जप, सुमिरन और ध्यान — “हरहु कलेश विकार”
मनुष्य के दुःख का एक बड़ा कारण केवल बाहरी परिस्थितियाँ नहीं हैं।
उन परिस्थितियों के प्रति हमारे भीतर उठने वाले भय, चिंता, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, अपेक्षा और आसक्ति भी दुःख को जन्म देते हैं।
भारतीय संत परम्परा ने इसलिए बार-बार मन को भीतर की ओर मोड़ने की बात कही है—
जप, सुमिरन और ध्यान के माध्यम से।
हनुमान चालीसा के आरम्भिक दोहे में तुलसीदास जी की प्रार्थना है—
“बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार॥”
यहाँ सुमिरन केवल किसी नाम का उच्चारण नहीं है।
इसके साथ एक प्रार्थना भी जुड़ी है—
बुद्धि और विवेक दो, ताकि भीतर के कलेश और विकार दूर हो सकें।
इसीलिए हनुमान चालीसा का यह दोहा मानसिक परिवर्तन की एक सुंदर प्रक्रिया बताता है—
सुमिरन → विवेक → आंतरिक शुद्धि → निर्भयता।
रामचरितमानस में नाम का दीपक
तुलसीदास जी कहते हैं—
“राम नाम मनि दीप धरु, जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ, जौं चाहसि उजिआर॥”
नाम को दीपक की तरह धारण करना—
अर्थात् अपने भीतर के अंधकार को देखने के लिए प्रकाश उत्पन्न करना।
गुरु ग्रंथ साहिब — सिमरन से सुख
गुरु अर्जन देव जी, धनासरी महला ५, में कहते हैं—
“सिमरउ सिमरि सिमरि सुख पावउ,
सासि सासि समाले॥”
अर्थात् स्मरण करते-करते सुख/आंतरिक शांति प्राप्त होती है और प्रत्येक श्वास के साथ उस स्मरण को हृदय में धारण किया जाता है।
इसी पद में आगे आता है—
“गुर का बचनु बसै जीअ नाले॥”
जब गुरु का शब्द भीतर बसने लगता है, तो साधना केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं रहती—वह जीवन-दृष्टि बनने लगती है।
और गुरु ग्रंथ साहिब में ही एक अन्य स्थान पर सिमरन को सीधे कलेशों से जोड़ते हुए कहा गया है—
“सिमरउ सिमरि सिमरि सुखु पावउ।
कलि कलेस तन माहि मिटावउ॥”
अर्थात् स्मरण करते हुए सुख प्राप्त हो और शरीर-मन के कलेश मिटें।
तीन परम्पराएँ — एक मानवीय यात्रा
राम का सुमिरन,
हनुमान का स्मरण,
गुरु का सिमरन—
शब्द और परम्पराएँ अलग हैं, लेकिन इनके भीतर एक गहरी मानवीय खोज दिखाई देती है:
मन की अशांति से मन की सजगता की ओर।
भय से विश्वास की ओर।
विकार से विवेक की ओर।
चिंता से चेतना की ओर।
इस दृष्टि से जप कोई जादुई उपाय नहीं है कि जीवन में दुःख कभी आएगा ही नहीं।
बल्कि जप और ध्यान हमें यह देखने की क्षमता दे सकते हैं कि—
दुःख एक घटना है,
लेकिन उसके साथ जुड़ी हमारी मानसिक प्रतिक्रिया एक अलग घटना है।
चिंता भविष्य की कल्पना है।
पश्चाताप अतीत की पकड़ है।
क्रोध वर्तमान को अशांत करता है।
आसक्ति परिवर्तन को स्वीकार नहीं करने देती।
अहंकार हर घटना को “मेरे साथ” जोड़ देता है।
सुमिरन मन को वापस वर्तमान में लाता है।
ध्यान मन को देखने की दूरी देता है।
जप उस सजगता को निरंतरता देता है।
और शायद यही “हरहु कलेश विकार” की वास्तविक दिशा है—
बाहर की दुनिया को बदलने से पहले
अपने भीतर उस स्थान को बदलना
जहाँ से हम दुनिया को देखते हैं।
SSG चिंतन
आज कुछ क्षण मौन में बैठकर स्वयं से पूछें—
मेरे दुःख का मूल वास्तव में कहाँ है?
परिस्थिति में—या परिस्थिति के प्रति मेरे भीतर उठ रहे
भय, अपेक्षा, आसक्ति और विकार में?
शायद इसी प्रश्न से
जप सुमिरन बनता है,
सुमिरन ध्यान बनता है,
और ध्यान आत्मचिंतन।
“हरहु कलेश विकार।”
यही प्रार्थना केवल हनुमान से नहीं—
अपने भीतर के प्रकाश से भी है।
— Saraswati Sangeet Gurukul (SSG)
संगीत • साधना • चिंतन • मानवता
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