षड्दर्शन से नादब्रह्म तक : अलग-अलग मार्ग नहीं, एक ही यात्रा के विभिन्न पड़ाव
भारतीय दर्शन के षड्दर्शन—न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मीमांसा और वेदान्त—को प्रायः अलग-अलग और स्वतंत्र दार्शनिक मार्गों के रूप में देखा जाता है।
किन्तु मेरा व्यक्तिगत चिंतन कुछ भिन्न है।
मैं इन्हें एक-दूसरे से पूर्णतः स्वतंत्र मार्ग नहीं मानता। मेरे लिए ये सभी मानव चेतना की उसी एक यात्रा के विभिन्न पड़ाव हैं, जिसका अंतिम लक्ष्य है—
नाद में डूब जाना,
नाद में विलीन हो जाना,
और अंततः नादब्रह्म का अनुभव करना।
आरम्भ में मनुष्य तर्क करता है—प्रश्न पूछता है, प्रमाण खोजता है।
फिर वह जगत और तत्वों को समझने का प्रयास करता है।
उसके बाद वह पुरुष और प्रकृति, चेतना और सृष्टि के सम्बन्ध को पहचानता है।
फिर वह केवल समझने से आगे बढ़कर साधना और योग में प्रवेश करता है।
कर्म की शुद्धि और अनुशासन से गुजरते हुए वह अंततः ब्रह्म के अनुभव की ओर अग्रसर होता है।
और जब यह यात्रा अपने चरम पर पहुँचती है, तब शायद शब्द, तर्क, मत और दर्शन भी पीछे छूट जाते हैं।
शेष रह जाता है केवल—
नाद।
वही अनाहत नाद,
वही स्पंदन,
वही चेतना,
वही ब्रह्म।
इसीलिए संगीत साधना को केवल कला-साधना के रूप में देखना अधूरा है। भारतीय संगीत परम्परा में स्वर केवल ध्वनि नहीं है, राग केवल संरचना नहीं है और संगीत केवल मनोरंजन नहीं है।
यह चेतना की उस यात्रा का माध्यम है जिसमें—
तर्क से अनुभूति,
अनुभूति से साधना,
साधना से समर्पण,
और समर्पण से नादब्रह्म तक पहुँचना है।
अतः मेरे लिए षड्दर्शन छः अलग-अलग मंज़िलें नहीं, बल्कि एक ही परम लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए चेतना के विभिन्न सोपान हैं।
और उस यात्रा का अंतिम प्रश्न शायद यह नहीं है कि—
“मैं किस दर्शन को मानता हूँ?”
बल्कि यह है—
“क्या मैं अभी भी दर्शन को समझ रहा हूँ,
या स्वयं उस नाद में डूबने लगा हूँ?”
नादोऽस्मि।
नादब्रह्म।
— Akshat Agrawal
SSG | Sangeet, Sadhana & Gyan
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