शास्त्रीयता का मुखौटा
सुर किसी के दास नहीं,
राग किसी के नाम नहीं,
संगीत किसी सिंहासन की
निजी जागीर नहीं।
फिर क्यों शास्त्रीयता का
लेकर पवित्र नाम,
लोकधुनों पर चढ़ा रहे हो
अपने गुरु का नाम?
धुन वही—
जो बाज़ार में पहले गूँज चुकी,
शब्द नए—
गुरु-महिमा से भर दिए;
और फिर घोषणा—
“देखो, यह शास्त्रीय संगीत है!”
नहीं।
शास्त्रीयता
शब्दों की पोशाक नहीं,
राग की साधना है।
राग केवल आरोह-अवरोह नहीं,
उसकी आत्मा है—
रागांग, चलन, स्वर-संबंध,
समय, भाव और अनुशासन।
तुम गुरु को ऊँचा करना चाहते हो—
करो।
भक्ति में शब्द अर्पित करो,
नए गीत रचो,
नए सुर खोजो।
पर संगीत की
पुरानी तपस्या को
अपने प्रचार का
मुखौटा मत बनाओ।
गुरु की महिमा
संगीत को छोटा करके नहीं बढ़ती।
जिसे सचमुच राग का ज्ञान है,
वह राग के सामने झुकता है।
जिसे सचमुच गुरु का सम्मान है,
वह गुरु को
सत्य से ऊपर नहीं रखता।
और जिसे सचमुच
शास्त्रीय संगीत से प्रेम है,
वह उसकी व्याकरण को
लोकप्रियता की सुविधा पर
कुर्बान नहीं करता।
क्योंकि—
साधना में व्यक्ति नहीं,
सत्य बड़ा होता है।
परंपरा में नाम नहीं,
निष्ठा बड़ी होती है।
और संगीत में
गुरु की जय-जयकार से अधिक
महत्त्वपूर्ण है—
सुर की शुचिता।
राग की मर्यादा।
ताल का अनुशासन।
और साधक का समर्पण।
शास्त्रीयता का अर्थ
किसी ध्वज के नीचे खड़ा होना नहीं।
शास्त्रीयता का अर्थ है—
अपने अहंकार को
राग के सामने रख देना।
और यदि शास्त्रीयता
सिर्फ अपने गुरु की महिमा का
एक और माध्यम बन जाए,
तो प्रश्न गुरु का नहीं—
हमारी साधना की सत्यनिष्ठा का है।
संगीत को बचाना है
तो किसी से लड़ना नहीं।
बस—
सुर को सुर रहने दो,
राग को राग रहने दो,
गुरु को गुरु रहने दो,
और शास्त्रीयता को
शास्त्रीयता रहने दो।
बाकी सब
प्रचार है।
विस्तृत विचार:
When Śāstrīya Saṅgīt Becomes a Label — On rāga, paramparā, appropriation and the discipline of learning
संगीत साधना है—
किसी व्यक्ति की महिमा का माध्यम नहीं।
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