भाव को दबाना नहीं है, भाव को व्यक्त करना ज़रूरी है — पर व्यक्त करने के दो मार्ग हैं।
एक मार्ग है गहरे चिंतन का — जहाँ मन अपने ही दुख, अपनी ही पीड़ा को ठहर कर देखता है, उसे समझता है, उसमें डूबता है और उससे कुछ सीखकर ऊपर उठता है। यह मनन है, यह साधना है।
दूसरा मार्ग है पछतावे, खुंदक, कुंठा, चिड़चिड़ाहट और चिंता का — जहाँ मन उसी दुख में बार-बार गिरता है, उलझता है, उसे कुरेदता रहता है, पर उससे कभी ऊपर नहीं उठता। यह भोग है, विलाप है — साधना नहीं।
भाव प्रकट होना चाहिए, पर चिंतन बनकर, विक्षोभ बनकर नहीं।
इसी के साथ यह भी उतना ही आवश्यक है कि मन और बुद्धि अपनी चेतना को नीचे न गिरने दें। जब भाव उमड़ें — क्रोध हो, शोक हो, वेदना हो — तब भी विवेक जागृत रहे। बुद्धि चेतना की रक्षक है; यदि वह भाव के आवेग में बह जाए, तो वही आत्म-हनन है, वही पतन है — मनुष्य अपने ही हाथों अपनी चेतना को क्षीण कर देता है।
गीता कहती है — मन को इंद्रियों और भावों के अधीन नहीं, अपने अधीन रखो। रोना मना नहीं, पर रोने में डूब जाना और उठना भूल जाना — यही पतन है।
इसलिए साधक का मार्ग यही है — भाव को अनुभव करो, उसे प्रकट होने दो, पर बुद्धि को साक्षी बनाकर। दुख को चिंतन बनाओ, कुंठा मत बनने दो। पीड़ा से गुजरो, पर पीड़ा को अपनी चेतना का स्वामी मत बनने दो।
यही स्थितप्रज्ञता है — भाव भी सच्चा, और चेतना भी अडिग।
🙏🙏
~ सरस्वती संगीत गुरुकुल
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