Sunday, June 21, 2026

चाहे दादा बनके या बाबा बनके ही तू जी सकता है उत्तर भारत में, वरना कॉकरोच कहलायेगा!

 

चाहे दादा बनके या बाबा बनके ही तू जी सकता है उत्तर भारत में, वरना कॉकरोच कहलायेगा!

उत्तर भारत में पुरुष की सामाजिक वैधता, सत्ता और सम्मान का संकट

अक्षत अग्रवाल


"उत्तर भारत में यदि तुम दादा नहीं हो, बाबा नहीं हो, नेता नहीं हो, गुरु नहीं हो, मालिक नहीं हो, तो अक्सर तुम्हें कोई नहीं पूछता।"

यह वाक्य पहली बार सुनने में अतिशयोक्ति लग सकता है।

लेकिन यदि हम उत्तर भारत के सामाजिक ढाँचे को ध्यान से देखें तो एक विचित्र सत्य सामने आता है:

सामान्य व्यक्ति की सामाजिक हैसियत अत्यंत कम है।

और इसलिए वह जीवन भर किसी न किसी रूप में "दादा" या "बाबा" बनने की कोशिश करता है।


दादा कौन है?

उत्तर भारत में "दादा" केवल बड़ा भाई नहीं है।

वह है:

  • स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति,
  • निर्णयकर्ता,
  • संरक्षक,
  • नेता,
  • सत्ता का केंद्र।

कई क्षेत्रों में "दादा" सामाजिक ताकत का प्रतीक बन जाता है।


बाबा कौन है?

"बाबा" का अर्थ केवल संत नहीं है।

वह हो सकता है:

  • धार्मिक गुरु,
  • आध्यात्मिक मार्गदर्शक,
  • आश्रम प्रमुख,
  • लोकदेवता,
  • करिश्माई व्यक्तित्व।

भारतीय समाज में "बाबा" सामाजिक और आध्यात्मिक वैधता का स्रोत बन जाता है।


कॉकरोच कौन है?

कॉकरोच वह व्यक्ति है:

  • जो सत्ता में नहीं है,
  • जिसका कोई समूह नहीं,
  • जिसका कोई अनुयायी नहीं,
  • जो न नेता है,
  • न गुरु,
  • न धनपति,
  • न दबंग।

ऐसा व्यक्ति अक्सर:

  • अदृश्य,
  • महत्वहीन,
  • उपेक्षित

महसूस करता है।


उत्तर भारत का शक्ति-सिद्धांत

यहाँ सम्मान अक्सर मिलता है:

  • पद से,
  • धन से,
  • जाति से,
  • समूह से,
  • राजनीतिक शक्ति से,
  • धार्मिक प्रतिष्ठा से।

एक साधारण, ईमानदार, शांत व्यक्ति कई बार सामाजिक संरचना में अदृश्य हो जाता है।

इसलिए अनेक लोग जीवन भर:

  • दादा बनना चाहते हैं,
  • गुरु बनना चाहते हैं,
  • नेता बनना चाहते हैं।

"दादा" और "बाबा" की समानता

दोनों के पास तीन चीजें होती हैं:

1. अनुयायी

किसी को मानने वाले लोग।

2. सामाजिक वैधता

समाज कहता है:

"इनकी बात सुनो।"

3. पहचान

वे अदृश्य नहीं होते।


आधुनिक मध्यमवर्ग की त्रासदी

सबसे कठिन स्थिति उस व्यक्ति की है जो:

  • ईमानदार है,
  • पेशेवर है,
  • प्रवासी है,
  • नौकरी करता है,
  • किसी गुट में नहीं है।

वह:

  • न दादा है,
  • न बाबा है,
  • न नेता है।

ऐसा व्यक्ति कई बार अपने ही समाज में बाहरी बन जाता है।


परिवार के भीतर भी यही संघर्ष

पुरुष से अपेक्षा की जाती है:

  • कमाओ,
  • जिम्मेदारी निभाओ,
  • त्याग करो।

लेकिन सम्मान?

वह कई बार उस व्यक्ति को मिलता है:

  • जिसके पास प्रभाव है,
  • अनुयायी हैं,
  • सामाजिक शक्ति है।

यहीं से आंतरिक संकट शुरू होता है।


आध्यात्मिकता और सत्ता

भारतीय समाज में आध्यात्मिक प्रतिष्ठा भी सामाजिक पूँजी बन जाती है।

किसी व्यक्ति को यदि:

  • शिष्य मिल जाएँ,
  • अनुयायी मिल जाएँ,
  • सत्संग मिल जाए,

तो वह अचानक महत्व प्राप्त कर सकता है।

यही कारण है कि "बाबा संस्कृति" बार-बार जन्म लेती है।


क्या समाधान है?

क्या हर व्यक्ति को बाबा बनना होगा?

क्या हर व्यक्ति को दादा बनना होगा?

शायद नहीं।

लेकिन आधुनिक भारत को एक नई सामाजिक संरचना की आवश्यकता है।

जहाँ सम्मान मिले:

  • शिक्षक को,
  • वैज्ञानिक को,
  • इंजीनियर को,
  • कलाकार को,
  • देखभाल करने वाले व्यक्ति को,
  • शांत नागरिक को।

आधुनिक गुरुकुल का विचार

शायद समाधान व्यक्तिगत प्रभुत्व में नहीं, बल्कि सामुदायिक उद्देश्य में है।

यदि बीस लोग साथ रहें:

  • संगीत के लिए,
  • शिक्षा के लिए,
  • खेती के लिए,
  • पर्यावरण के लिए,
  • सेवा के लिए,

तो उन्हें किसी "दादा" की आवश्यकता नहीं होगी।

और किसी "बाबा" की भी नहीं।


अंतिम निष्कर्ष

उत्तर भारत की त्रासदी यह नहीं है कि यहाँ बहुत दादा और बाबा हैं।

त्रासदी यह है कि:

साधारण मनुष्य का सम्मान कम है।

इसलिए लोग:

  • शक्ति खोजते हैं,
  • अनुयायी खोजते हैं,
  • प्रभाव खोजते हैं।

क्योंकि उन्हें डर होता है:

यदि मैं कुछ नहीं बना, तो मैं अदृश्य हो जाऊँगा।

और शायद यही वह भय है जो उत्तर भारतीय समाज में दादा, बाबा, नेता और संरक्षकों की निरंतर आवश्यकता पैदा करता है।


"एक स्वस्थ समाज वह नहीं जहाँ हर व्यक्ति बाबा बनना चाहता हो।

एक स्वस्थ समाज वह है जहाँ साधारण मनुष्य भी सम्मान के साथ जी सके।"

— अक्षत अग्रवाल

पूरक लेख: Community Living, Modern Gurukul and the Future of Shared Purpose in India.

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