तुम सम पुरुष, न मो सम नारी
तुम सम पुरुष, न मो सम नारी,
यह संजोग प्रभु रचा बिचारी।
बेकार में मैं भक्त बनने की,
साधक बनने की चेष्टा कर रहा हूँ,
अपने ही मन की भूलभुलैया में
तुमसे ही चतुराई कर रहा हूँ।
अभी प्रभु, तुमसे क्या चतुराई?
तुमसे क्या कुछ छिपाना है?
जिसे मैं अपना समझ रहा हूँ,
वह भी तो तुमने ही बनाया है।
मैं कहता हूँ—
“प्रभु! यह मेरा है…”
तुम मुस्कुराते हो।
मैं कहता हूँ—
“प्रभु! यह मेरा निर्णय है…”
तुम फिर मुस्कुराते हो।
मैं कहता हूँ—
“मैं साधना कर रहा हूँ…”
और भीतर से कोई पूछता है—
“कौन कर रहा है?”
मैं भक्त बनने चला था,
अहंकार साथ ले आया;
मैं मोह छोड़ने चला था,
मोह का नया नाम—
“भक्ति” रख आया।
मैं संसार छोड़ने निकला,
पर मन में संसार लिए बैठा हूँ;
मैं तुम्हें पाने चला हूँ
और अपने ही “मैं” को
बीच में लिए बैठा हूँ।
कितनी अजीब मेरी साधना है!
तुम्हें पाने के लिए
तुम्हीं से सौदे करता हूँ—
“यह इच्छा पूरी कर दो,
मैं इतना जप करूँगा।”
“यह काम बना दो,
मैं इतना दान करूँगा।”
“यह व्यक्ति मिल जाए,
फिर मैं तुम्हारा हो जाऊँगा।”
अरे प्रभु!
तुमसे भी सौदा?
और फिर स्वयं को भक्त कहता हूँ?
तुम तो निर्मोही हो,
मोह न जाने;
पर जिन पर तुम्हारा मोह हो जाए,
उन्हें अपने ढंग से सँवारते हो।
कभी देकर,
कभी छीनकर,
कभी मिलाकर,
कभी दूर करके।
और मैं हर बार
तुम्हारे निर्णय पर प्रश्न करता हूँ।
मुझे लगता है
मैं तुम्हें समझ गया।
पर शायद
तुम्हारी सबसे बड़ी कृपा यही है
कि हर बार मेरी समझ को
थोड़ा और तोड़ देते हो।
मैं सोचता हूँ—
“अब मैं धीर हो गया।”
फिर कोई मोह सामने आ जाता है।
सोचता हूँ—
“अब मैं निर्लिप्त हूँ।”
फिर कोई अपना
दिल के दरवाज़े पर दस्तक दे देता है।
सोचता हूँ—
“अब मैं साधक हूँ।”
और भीतर से आवाज़ आती है—
“पहले मनुष्य तो बन ले!”
शायद भक्ति का अर्थ
हर समय गंभीर चेहरा बनाकर
साधक बने रहना नहीं।
शायद भक्ति का अर्थ है
एक दिन अपने ऊपर भी हँस सकना।
अपनी चालाकियाँ देखना,
अपने मोह पहचानना,
अपने अहंकार पर मुस्कुराना
और फिर कहना—
“प्रभु, मैं जैसा हूँ
वैसा ही तुम्हारे सामने हूँ।”
न कोई अभिनय,
न कोई दावा,
न भक्त होने का प्रमाण।
तुम सम पुरुष,
न मो सम नारी—
यह संजोग भी तुम्हारा,
यह दूरी भी तुम्हारी।
मैं तुम्हें पाने की
इतनी चतुराई क्यों करूँ?
जब तुम चाहोगे
तो बिना माँगे मिल जाओगे।
और जब नहीं चाहोगे,
तो मेरी सारी साधना,
सारे मंत्र,
सारे तर्क,
सारी चतुराई—
किस काम की?
इसलिए आज
भक्त बनने की कोशिश छोड़ता हूँ।
बस तुम्हारे सामने
अपने मन को रख देता हूँ।
मोह है—तो मोह सहित।
कमज़ोरी है—तो कमज़ोरी सहित।
अहंकार है—तो अहंकार सहित।
और इतना ही कहता हूँ—
प्रभु,
मुझे भक्त मत बनाओ,
बस इतना कर दो
कि तुम्हारे सामने
झूठा न बनूँ।
बाकी—
तुम सम पुरुष,
न मो सम नारी,
यह संजोग प्रभु
रचा तुम्हीं ने सारी।
अब तुम जानो,
तुम्हारी माया जाने,
और तुम्हारा यह नादान भक्त जाने—
कि तुमसे क्या चतुराई! 🙏
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