Saturday, September 12, 2026

दृष्टि, प्रज्ञा और भीतर छिपा हुआ मनुष्य


SSG | दृष्टि, प्रज्ञा और भीतर छिपा हुआ मनुष्य

“यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा,
शास्त्रं तस्य करोति किम्?
लोचनाभ्यां विहीनस्य,
दर्पणः किं करिष्यति?”

जिसके भीतर अपनी प्रज्ञा नहीं, उसके लिए शास्त्र भी क्या कर सकते हैं?
जिसके नेत्र ही नहीं, उसके लिए दर्पण भला क्या कर सकता है?

आज लगभग पचास वर्ष बाद इस श्लोक का अर्थ केवल समझ में नहीं आता—जीवन में अनुभव होता है।

बचपन में मैं अक्सर बन्दरों और चिड़ियों को देखता रहता था।
उनके व्यवहार को समझने की कोशिश करता, उनसे बातें करता और कभी-कभी अपने अकेलेपन में उन्हीं के बीच अपनी एक अलग दुनिया बना लेता था।

तब शायद मुझे पता नहीं था कि मैं क्या खोज रहा हूँ।

आज लगता है—
मैं संसार को देखने की दृष्टि खोज रहा था।

क्योंकि आँखें तो सबके पास होती हैं,
लेकिन देखने की दृष्टि सबके पास नहीं होती।

और शायद प्रज्ञा भी वही है—
जो दिखाई दे रहा है, उसके पार भी कुछ देखने की क्षमता।


मुंशी प्रेमचंद की एक पंक्ति आज इस अनुभव के साथ कहीं अधिक अर्थपूर्ण लगती है—

“मनुष्य कितना ही हृदयहीन हो, उसके हृदय के किसी न किसी कोने में पराग की भाँति रस छिपा रहता है। जिस तरह पाषाण में आग छिपी रहती है, उसी तरह मनुष्य के हृदय में भी चाहे वह कितना ही क्रूर क्यों न हो, उत्कृष्ट और कोमल भाव छिपे रहते हैं।”

शायद बचपन में उन चिड़ियों और बन्दरों से बातें करते हुए मेरे भीतर उसी “पराग के रस” का कोई बीज पड़ा था।

वह बीज किसी शास्त्र ने नहीं बोया था।

वह किसी गुरु ने नहीं दिया था।

वह एकांत ने दिया था।
प्रकृति ने दिया था।
और शायद उन जीवों ने दिया था, जिनसे बात करने के लिए किसी भाषा की आवश्यकता नहीं थी।

तब अकेलापन मुझे प्रकृति के करीब ले गया था।

आज वही अकेलापन मुझे मनुष्य के भीतर छिपे उस कोमल भाव को खोजने के लिए संसार से कुछ दूर ले जा रहा है।

अन्तर केवल इतना है—

तब मैं संसार को समझना चाहता था,
आज संसार को समझ लेने के बाद उससे थोड़ा विरक्त होकर
मनुष्य के भीतर बचे हुए मनुष्य को देखना चाहता हूँ।


शायद इसी कारण आज बहुत-से शास्त्र पढ़ लेने के बाद भी मन प्रश्न करता है—

क्या ज्ञान बढ़ा, या केवल जानकारी बढ़ी?

क्या हमने सचमुच देखा,
या केवल पढ़ा?

क्या हमारी प्रज्ञा जागी,
या हमने दूसरों की कही हुई बातों को अपना ज्ञान मान लिया?

क्योंकि—

शास्त्र दृष्टि नहीं दे सकता,
दर्पण आँखें नहीं दे सकता।

शास्त्र रास्ता दिखा सकता है,
पर चलना स्वयं पड़ता है।

दर्पण चेहरा दिखा सकता है,
पर भीतर का चेहरा देखने के लिए
अपनी आँखें चाहिए।

और शायद जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि
हम बाहर की दुनिया को देखने के लिए आँखें खोलते-खोलते
कभी-कभी अपने भीतर देखने की क्षमता खो देते हैं।


पचास वर्ष पहले एक बच्चा
बन्दरों और चिड़ियों से बातें करता था।

आज वही बच्चा, जीवन की इतनी यात्राएँ पूरी करने के बाद,
फिर अपने अकेलेपन में लौट आया है।

लेकिन इस बार अकेलापन खाली नहीं है।

उसमें अनुभव है।
प्रश्न हैं।
स्मृतियाँ हैं।
कुछ मोहभंग है।
कुछ करुणा है।
और शायद एक ऐसी दृष्टि है
जो अब भी उस छोटे बच्चे की आँखों में कहीं बची हुई है।

वही दृष्टि आज संसार से विमुख नहीं कर रही—
बल्कि संसार को एक अलग कोण से देखने की क्षमता दे रही है।

शायद वैराग्य संसार को छोड़ना नहीं है।

वैराग्य शायद उस दृष्टि का जन्म है,
जिसमें संसार को पाने की इच्छा कम
और उसे समझने की क्षमता अधिक हो जाती है।

और तब प्रेम भी बदल जाता है—

वह अधिकार नहीं रहता,
करुणा बन जाता है।

अकेलापन अभिशाप नहीं रहता,
आत्म-संवाद बन जाता है।

और मौन खालीपन नहीं रहता,
एक ऐसी भाषा बन जाता है जिसे सुनने के लिए किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं।

क्योंकि अन्ततः—

दर्पण सामने रखा जा सकता है,
शास्त्र हाथ में दिया जा सकता है,
लेकिन दृष्टि…
दृष्टि भीतर से ही जागती है, अकेलेपन solitude में।

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