Monday, August 10, 2026

जो समझे सो निहाल…सोना बढ़ता गया, शांति कहाँ बढ़ी?

 

जो समझे सो निहाल…

आज दो लेख लिखे—

Risk, Uncertainty and Investment in the Deepening Shadow of Kaliyuga”

और

“The Kaliyugi Ramayana of Capital”

एक में प्रश्न था—
धन बनता कैसे है, जोखिम कौन उठाता है और अनिश्चितता का भार आखिर किसके कंधे पर पड़ता है?

दूसरे में प्रश्न था—
जब पूँजी, सत्ता, संस्थाएँ और न्याय एक-दूसरे के बहुत निकट आ जाएँ, तो धर्म की रक्षा कौन करता है?

दोनों प्रश्नों के बीच घूमते-घूमते बात अन्ततः वहीं पहुँचती है जहाँ से शायद शुरू होनी चाहिए थी—

मनुष्य के भीतर।


सोना बढ़ता गया, शांति कहाँ बढ़ी?

हमने सभ्यता को मापने के लिए असंख्य पैमाने बना लिए—

GDP,
market capitalisation,
net worth,
portfolio return,
credit rating,
risk-adjusted return…

लेकिन एक प्रश्न आज भी अनमापा है—

मनुष्य कितना मनुष्य बचा?

धन बुरा नहीं है।

समृद्धि भी बुरी नहीं है।

निवेश भी आवश्यक है।

समस्या तब आरम्भ होती है जब साधन ही साध्य बन जाता है।

जब धन जीवन को सुविधा देने के बजाय जीवन का अर्थ निर्धारित करने लगे।

जब व्यक्ति यह भूल जाए कि—

“मेरे पास कितना है?”

से बड़ा प्रश्न है—

“मैं जो कुछ लेकर आया हूँ, उसका कर क्या रहा हूँ?”


Kaliyuga शायद बाहर कम, भीतर अधिक है

कहा जाता है—

अब तो कलियुग और गहराएगा।

शायद कलियुग का अर्थ केवल कोई दूर का cosmic period नहीं।

शायद वह एक मानसिक अवस्था भी है।

जहाँ—

धन > धर्म
शक्ति > सत्य
चतुराई > विवेक
प्रतिस्पर्धा > करुणा
और सफलता > सदाचार

हो जाए।

तब मनुष्य के पास सब कुछ हो सकता है—

लेकिन मनुष्यत्व कम होता जाता है।


“जिसके पास जितना सोना…”

इसलिए यह बात मुझे increasingly अधिक गहरी लगती है—

“जिसके पास जितना सोना है, वह उतना ही गहरा कलियुगी है।”

इसका अर्थ यह नहीं कि गरीब पुण्यात्मा और अमीर पापी।

नहीं।

अर्थ कहीं अधिक सूक्ष्म है।

जिस क्षण सोना मनुष्य की पहचान बन जाए, उसी क्षण कलियुग भीतर प्रवेश कर चुका है।

धन आपका साधन है—
तो वह शक्ति है।

धन आपका स्वामी है—
तो वह माया है।

और जब पूरी सभ्यता धन को ही सफलता, सम्मान और बुद्धिमत्ता का प्रमाण मानने लगे—

तो फिर माया केवल व्यक्ति के भीतर नहीं रहती; वह व्यवस्था बन जाती है।


फिर आता है रावण

रावण को केवल दस सिर वाला राक्षस समझना शायद उसके प्रतीक को बहुत छोटा कर देना है।

रावण विद्वान था।

शक्तिशाली था।

समृद्ध था।

अत्यन्त प्रतिभाशाली था।

उसकी समस्या बुद्धि की कमी नहीं थी।

समस्या थी—

बुद्धि का धर्म से विच्छेद।

और शायद यही आधुनिक सभ्यता का सबसे बड़ा संकट है।

आज हमारे पास—

अभूतपूर्व technology है,
अभूतपूर्व financial engineering है,
अभूतपूर्व computing power है,
अभूतपूर्व institutional complexity है—

पर क्या हमारी नैतिक बुद्धि उसी गति से बढ़ी है?

यदि नहीं—

तो हमने रावण को समाप्त नहीं किया।

हमने केवल उसके औजार अधिक sophisticated बना दिए।


और राम?

राम का अर्थ केवल रावण को पराजित करने वाला व्यक्ति नहीं।

राम उस सिद्धान्त का नाम भी हो सकता है जिसमें—

शक्ति पर मर्यादा हो,
धन पर धर्म हो,
ज्ञान पर विनय हो,
और अधिकार पर उत्तरदायित्व हो।

इसलिए आज आवश्यकता किसी नए “रावण-वध” की नहीं।

आवश्यकता है—

शक्ति को धर्म के अधीन करने की।


फिर वह पुराना प्रश्न…

“रहिमन, वो नर कैसे, जो राक्षसों का फेंका मांस भक्षण करें?”

आज इसे मैं एक और तरह से पढ़ता हूँ।

प्रश्न यह नहीं कि—

राक्षस कौन है?

प्रश्न यह है—

क्या मैं उस व्यवस्था का उपभोक्ता बन गया हूँ, जिसकी कीमत कोई और मनुष्य चुका रहा है?

यदि मेरी समृद्धि किसी दूसरे की विवशता पर टिकी है—

तो क्या मैं सचमुच समृद्ध हूँ?

यदि मेरी सुविधा किसी और की असुरक्षा पर आधारित है—

तो क्या वह सुविधा वास्तव में सभ्यता है?

यदि मेरा लाभ किसी और के हिस्से की अनिश्चितता को निगलकर पैदा हुआ है—

तो क्या वह केवल “return on investment” है?

या उसमें कोई मानवीय ऋण भी छिपा है?


और इसलिए…

बहुत हुआ।

माया का यह जाल कितना भी विशाल हो—

एक दिन समझना ही पड़ेगा कि—

portfolio हमारा नहीं,
property हमारी नहीं,
position हमारी नहीं,
यह शरीर भी हमारा नहीं।

जो मिला है—

कुछ समय के लिए मिला है।

और शायद जीवन का सबसे बड़ा investment यही है कि—

जिस समय तक यह पूँजी हमारे पास है, उस समय तक हम स्वयं को न खो दें।


जो समझे सो निहाल।

बाकी संसार अपने-अपने हिसाब-किताब में लगा रहे—

कितना सोना,
कितना return,
कितना market share,
कितनी power,
कितनी valuation…

मैं तो बस इतना कहूँ—

प्रभु, मुझे राक्षसी सभ्यता और इस मायाजाल से उबार।

और यदि कभी यह समझ आ जाए कि—

“छोड़ दे सारी दुनिया, ईश्वर / सत्य के लिए
यही मुनासिब है आदमी के लिए।”

तो शायद वही—

हमारे भीतर राम के लौटने का पहला क्षण होगा।

जो समझे सो निहाल।

॥ हरि ॐ ॥

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