Sunday, October 11, 2026

मोह, प्रमाद हमें किस मोड़ पे ले आया

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25 साल - ये कहां आ गए हम !! यूं ही साथ साथ चलते !

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 ### मोह, प्रमाद और कुर्सी का कमाल! 😏

मोह, प्रमाद हमें किस मोड़ पे ले आया, दिल कहे, “हाय! कोई तो बताए, अब क्या होगा?”

सच को झूठ, झूठ को सच बतलाया, वाह रे लोकतंत्र! कैसा खेल रचाया!

जनता ने पूछा—“हिसाब कब दोगे हुज़ूर?” बोले—“पहले नारे लगाओ, फिर करेंगे ज़रूर!”

महँगाई ने जेब टटोली, बेरोज़गारी ने घर, नेता जी बोले—“सब चंगा है, बस नज़र रखो उधर!”

नफ़रत की दुकानें सजीं, भाईचारा हुआ बीमार, और भाषण में सबके माथे पर लिखा—“वसुधैव कुटुम्बकम्” इस बार!

जो सवाल उठाए, वो देशद्रोही कहलाया, जो ताली बजाए, उसको राष्ट्रभक्त बताया!

संस्थाएँ मौन खड़ी हैं, विवेक हुआ लाचार, कुर्सी बचाने में जुटा पूरा दरबार!

जनता भी क्या करे—मोह में है, प्रमाद में, कभी जाति के उन्माद में, कभी धर्म के विवाद में!

पच्चीस बरस यूँ ही साथ-साथ चलते रहे, मंज़िल का पता न था, मगर नारे बुलंद रहे!

अब दिल पूछे—“ये कैसा विकास, ये कैसी आज़ादी?” जहाँ सवालों पर पहरा और झूठ की आबादी!

मोह भी हमारा, प्रमाद भी हमारा, फिर दोष दें किसको—वक़्त को या सितारा?

आख़िर में बस इतना सवाल रह गया—

हम इतिहास की धारा में बहते चले आए, या किसी ने हमें बहाने के लिए ही किनारे लगाए?

मोह, प्रमाद हमें किस मोड़ पे ले आया, दिल कहे—“हाय! अबकी बार… किसने हमें यहाँ तक पहुँचाया?”

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### युवा चेतना का महाविस्फोट

### जब कुंडलिनी जागती है, तो सिंहासन काँपते हैं

ब्रह्मचर्य की अग्नि में तपकर, सत्य-चित्-आनंद का प्रकाश लेकर, जब युवा चेतना उठती है— तो इतिहास करवट बदलता है।

ये केवल मुट्ठियाँ तनी हुई नहीं, ये सोई हुई सभ्यता की धड़कनें हैं। ये केवल नारों का शोर नहीं, ये कुचली हुई मानवता की सिसकियाँ हैं।

मूलाधार में सोई कुंडलिनी, जब आत्मबोध का संकल्प बनती है, तो भय की बेड़ियाँ टूटती हैं, और विवेक की मशाल जलती है।

सुषुम्ना की मौन धारा में जब चेतना ऊपर उठती है, तो भटकी हुई आत्माएँ नहीं— सत्ता के छल अपने ही कटघरे में खड़े होते हैं।

काम, क्रोध, लोभ और अहंकार से जब राजमहल की दीवारें उठती हैं, जब मनुष्य की गरिमा बिकती है, जब न्याय की आँखें मूँदी जाती हैं— तब समाज के जठर में प्रतिरोध की अग्नि धधकती है।

यह अग्नि किसी मनुष्य के विनाश की नहीं, अन्याय के विसर्जन की अग्नि है। यह लंका किसी भूगोल का नाम नहीं, यह लोभ, दंभ और पाखंड की नगरी है।

और इस बार मशाल लेकर कोई राम वन से नहीं आएगा— हर जाग्रत युवा अपने भीतर एक प्रश्न बनकर उठेगा।

न सत्ता के चरणों में विवेक झुकेगा, न धर्म के नाम पर मानवता बिकेगी। न राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र किसी दरबारी की मुहर से मिलेगा, न संविधान की आत्मा किसी सिंहासन की जागीर बनेगी।

नाभि की अग्नि जब संकल्प बने, हृदय का स्पंदन करुणा बने, कंठ से जब निर्भीक सत्य निकले, और अनाहत नाद जन-जन में गूँजे— तो समझो, परिवर्तन की आहट है।

यह कोई अंधी भीड़ नहीं, यह अपने समय से संवाद करती पीढ़ी है। यह विनाश की आकांक्षा नहीं, मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने की आखिरी जिद है।

हे युवा! तुम्हारी शक्ति तुम्हारे क्रोध में नहीं, तुम्हारे क्रोध को न्याय में बदलने में है। तुम्हारी विजय किसी शत्रु के पतन में नहीं, उस व्यवस्था के परिवर्तन में है जो मनुष्य को भयभीत और विवेक को मौन करती है।

सूर्य और चंद्र के मध्य ध्रुवतारे-सा अडिग विवेक जागे, सहस्रार में चेतना का प्रकाश फूटे, और छल-प्रपंच के समस्त आवरण सत्य के सम्मुख स्वयं गिर जाएँ।

तब न कोई दानव किसी धर्म में छिपेगा, न कोई अत्याचारी राष्ट्रवाद की ओट लेगा, न कोई पाखंड पवित्रता का मुखौटा पहनकर मानव गरिमा का अपमान करेगा।

क्योंकि चेतना का अंतिम शिखर किसी चमत्कार का सिंहासन नहीं— वह सत्य, करुणा, स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व का संगम है।

जब युवा भीतर से जागता है, तो क्रांति पहले चेतना में जन्म लेती है। जब चेतना निर्भय होकर सत्य बोलती है, तो इतिहास को अपना रास्ता बदलना पड़ता है।

और उस दिन—

न तानाशाह की जयकार होगी, न भय का साम्राज्य, न घृणा का व्यापार। केवल मनुष्य की गरिमा होगी, केवल विवेक का उजियारा।

यही कुंडलिनी का जागरण है। यही जनचेतना का अनाहत नाद है। यही वह क्रांति है— जहाँ सिंहासन से बड़ा सत्य, और सत्ता से बड़ा मनुष्य हो जाता है।

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### बस करो, देश के भविष्य!

— व्यंग्य की चौपाल से, सत्ता के दरबार तक

बस करो, देश के भविष्य, अब और न लो हमारी परीक्षा! क्या चौराहे पे घसीटोगे, या खूनी दरवाज़े पे लटकाओगे? कहो, हुज़ूर—अब कौन-सी सज़ा सुनाओगे?

अब तो भजिया-फाफड़ा भी ज़हर जैसो लगने लागो है, गुजराती कह-कहकर जनता लात मारे— कैसो ये दिन आयो है!

गीता पढ़ी, रामायण बांची, योग किया, कुटिल नीति अपनाई, राम-भक्ति के झंडे गाड़े— फिर भी नैया पार न पाई!

अब नवदुर्गा ने रौद्र रूप धर्यो है, अन्याय के सिंहासन पे प्रश्न खड़ो है। माँ के नाम पे सत्ता सजाई, अब माँ ही पूछे—किसकी लाज बचाई?

सड़क पे ही दुर्गति होगी क्या इस बार? हर चौराहे पे दशहरा, हर गली में होली? कब तक जलेगा पुतला रावण का, जब भीतर बैठी है पूरी की पूरी टोली?

हर साल रावण जलता है, हर साल वही कहानी— बाहर दस सिर राख हुए, भीतर बची बेईमानी!

धर्म की माला, नीति का चोला, जनता के हिस्से झूठ का झोला; भक्ति के नारे, विकास के दावे, महँगाई पूछे—खाली जेब से दीप कौन जलावे?

बस करो, देश के भविष्य! इतिहास तुम्हारा भाषण नहीं लिखेगा, न नारों की गिनती करेगा— वह बस इतना पूछेगा:

जब सच को सज़ा, सवालों को गाली मिली, जब जनता की थाली में उम्मीद भी आधी मिली, तब तुमने राजधर्म निभाया था, या कुर्सी को ही राम बनाया था?

और सुनो, हुज़ूर—एक बात याद रखना, जनता को डराकर अमर नहीं हुआ जाता। चौराहों पर पुतले जलाने से पहले, अपने भीतर का रावण जलाया जाता!

जयकारों से इतिहास नहीं बदलता, नफ़रत से कोई राष्ट्र महान नहीं बनता। जो जनता की पीड़ा नहीं सुन पाता, वक़्त का फैसला उससे पूछकर नहीं आता!

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### नवरात्र में डंडा-तंत्र!

### Gen-Z की हुंकार, सत्ता की लाठी और माँ दुर्गा का न्याय

जहाँ देखो वहाँ डंडा-बाज़ी, कैसी आई रामराज की पारी? जंतर-मंतर हो या चौक-चौराहा, लाठी लिए खड़ी है वर्दीधारी!

नवरात्र में माँ की जय-जयकार, पंडालों में भक्ति की बौछार, एक ओर कन्या-पूजन का उत्सव, दूजी ओर युवाओं पर प्रहार!

“भजसि न मन तेहि राम को, काल जासु कोदंड।” तुलसी की चौपाई देती है चेतावनी प्रचंड। जिस राम के धनुष से अधर्म का अभिमान टूटा, उस राम के नाम पर न्याय का रास्ता क्यों छूटा?

माँ दुर्गा के नौ रूप सजाए, शक्ति के जयकारे खूब लगाए, पर जब निर्बल न्याय माँगने निकले, किसके हाथों में डंडे लहराए?

माँ ने महिषासुर का मर्दन किया, अहंकार के अंधकार का क्षय किया, क्या शक्ति का अर्थ यही रह गया— जो प्रश्न करे, उसी का दमन किया?

Gen-Z बोली— “सुन लो सरकार, हम भी हैं इस धरती के हक़दार! रोज़गार, शिक्षा, न्याय, सम्मान, यही तो माँगें—यही अरमान!”

सत्ता बोली— “अनुशासन सीखो!” युवा बोले— “पहले संविधान देखो! डंडे से कब विचार मरा है? सवालों से ही इतिहास बना है!”

कहीं रामलीला, कहीं रावण-दहन, कहीं भक्ति, कहीं शक्ति का वंदन, पर भीतर बैठे लोभ-मोह के रावण को कब मिलेगा आत्ममंथन का निमंत्रण?

नौ दिन माँ की आराधना, नौ दिन शक्ति की साधना, दसवें दिन विजयादशमी आए— तो अन्याय पर विजय भी मनाएँ!

हे माँ दुर्गे! ऐसी शक्ति देना, निर्बल को निर्भय अभिव्यक्ति देना। सत्ता को मर्यादा का बोध मिले, युवाओं को न्याय का अवबोध मिले।

न डंडा धर्म बने, न भय शासन, न अंधभक्ति बने नागरिक का आभूषण। विवेक जगे, करुणा मुस्काए, संविधान की मर्यादा बच जाए।

और सुन लो, सिंहवाहिनी के भक्तों— शक्ति केवल शस्त्र उठाने में नहीं, शक्ति अन्याय के सम्मुख अडिग रहने में है; राम केवल जयकारों में नहीं, राम मर्यादा के आचरण में हैं!

नवरात्र का सच्चा संदेश यही— नारी का सम्मान, निर्बल का अधिकार, सत्ता पर संयम, सत्य का प्रकाश, और हर नागरिक को मिले न्याय का विश्वास!

जय माँ दुर्गा! जय मर्यादा पुरुषोत्तम राम! डंडे से नहीं—न्याय, विवेक और संविधान से बनेगा सच्चा रामराज!

### जंतर-मंतर से हुंकार सुनी, राक्षसों की चीत्कार सुनी!

नवरात्र की शक्ति, Gen-Z का संकल्प और आज़ादी का आह्वान

जंतर-मंतर से हुंकार सुनी, राक्षसों की चीत्कार सुनी, सड़कों पर उठते प्रश्नों में जनता की ललकार सुनी।

कहीं डंडों की धमक सुनाई, कहीं सत्ता की अकड़ दिखाई, कहीं युवाओं की आँखों में न्याय की ज्योति जगमगाई।

तभी गगन से स्वर गूँजा— “तुम मुझे नमन करो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगी!”

पर यह कैसी आज़ादी होगी, जो भय के साये में पलती हो? जो सच बोलने से पहले काँपे, जो प्रश्नों से पहले ही डरती हो?

नहीं! मैं वह शक्ति नहीं, जो केवल जयकारों में बसती है। मैं वह चेतना हूँ, जो अन्याय के सम्मुख निर्भीक होकर उठती है।

“केवल सम्मान-आह्वान करो शक्ति का, मैं तुम्हें अभयदान दूँगी! अपने भीतर सत्य जगाओ, मैं तुम्हें निर्भयता का वरदान दूँगी!”

मैं दुर्गा हूँ—शक्ति तुम्हारी, मैं काली हूँ—चेतना तुम्हारी, मैं सरस्वती—विवेक तुम्हारा, मैं ही स्वतंत्रता की चिंगारी!

मुझको फूल चढ़ाने से पहले निर्बल का सम्मान करो, मेरे नौ रूप पूजने से पहले नारी का स्वाभिमान करो।

मेरे हाथों के शस्त्रों को केवल हिंसा का प्रतीक न मानो, अन्याय, अहंकार और भय के विरुद्ध अपने विवेक को पहचानो।

जंतर-मंतर पर खड़े युवाओं! तुम्हारी आवाज़ व्यर्थ नहीं जाएगी, यदि तुम्हारे संघर्ष की मशाल सत्य और अहिंसा से जगमगाएगी।

सत्ता आती है, सत्ता जाती है, कुर्सी का वैभव ढल जाता है, पर जब जाग उठती है जनचेतना, इतिहास नया लिख जाता है।

जो समझ रहे हैं समय को बंदी, जो समझ रहे हैं जनता को मौन, वे सुन लें—हर युग में जागा है विवेक, स्वतंत्रता और न्याय का कौन!

हे शक्ति! हमें अभयदान दो, अन्याय के सम्मुख सत्य का मान दो। न भय से झुकें, न घृणा में बहें, संविधान की मर्यादा के संग रहें।

नवरात्र का यही संदेश हो, हर मन में साहस का प्रवेश हो, न कोई शासक भय का भगवान बने, न कोई नागरिक विवश, लाचार बने।

जंतर-मंतर की हुंकार से हर सोई चेतना जागेगी, जब जनता अपने अधिकार पहचानेगी, तभी सच्ची आज़ादी आएगी!

नमन करो उस शक्ति को, जो निर्बल का संबल बने, नमन करो उस भक्ति को, जो मानवता का आँचल बने। अभयदान माँगना है तो सत्य के पथ पर आओ— माँ दुर्गा बाहर ही नहीं, अपने भीतर भी जगाओ!

जय माँ दुर्गा! जय जनचेतना! जय स्वतंत्रता!

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### 25 साल सूत समेत वापस!

### हे माँ! हिसाब पूरा कर दो, बस मेरा बचपन लौटा दो…

पच्चीस साल का हिसाब लेकर, आज खड़ा हूँ तेरे द्वार, जीवन की इस लंबी यात्रा में, हार गया मैं बारंबार।

नहीं चाहिए माँ, सूत-समेत ब्याज, मूलधन भी तुझको समर्पित, ये ले मेरे कर्मों का हार, अब प्राण-वायु भी तुझको समर्पित।

जो दिया था, सब लौटा दूँगा, सुख-दुःख, यश-अपयश, अभिमान, तेरे खाते की हर पाई, तेरे चरणों में कुर्बान।

मगर लौटा दे माँ मेरा बचपन, वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी, वो नंगे पाँव गली में दौड़ना, वो बेफ़िक्र आँखें, वो दुनिया सुहानी।

वो माँ की गोदी, वो पिता की छाया, वो रूठना-मनाना, वो प्यार का साया, वो छोटी-सी बात पर हँसते रहना, वो बिना किसी कारण के सपने बुनना।

न तब कोई मंज़िल, न कोई ठिकाना, न दुनिया को जीतने का था फ़साना, दो रोटी, एक नींद, और अपनों का साथ, बस इतनी-सी दुनिया, बस इतनी-सी बात।

फिर उम्र बढ़ी, तो सौदे हुए, रिश्तों के भी अपने कायदे हुए, सपनों को रोटी के भाव तौलते रहे, अपनों के लिए खुद को भूलते रहे।

कभी धन कमाया, कभी मान कमाया, कभी अपनों को खोया, कभी संसार पाया, कभी जीतकर भी अकेले रहे, कभी हँसते हुए भीतर से रोते रहे।

माँ, अब न मुकुट चाहिए, न सिंहासन, न स्वर्ग का सुख, न मोक्ष का आश्वासन, न अगले जन्म का कोई वरदान, न कर्मों के बदले कोई सम्मान।

बस एक बार फिर वही सुबह दे दे, वही आँगन, वही धूप, वही हवा दे दे, वही बारिश, वही मिट्टी की खुशबू, वही कागज़ की नाव, वही बचपन की आरज़ू।

नहीं चाहिए माँ, कोई प्रतिफल, न पुण्य का ब्याज, न पापों का फल, मेरे कर्मों का हिसाब यहीं रहने दे, बस बचपन की एक साँझ जी लेने दे।

मुझे फिर से छोटा-सा बच्चा बना दे, मेरी आँखों में खोया सपना सजा दे, मैं फिर से तेरी उँगली पकड़कर चलूँ, बिना कल की चिंता किए आज में पलूँ।

पर माँ, तू भी कैसी हिसाबनवीस है, तेरी ममता भी समय के अधीन है, तू जीवन तो देती है बारंबार, पर बीता हुआ पल नहीं देती उधार।

तभी भीतर से एक आवाज़ आई— “मूर्ख मनुष्य! तूने कैसी आस लगाई? जिस बचपन को तूने कल समझकर टाला, उसी कल ने आज तुझे यहाँ ला डाला।”

“बचपन बीत गया, पर बालमन अभी शेष है, तेरी हँसी में, तेरी करुणा में, तेरा अपना देश है। बच्चों के संग बैठ, बारिश में भीग, जीवन को फिर से जी, अपने भीतर झाँककर देख।”

मैंने आँसू पोंछे, सिर झुकाया, समय का सच आखिर समझ में आया, माँ से अब कोई शिकायत नहीं, जो खो गया, उसकी भरपाई नहीं।

पच्चीस साल सूत समेत वापस माँगने आया था, खाली हाथ लौटा—पर जीने का अर्थ समझ पाया था।

अब न कल की चिंता में आज गँवाऊँगा, न बीते कल के पीछे जीवन बिताऊँगा, हर साँस को उपहार समझकर जीऊँगा, हर रिश्ते को प्रेम से सींचूँगा।

क्योंकि—

बचपन लौटकर नहीं आता, पर बचपन का निष्कपट मन आज भी जगाया जा सकता है। समय को वापस नहीं लाया जा सकता, पर बचे हुए समय को प्रेम से सजाया जा सकता है।

हे माँ! अब कोई हिसाब नहीं, कोई उधार नहीं, तेरे इस जीवन से बढ़कर कोई उपहार नहीं। 🌧️🛶❤️


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