स्वर के बिना नश्वर जीवन, संगीत के स्वर से अनश्वरता की ओर — ईश्वर की यात्रा
सरस्वती संगीत गुरुकुल (SSG)
सरस्वती वंदना - पंडित विनोद द्विवेदी
तू भूल जा कि दूसरों की निगाहों में तू कौन है।
ऐसे जी कि तुझे अपने अस्तित्व को सिद्ध करने की आवश्यकता ही न रहे।
तेरा आना और तेरा जाना भी ऐसा हो—
जैसे हवा का एक झोंका आया,
डाली से एक फूल टूटा,
और प्रकृति की अनंत यात्रा में विलीन हो गया।
समुद्र की एक बूँद वाष्प बनी,
बादल के रूप में आकाश में विचरण किया,
पर्वतों पर हिम बनकर ठहरी,
फिर पिघली, नदी बनी
और अंततः अपने उद्गम की ओर लौट चली।
क्या वह बूँद सचमुच कभी खोई थी?
या केवल उसका रूप बदलता रहा?
यही जीवन का सत्य है।
रूप नश्वर है, प्रवाह शाश्वत।
व्यक्तित्व क्षणभंगुर है, लेकिन अस्तित्व की यात्रा अनंत संभावनाओं से भरी है।
और इसी यात्रा में संगीत एक सेतु बनता है।
स्वर केवल ध्वनि नहीं है।
वह मौन से जन्म लेने वाली अनुभूति है।
वह श्वास और चेतना के बीच का संवाद है।
वह भीतर के उस संसार का द्वार है, जहाँ पहुँचकर मनुष्य दूसरों की दृष्टि में महान बनने की आकांक्षा से मुक्त हो सकता है।
जब तक हम गाते हैं अपनी पहचान बनाने के लिए, स्वर हमारे अहंकार का आभूषण बना रहता है। लेकिन जब स्वर की साधना में मैं धीरे-धीरे विलीन होने लगता है, तब संगीत प्रदर्शन नहीं, उपासना बन जाता है।
स्वर की साधना का परम उद्देश्य प्रसिद्धि नहीं, आत्मानंद है।
राग की प्रत्येक यात्रा हमें ठहरना सिखाती है।
प्रत्येक आलाप हमें सुनना सिखाता है।
प्रत्येक विराम हमें मौन का अर्थ समझाता है।
और प्रत्येक शुद्ध स्वर हमें अपने भीतर की असंगति पहचानने का अवसर देता है।
साधक धीरे-धीरे समझने लगता है कि संगीत पर अधिकार पाना ही साधना नहीं; स्वयं को संगीत के प्रति समर्पित कर देना भी साधना है।
जहाँ अहंकार का शोर शांत होता है, वहाँ स्वर की सूक्ष्मता सुनाई देने लगती है। जहाँ पाने की आकांक्षा क्षीण होती है, वहाँ अनुभव का आनंद गहरा होने लगता है।
यही नश्वरता से अनश्वरता की ओर यात्रा है—देह की अमरता नहीं, बल्कि उस चेतना का अनुभव, जो क्षणिक उपलब्धियों और सामाजिक पहचान से परे है।
स्वर से मौन तक, मौन से आत्मबोध तक और आत्मबोध से ईश्वरानुभूति तक—संगीत की यात्रा भीतर की यात्रा है।
सरस्वती संगीत गुरुकुल में हमारा विश्वास है कि संगीत केवल कला का प्रशिक्षण नहीं, स्वयं को जानने की साधना भी है। यहाँ रियाज़ का अर्थ केवल सुरों को शुद्ध करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के भाव, विचार और चेतना को भी परिष्कृत करना है।
आइए, स्वर को केवल गाएँ नहीं—उसे जिएँ।
ऐसे जिएँ कि संसार हमें याद रखे या भूल जाए, इससे हमारे आनंद पर कोई अंतर न पड़े।
क्योंकि जब साधक स्वर में स्वयं को खोकर अपने भीतर के आनंद को पा लेता है, तब संगीत केवल उसका नहीं रहता—वह स्वयं संगीत का हो जाता है।
स्वर ही साधना है।
संगीत ही यात्रा है।
आत्मानंद ही उसका प्रसाद है।
सरस्वती संगीत गुरुकुल (SSG)
स्वर से स्वबोध की ओर। संगीत से आत्मानंद की ओर।
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