Friday, August 21, 2026

कठोर तक़दीर, पूर्व जनम के कर्म बंधन

 

कठोर तक़दीर

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बंदूक और बम के धमाकों में,
क्या प्रेम कभी पलता है?
नफ़रत की आँधी के बीच
क्या कोई दीपक जलता है?

जाहिल क्या जाने प्रेम की भाषा,
गुणी जाने गुण की बात—
जिसने हृदय में प्रेम सँजोया,
वही समझे मन की रात।

तलत की आवाज़-सी कोई पुकार उठती है—
सीने में सुलगते अरमाँ,
आँखों में उदासी छाई है;
ये आज तेरी दुनिया से हमें
तक़दीर कहाँ ले आई है?

किस जन्म के कौन से कर्म थे,
किस ऋण की थी यह परछाईं?
कौन जानता है जीवन-मरण की
अनदेखी कोई गहरी गहराई।

हम कर्म की उस गुत्थी को
न पूरा समझ सके, न सुलझा पाए—
कुछ लोग प्रेम देने आते हैं,
कुछ प्रेम की कीमत देकर चले जाएँ।

राजीव—
जिसके स्वप्न में एक नया भारत था,
जिसकी आँखों में आने वाला कल था;
यौवन, विज्ञान और आधुनिकता का
जिसके मन में उजला संकल्प था।

फिर एक दिन—
इतिहास ने कैसी करवट ली,
एक फूल-सा जीवन
हिंसा की वेदी पर ढल गया।

और पीछे रह गईं
सोनिया की मौन आँखें—
एक पत्नी का विरह,
एक माँ का धैर्य,
एक परिवार की असह्य पीड़ा,
और समय के सामने खड़ी
एक स्त्री की दृढ़ता।

तक़दीर कभी-कभी
बहुत क्रूर अक्षरों में लिखती है—
जिसे संसार सत्ता कहता है,
वह किसी के लिए
सिर्फ़ एक घर होता है;
जिसे इतिहास घटना कहता है,
वह किसी के लिए
पूरी ज़िंदगी का शोक होता है।

किस जन्म का कर्म था—
यह निर्णय हम कैसे करें?
किस आत्मा ने क्या पाया,
क्या खोया—
इसका हिसाब हम कैसे धरें?

शायद कर्म का अर्थ
सज़ा नहीं, यात्रा है;
शायद जन्म-जन्मांतर
कोई अधूरी कहानी है;
और प्रेम—
उस कहानी का वह अध्याय है
जिसे मृत्यु भी
पूरी तरह मिटा नहीं पाती।

इसलिए राजीव,
तुम्हें केवल राजनीति में मत खोजो—
उस स्वप्न में खोजो
जो भारत को आगे ले जाना चाहता था।

और सोनिया,
तुम्हें केवल इतिहास के पन्नों में मत पढ़ो—
उस मौन में देखो
जिसने निजी पीड़ा को
सार्वजनिक जीवन के धैर्य में बदल दिया।

प्रेम अगर सच्चा हो
तो वह अधिकार नहीं माँगता,
वह प्रतिशोध नहीं माँगता—
बस स्मृति में
एक दीप जला जाता है।

बंदूकें चुप हो जाती हैं,
बमों की आवाज़ मिट जाती है,
सत्ता बदल जाती है,
पीढ़ियाँ गुजर जाती हैं—
पर सच्चे प्रेम की एक लौ
किसी न किसी हृदय में
जलती रह जाती है।

गुणी जाने गुण की बात,
प्रेमी जाने प्रेम की पीर—
कर्मों की इस अनंत डगर में
कौन जाने किसकी तक़दीर।

आज बस इतना प्रण हो—
नफ़रत से इतिहास न लिखेंगे,
हिंसा से प्रेम न तौलेंगे;
जो चले गए उन्हें श्रद्धा देंगे,
जो रह गए उन्हें सहारा देंगे।

क्योंकि अंततः
मनुष्य की सबसे बड़ी विरासत
उसकी सत्ता नहीं—
उसका प्रेम है।

और शायद
किसी अगले जन्म की सुबह में
वही प्रेम फिर लौटे—
बिना बंदूक, बिना धमाके,
बिना विरह के भय के—
बस दो मनुष्यों के बीच
एक निर्मल उजाला बनकर।

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