स्वधर्म और साधना
Profession जीविका है; स्वधर्म जीवन का उद्देश्य।
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पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, दर्शनशास्त्र विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, डॉ. एच. एस. सिन्हा द्वारा भगवद्गीता में प्रतिपादित "स्वधर्म" की अत्यंत सारगर्भित व्याख्या।
आज के समय में लोग अक्सर Profession (व्यवसाय) और स्वधर्म को एक ही मान लेते हैं। यही भ्रम जीवन में असंतोष, तनाव और जीवन के उद्देश्य से भटकाव का एक प्रमुख कारण है।
भारतीय दर्शन के चार पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—जीवन के संतुलित विकास का मार्ग प्रस्तुत करते हैं।
Profession मुख्यतः अर्थ (जीविका) और आंशिक रूप से काम (इच्छाओं एवं आकांक्षाओं की पूर्ति) से संबंधित है।
जीविका आवश्यक है।
परिवार के पालन-पोषण, सामाजिक उत्तरदायित्वों और आत्मनिर्भरता के लिए प्रत्येक व्यक्ति को कोई न कोई व्यवसाय अपनाना ही पड़ता है।
अक्सर हमारा पेशा परिवार की परंपरा, सामाजिक अपेक्षाओं या समय की लोकप्रिय प्रवृत्तियों से प्रभावित होता है—कभी इंजीनियर बनने की दौड़, कभी डॉक्टर, कभी प्रशासनिक सेवा या कॉर्पोरेट करियर।
इसमें कोई दोष नहीं है।
किन्तु जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि हम क्या करते हैं, बल्कि यह है कि हम किस कार्य के लिए स्वाभाविक रूप से बने हैं।
यहीं से स्वधर्म की खोज प्रारम्भ होती है।
भगवद्गीता का स्वधर्म
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
"श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥"
(भगवद्गीता 3.35 एवं 18.47 के भावार्थ में भी यही सिद्धांत पुनः प्रतिपादित हुआ है।)
अर्थात—
दूसरे का उत्कृष्ट कार्य करने से अपना स्वाभाविक कार्य करना श्रेष्ठ है। अपने स्वधर्म में जीवन अर्पित कर देना भी कल्याणकारी है; परधर्म अंततः भय और संघर्ष का कारण बनता है।
डॉ. एच. एस. सिन्हा अपने व्याख्यान में इसी सिद्धांत को आधुनिक संदर्भ में समझाते हैं।
वे बताते हैं कि आज अनेक लोग केवल सामाजिक दबाव, आर्थिक आकर्षण या प्रतिष्ठा के कारण ऐसे व्यवसाय चुन लेते हैं जो उनके स्वभाव, प्रतिभा और मनोविज्ञान के अनुकूल नहीं होते।
फलस्वरूप व्यक्ति भी दुखी रहता है और समाज भी उसकी वास्तविक प्रतिभा से वंचित रह जाता है।
स्वधर्म की पहचान कैसे होती है?
विद्यालय और विश्वविद्यालय हमें ज्ञान तथा व्यावसायिक कौशल प्रदान करते हैं।
वे हमें योग्य इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, कलाकार या प्रशासक बना सकते हैं।
किन्तु स्वधर्म की पहचान केवल शिक्षा से नहीं होती।
वह व्यक्ति की भीतरी प्रकृति (निरति), अंतःप्रवृत्ति (सुरति), संवेदनशीलता, रचनात्मकता और चेतना की दिशा से प्रकट होती है।
यहीं गुरु की भूमिका प्रारम्भ होती है।
आचार्य और गुरु में अंतर
भारतीय परंपरा में दोनों का महत्व है, पर दोनों की भूमिका अलग है।
आचार्य शिक्षा देते हैं।
गुरु दीक्षा देते हैं।
आचार्य ज्ञान प्रदान करते हैं।
गुरु दिशा प्रदान करते हैं।
आचार्य कौशल विकसित करते हैं।
गुरु साधना का संस्कार देते हैं।
दीक्षा का अर्थ केवल मंत्र देना नहीं है।
दीक्षा का अर्थ है—
अपने जीवन को सत्य, साधना और उत्कृष्टता के प्रति समर्पित कर देना।
समाज सेवा ही ईश्वर की उपासना
डॉ. सिन्हा गीता के एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत की ओर भी संकेत करते हैं—
जब हम अपने स्वधर्म का निष्ठापूर्वक पालन करते हैं और समाज को ईश्वर का ही स्वरूप मानकर सेवा करते हैं, तब हमारा कर्म ही उपासना बन जाता है।
इसी भाव को गीता में कहा गया है—
"स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।"
(भगवद्गीता 18.45)
अर्थात—
मनुष्य अपने स्वभावानुकूल कर्म में निष्ठापूर्वक लगे रहकर ही सिद्धि प्राप्त करता है।
साधना और उत्कृष्टता
साधना का अर्थ केवल रियाज़ या अभ्यास नहीं है।
साधना का अर्थ है—
हर दिन अपने स्वधर्म को थोड़ा और अधिक ईमानदारी, प्रेम और उत्कृष्टता के साथ जीना।
एक संगीतकार का स्वधर्म संगीत हो सकता है।
एक चिकित्सक का स्वधर्म चिकित्सा।
एक सैनिक का स्वधर्म राष्ट्ररक्षा।
एक शिक्षक का स्वधर्म ज्ञान का प्रसार।
जब कर्म पूजा बन जाता है—
तभी साधना आरम्भ होती है।
सारस्वती संगीत गुरुकुल (SSG) का दृष्टिकोण
हमारा उद्देश्य केवल संगीत सिखाना नहीं है।
हमारा उद्देश्य है—
संगीत को व्यवसाय से आगे ले जाकर साधना बनाना।
ऐसी साधना, जो कलाकार को केवल कुशल प्रस्तुतकर्ता नहीं, बल्कि संवेदनशील, सजग और जागरूक मनुष्य बनाए।
क्योंकि जब Profession और Svadharma एक हो जाते हैं—
तब कार्य केवल रोजगार नहीं रहता,
वह उपासना बन जाता है।
"जीविका हमें संसार में स्थापित करती है।
स्वधर्म हमें अपने भीतर स्थापित करता है।
और साधना—दोनों को जोड़कर जीवन को अर्थ, आनंद और अंततः मुक्ति की दिशा में ले जाती है।"
– Saraswati Sangeet Gurukul (SSG)
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