspot.com · Substack @akshat08
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