शास्त्रीय संगीत का गिरता स्वरूप और उसकी नीरसता
जब राग की आत्मा खोकर संगीत केवल स्वर-व्याकरण बन जाए
भारतीय शास्त्रीय संगीत को लेकर आज एक असहज प्रश्न पूछना आवश्यक हो गया है—
क्या शास्त्रीय संगीत वास्तव में नीरस होता जा रहा है, या हमने उसे सिखाने और प्रस्तुत करने का ऐसा तरीका विकसित कर लिया है जिसने उसकी स्वाभाविक रसात्मकता को ढँक दिया है?
यह प्रश्न शास्त्रीय संगीत की महान परंपरा पर आरोप नहीं है।
बल्कि इसके ठीक विपरीत—यह उस परंपरा के प्रति सम्मान से पैदा हुआ प्रश्न है।
क्योंकि जिस संगीत ने सदियों तक मनुष्य के भीतर श्रृंगार, करुणा, शांति, भक्ति, विरह, आनंद और अद्भुतता के सूक्ष्मतम भावों को स्वर दिया, वही संगीत यदि आज किसी नए श्रोता को केवल—
धीमा, लंबा, कठिन, तकनीकी और नीरस
लगने लगे, तो समस्या संगीत की परंपरा में नहीं, शायद हमारे संगीत-बोध और संगीत-शिक्षण में खोजनी चाहिए।
क्या राग सचमुच नीरस है?
नहीं।
राग नीरस नहीं है।
नीरस हो सकता है—
- राग को केवल आरोह-अवरोह बनाकर पढ़ाना,
- राग को केवल परीक्षा का विषय बनाना,
- राग को केवल कठिन तानों का प्रदर्शन बनाना,
- राग को बिना उसके भाव और व्यक्तित्व के गाना,
- और श्रोता को यह बताए बिना घंटों संगीत सुनाना कि उस संगीत में हो क्या रहा है।
राग की प्रकृति स्वयं अत्यंत जीवंत है।
एक ही स्वर अलग संदर्भ में बदल जाता है।
एक ही राग अलग कलाकार के भीतर अलग रंग ग्रहण कर सकता है।
एक छोटी-सी मींड पूरी अनुभूति बदल सकती है।
एक क्षण का ठहराव वातावरण बदल सकता है।
फिर ऐसा संगीत नीरस कैसे हो सकता है?
नीरसता वहाँ पैदा होती है जहाँ राग का जीवित अनुभव अनुपस्थित हो जाता है।
व्याकरण सीखने से कविता लिखना नहीं आ जाता
शास्त्रीय संगीत की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए भाषा और साहित्य की एक सरल उपमा शायद सबसे उपयुक्त है।
मान लीजिए किसी विद्यार्थी को हिंदी का पूरा व्याकरण पढ़ा दिया गया।
उसे संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, काल, वचन, कारक, समास, संधि सब आता है।
वह शुद्ध वाक्य लिख सकता है।
क्या इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि वह कविता लिख सकता है?
क्या वह निराला, महादेवी, कबीर या ग़ालिब की तरह किसी अनुभूति को शब्द दे सकता है?
नहीं।
व्याकरण आवश्यक है।
लेकिन—
व्याकरण साहित्य नहीं है।
व्याकरण भाषा की संरचना समझाता है।
कविता उस भाषा में जीवन भरती है।
ठीक यही अंतर—
स्वर-व्याकरण और रागदारी संगीत के बीच है।
आरोह-अवरोह जानना व्याकरण है।
वादी-संवादी जानना व्याकरण है।
जाति, समय, स्वर-संख्या और पकड़ जानना व्याकरण है।
लेकिन—
राग को गाना, राग को पहचानना और राग की आत्मा को व्यक्त करना—कविता रचने जैसा है।
आज हमारी समस्या शायद यह है कि हमने राग का व्याकरण तो बचा लिया, लेकिन राग की कविता खोने लगे हैं।
राग ≠ स्वर-समूह
पंडित K. G. Ginde की यह lecture-demonstration इसी मूल प्रश्न पर हमें वापस ले जाती है।
उनकी दृष्टि में राग केवल कुछ निश्चित स्वरों का collection नहीं है।
राग एक संगठित, जीवित और भावात्मक melodic system है।
इसमें महत्वपूर्ण है—
- कौन-सा स्वर लिया गया,
- कैसे लिया गया,
- कहाँ से लिया गया,
- किस स्वर की ओर बढ़ा,
- कहाँ ठहरा,
- किस स्वर को कितना महत्व दिया,
- कौन-सी स्वर-संगति बनी,
- और उस स्वर में कितना लागाव था।
यानी राग का जीवन—
स्वर में नहीं, स्वर के व्यवहार में है।
यदि राग केवल स्वरों का समूह होता, तो एक ही स्वर-सामग्री से बने या निकट रागों में व्यक्तित्व का अंतर समझाना असंभव होता।
लेकिन भारतीय संगीत की पूरी रागदारी इसी सूक्ष्म अंतर पर खड़ी है।
“रागदारी संगीत” — नाम में ही दर्शन छिपा है
हिंदुस्तानी संगीत को रागदारी संगीत भी कहा गया।
यह शब्द केवल nomenclature नहीं है।
यह बताता है कि संगीत का केंद्र राग है।
राग के भीतर जाना।
उसके स्वभाव को समझना।
उसके स्वर-संबंधों को पहचानना।
उसकी मर्यादा के भीतर स्वतंत्र होना।
और अंततः उस राग को केवल दोहराना नहीं, जीना।
लेकिन आज हम अक्सर रागदारी संगीत को इस प्रकार पढ़ाते हैं—
यह आरोह है।
यह अवरोह है।
यह वादी है।
यह संवादी है।
यह जाति है।
यह समय है।
यह पकड़ है।
अब बंदिश याद करो।
विद्यार्थी सब याद कर लेता है।
परीक्षा पास कर लेता है।
लेकिन—
राग कहाँ गया?
“राग परिचय” और “राग पहचान” दो अलग बातें हैं
आज संगीत की शिक्षा में “राग परिचय” एक स्थापित शब्द है।
लेकिन हमें पूछना चाहिए—
क्या हम वास्तव में राग का परिचय करा रहे हैं?
या केवल उसके बारे में सूचना दे रहे हैं?
किसी विद्यार्थी को यह बताना कि—
“राग X में ये स्वर लगते हैं”
राग का परिचय नहीं है।
यह राग का विवरण है।
राग परिचय तब होगा जब विद्यार्थी किसी अनजान आलाप को सुनकर कह सके—
“यह राग X है—क्योंकि यहाँ इस स्वर का ऐसा लागाव है, यह संगति बार-बार उभर रही है और यह चलन इस राग की प्रकृति को व्यक्त कर रहा है।”
यहीं सूचना अनुभूति में बदलती है।
चार वर्ण—राग स्थिर नहीं, गतिशील है
गिंडे जी राग की melodic movement को समझाने के लिए चार प्रकार के वर्णों की चर्चा करते हैं—
स्थायी, आरोही, अवरोही और संचारी।
यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात सामने आती है।
राग कोई static scale नहीं है।
स्वर चलते हैं।
कहीं ठहरते हैं।
कहीं ऊपर जाते हैं।
कहीं नीचे आते हैं।
कहीं दोनों दिशाओं का संचरण होता है।
इसलिए—
सा रे ग म प ध नि सा
लिख देने से राग हमारे सामने उपस्थित नहीं हो जाता।
यह केवल उसका material है।
ठीक वैसे ही जैसे—
अ, आ, इ, ई और व्याकरण के नियम जान लेने से कविता नहीं बन जाती।
कविता तब बनती है जब शब्दों के बीच संबंध, लय, अर्थ, अनुभूति और कल्पना जन्म लेती है।
उसी तरह राग तब जन्म लेता है जब स्वरों के बीच—
गति, संबंध, विराम, बल, स्पर्श, लागाव और भाव
जन्म लेते हैं।
“लागाव”—जहाँ राग की आत्मा छिपी है
शायद इस lecture की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है—
लागाव।
एक ही स्वर अलग-अलग रागों में अलग तरह से लिया जा सकता है।
कभी सीधा।
कभी मींड के साथ।
कभी किसी स्वर का हल्का स्पर्श लेकर।
कभी किसी विशेष स्वर-संगति में।
कभी ठहराव के साथ।
और यही छोटी-छोटी चीजें राग का व्यक्तित्व बनाती हैं।
इसलिए—
सही स्वर लगाना और सही राग लगाना एक ही बात नहीं है।
स्वर technically शुद्ध हो सकता है।
फिर भी राग अशुद्ध हो सकता है।
यही अंतर अच्छे और महान रागदारी गायन के बीच भी दिखाई देता है।
मारवा और श्री—स्वरों से आगे की दुनिया
गिंडे जी जब मारवा और श्री जैसे रागों की सूक्ष्मता को demonstrations के माध्यम से समझाते हैं, तब स्पष्ट होता है कि राग को कागज़ पर पकड़ना कितना सीमित है।
राग की पहचान केवल उसके स्वरों से नहीं होती।
वह बनती है—
चलन से,
स्वर-संगति से,
ठहराव से,
लागाव से,
और स्वर के भीतर छिपे तनाव और विश्राम से।
इसीलिए notation कभी भी राग का पूरा अनुभव नहीं दे सकती।
Notation नक्शा है।
राग यात्रा है।
वर्षों का रियाज़ और फिर भी राग पहचानने में कठिनाई क्यों?
यह प्रश्न शायद संगीत-शिक्षा के लिए सबसे असुविधाजनक है।
एक विद्यार्थी दस-पंद्रह वर्ष तक संगीत सीखता है।
रियाज़ करता है।
सैकड़ों बंदिशें सीखता है।
सैकड़ों बार परीक्षा देता है।
फिर भी किसी अनजान प्रस्तुति को सुनकर राग पहचानने में कठिनाई होती है।
क्यों?
क्योंकि हमने शायद गले को अधिक प्रशिक्षित किया और कान को कम।
रियाज़ का अर्थ केवल स्वर को सही लगाना नहीं है।
रियाज़ का अर्थ है—
सुनने की क्षमता को विकसित करना।
और उससे भी आगे—
स्वर के पीछे छिपे राग-भाव को सुनना।
तकनीकी दक्षता और संगीतात्मकता
आज शास्त्रीय संगीत में तकनीकी दक्षता का महत्व बढ़ा है।
तानें तेज हैं।
आवाज़ें प्रशिक्षित हैं।
ताल की पकड़ मजबूत है।
रेंज बड़ी है।
जटिल layakari संभव है।
यह सब मूल्यवान है।
लेकिन खतरा तब पैदा होता है जब—
तकनीक स्वयं उद्देश्य बन जाए।
तब कभी-कभी—
तान संगीत पर भारी पड़ जाती है।
गति भाव पर भारी पड़ जाती है।
कठिनाई सरलता को ढँक देती है।
और प्रदर्शन राग को पीछे छोड़ देता है।
महान संगीत में तकनीक अदृश्य हो जाती है।
श्रोता यह नहीं सोचता—
“वाह, कलाकार ने कितनी कठिन तान ली।”
वह महसूस करता है—
“कुछ भीतर बदल गया।”
यही संगीत की विजय है।
शास्त्रीय संगीत की “नीरसता” का असली कारण
इसलिए हमें यह कहने से बचना चाहिए कि—
“Classical music is boring.”
यह शास्त्रीय संगीत के साथ अन्याय होगा।
अधिक सटीक बात यह है—
“जब राग की आत्मा के स्थान पर उसका व्याकरण प्रस्तुत किया जाता है, तो शास्त्रीय संगीत नीरस लग सकता है।”
जब विद्यार्थी को केवल rules मिलते हैं, तो संगीत homework बन जाता है।
जब श्रोता को केवल technical display मिलता है, तो संगीत demonstration बन जाता है।
लेकिन जब राग का भाव, व्यक्तित्व और लागाव सामने आता है, तो वही संगीत ध्यान बन सकता है।
संगीत और धर्म से परे उसका आध्यात्मिक आयाम
गिंडे जी की दृष्टि में राग-संगीत का एक गहरा आध्यात्मिक पक्ष भी दिखाई देता है।
यहाँ आध्यात्मिकता को किसी एक धर्म से जोड़ना आवश्यक नहीं है।
भारतीय संगीत में सगुण से निर्गुण की ओर जाने का रूपक मिलता है।
पहले—
गुरु।
फिर—
स्वर।
फिर—
राग।
फिर—
भाव।
और अंततः—
नाद।
यहाँ कलाकार स्वयं को प्रदर्शित करने के बजाय संगीत में विलीन होने लगता है।
इसलिए शास्त्रीय संगीत का अंतिम लक्ष्य केवल यह नहीं कि—
“मैं कितना अच्छा गा सकता हूँ?”
बल्कि शायद यह है—
“मैं कितना गहरा सुन सकता हूँ?”
धर्म अलग है, नाद-अनुभव अलग
इस बिंदु पर संगीत और धर्म के बीच अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है।
इस्लाम एक धर्म है; सूफ़ी परंपरा उस धार्मिक-सांस्कृतिक संसार के भीतर विकसित एक विशिष्ट आध्यात्मिक धारा है।
इसी प्रकार भारतीय राग-संगीत को किसी एक धार्मिक पहचान में सीमित करना उसके अनुभव की सार्वभौमिकता को कम करना होगा।
राग किसी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या चर्च की संपत्ति नहीं।
नाद मनुष्य की साझी अनुभूति है।
इसीलिए भारत की संगीत परंपरा में अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के कलाकारों ने एक-दूसरे से सीखा और इस परंपरा को समृद्ध किया।
संगीत-शिक्षा में हमें क्या बदलना होगा?
यदि शास्त्रीय संगीत की नीरसता को दूर करना है, तो समाधान “रागों को सरल बना देना” नहीं है।
समाधान है—
राग को सही ढंग से सिखाना।
1. राग की जानकारी नहीं—राग का अनुभव
कम राग सिखाएँ, लेकिन गहराई से सिखाएँ।
2. Comparative listening
मारवा और श्री।
भैरव और कालिंगड़ा।
भीमपलासी और धनाश्री।
दरबारी और अड़ाना।
निकट रागों को साथ सुनाएँ।
अंतर कान से पकड़वाएँ।
3. लागाव को केंद्र में रखें
पूछें—
“यह स्वर यहाँ ऐसा क्यों?”
4. सुनने की परीक्षा लें
Audio clip सुनाकर पूछें—
“कौन-सा राग?”
और फिर—
“क्यों?”
5. महान कलाकारों की lecture-demonstrations पढ़ाई जाएँ
गिंडे जैसे संगीतज्ञों की recordings को archival curiosities नहीं, बल्कि living textbooks माना जाना चाहिए।
गुरुकुल का अर्थ केवल गुरु के पास रहना नहीं
गुरुकुल का मूल तत्व भवन नहीं था।
श्रवण था।
गुरु को सुनना।
गुरु के रियाज़ को सुनना।
एक phrase को बार-बार सुनना।
गुरु द्वारा की गई छोटी correction को पकड़ना।
और धीरे-धीरे यह समझना कि—
“गुरु ने वही स्वर लिया जो मैंने लिया था, लेकिन गुरु के स्वर में राग क्यों था और मेरे स्वर में केवल स्वर?”
यही वह ज्ञान है जो केवल किताब से नहीं आता।
आज हमें अधिक कलाकार नहीं, अधिक “सहृदय श्रोता” भी चाहिए
शास्त्रीय संगीत की शक्ति केवल कलाकार में नहीं है।
श्रोता में भी है।
एक सहृदय श्रोता जानता है कि—
कहाँ स्वर आया।
कहाँ स्वर रुका।
कहाँ राग ने करवट ली।
कहाँ भाव बदला।
कहाँ कलाकार ने राग की मर्यादा के भीतर स्वतंत्रता खोजी।
ऐसे श्रोता के सामने कलाकार भी बेहतर संगीत पैदा करता है।
इसलिए संगीत शिक्षा का लक्ष्य केवल performers पैदा करना नहीं होना चाहिए।
हमें सहृदय श्रोता भी पैदा करने होंगे।
राग को फिर से “विषय” नहीं, “अनुभव” बनाना होगा
हमने संगीत को syllabus में डाला।
फिर syllabus को examination में डाला।
फिर examination को certificate में बदल दिया।
और certificate को qualification समझ लिया।
लेकिन संगीत की असली यात्रा इन सबसे बाहर है।
राग पढ़ाया जा सकता है।
राग समझाया जा सकता है।
राग गाया जा सकता है।
लेकिन अंततः—
राग को भीतर सुनना पड़ता है।
जैसे—
व्याकरण पढ़ाया जा सकता है,
लेकिन कविता भीतर से जन्म लेती है।
वैसे ही—
स्वर-व्याकरण सिखाया जा सकता है,
लेकिन राग-बोध भीतर से जागता है।
राग को वापस संगीत का केंद्र बनाना होगा
भारतीय शास्त्रीय संगीत का भविष्य शायद किसी नए invention में नहीं है।
हमें वापस जाना होगा—
स्वर से राग की ओर।
राग से भाव की ओर।
भाव से नाद की ओर।
और नाद से मौन की ओर।
क्योंकि महान संगीत वह नहीं जिसमें कलाकार ने सबसे अधिक दिखाया।
महान संगीत वह है जिसमें—
बहुत कुछ सुनाई देने के बाद भी भीतर कुछ अनकहा रह जाए।
और शायद वही—
राग है।
नोट्स नहीं।
स्केल नहीं।
सरगम नहीं।
केवल तकनीक नहीं।
बल्कि—
स्वरों के बीच जन्म लेने वाला वह जीवित संबंध, जिसे गुरु “लागाव” से जगाता है, जिसे शिष्य श्रवण और साधना से पहचानता है, और जिसे एक दिन संगीत स्वयं उसके भीतर गाने लगता है।
अंत में पंडित गिंडे से एक प्रश्न
पंडित K. G. Ginde की lecture-demonstration को आज सुनना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह हमें उस बुनियादी प्रश्न पर वापस ले जाती है जिसे आधुनिक संगीत-शिक्षा अक्सर भूल जाती है—
हम राग सिखा रहे हैं, या केवल राग के बारे में जानकारी सिखा रहे हैं?
और शायद इसके साथ एक और प्रश्न—
क्या हमने संगीत का व्याकरण पढ़ाकर यह मान लिया है कि अब हमने संगीत सिखा दिया?
जैसे—
व्याकरण जानने से कवि नहीं बनता,
उसी तरह स्वर जानने से रागदारी नहीं आती।
व्याकरण भाषा को शुद्ध करता है।
कविता भाषा को जीवित करती है।
स्वर-शास्त्र संगीत को व्यवस्थित करता है।
राग संगीत को जीवित करता है।
और जब राग का यह जीवन गायब हो जाता है, तभी—
शास्त्रीय संगीत, जो कभी मनुष्य के भीतर रस जगाने की साधना था, केवल नियमों और तकनीक का प्रदर्शन बनकर नीरस दिखाई देने लगता है।
इसलिए समस्या शास्त्रीय संगीत की नहीं है।
समस्या यह है कि हमने कहीं उसकी आत्मा को उसके व्याकरण से बदल तो नहीं दिया?
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