क्योंकि माता-पिता संस्कार की जगह कुसंस्कार दे रहे हैं…
आज अक्सर एक शिकायत सुनने को मिलती है—
“बच्चों में माता-पिता के प्रति सम्मान क्यों समाप्त होता जा रहा है?”
लेकिन शायद इस प्रश्न से पहले हमें एक और, अधिक असुविधाजनक प्रश्न पूछना चाहिए—
क्या माता-पिता ने अपने बच्चों को वास्तव में सुसंस्कार दिए हैं, या अनजाने में कुसंस्कार?
बच्चा केवल माता-पिता की बातें नहीं सुनता; वह उनका जीवन देखता है। वह घर के वातावरण से सीखता है कि सत्य क्या है, धर्म क्या है, सम्मान क्या है, संबंध क्या हैं और जीवन का उद्देश्य क्या है।
इसलिए जब हम अगली पीढ़ी के व्यवहार पर प्रश्न उठाते हैं, तो पहले हमें अपने भीतर झाँकना होगा।
संस्कार आखिर हैं क्या?
हमारे समाज में अक्सर हर पुरानी परंपरा को संस्कार और हर आधुनिक विचार को कुसंस्कार कह देने की प्रवृत्ति है।
लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है?
संस्कार का अर्थ केवल कुछ धार्मिक कर्मकाण्ड सीख लेना नहीं है। संस्कार का अर्थ है—मनुष्य के भीतर ऐसी विवेकपूर्ण चेतना का निर्माण, जो उसे सही और गलत के बीच अंतर करना सिखाए।
मेरे विचार से सच्चे सुसंस्कार चार प्रमुख आधारों पर निर्मित होते हैं—
1. नीति
नीति हमें सिखाती है—
- सत्य और असत्य में अंतर करना।
- न्याय और अन्याय को पहचानना।
- अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को समझना।
- शक्ति का उपयोग दूसरों को दबाने के लिए नहीं, उनकी रक्षा के लिए करना।
- परिस्थितियों के अनुसार विवेकपूर्ण निर्णय लेना।
नीति के बिना धर्म भी कभी-कभी केवल बाहरी प्रदर्शन बन जाता है।
2. कला
कला मनुष्य को संवेदनशील बनाती है।
संगीत, चित्रकला, नृत्य, नाट्य और अन्य कलाएँ मनुष्य को केवल मनोरंजन नहीं देतीं; वे उसके भीतर रस, करुणा और सौन्दर्यबोध का विकास करती हैं।
जो बच्चा संगीत में करुणा सुनना सीखता है, चित्र में सौन्दर्य देखना सीखता है और नृत्य में भाव समझता है, उसके भीतर संवेदनशीलता विकसित होने की संभावना अधिक होती है।
कला हमें मनुष्य बनाती है।
3. साहित्य
साहित्य अनुभवों की वह विरासत है, जिसे एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को सौंपती है।
रामायण, महाभारत, कबीर, तुलसी, प्रेमचंद, टैगोर या आधुनिक साहित्य—इनका उद्देश्य केवल अतीत की कहानियाँ सुनाना नहीं है।
साहित्य हमें मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्षों से परिचित कराता है—
- प्रेम और विरह
- लोभ और त्याग
- सत्ता और नैतिकता
- परिवार और व्यक्ति
- धर्म और विवेक
साहित्य पढ़ने वाला बच्चा केवल जानकारी नहीं प्राप्त करता; वह दूसरे मनुष्य की पीड़ा को समझना सीखता है।
4. धर्म
यहाँ धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति, वेशभूषा या किसी विशेष समुदाय की पहचान नहीं है।
धर्म का मूल प्रश्न है—
मनुष्य को मनुष्य बनाने वाली धारण शक्ति क्या है?
धर्म वह चेतना है जो हमें सत्य, करुणा, संयम, न्याय और उत्तरदायित्व की ओर ले जाए।
यदि धर्म मनुष्य को विनम्र, संवेदनशील और विवेकशील नहीं बनाता, तो हमें यह पूछने का अधिकार है कि हम धर्म का पालन कर रहे हैं या केवल उसका प्रदर्शन।
फिर कुसंस्कार क्या हैं?
कुसंस्कार केवल आधुनिकता से नहीं आते। कई बार वे परंपरा के नाम पर भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते रहते हैं।
मेरे विचार में कुसंस्कार मुख्यतः इन आधारों पर खड़े होते हैं—
1. भेड़चाल
“सब कर रहे हैं, इसलिए हमें भी करना है।”
यह विचार शायद स्वतंत्र चिंतन का सबसे बड़ा शत्रु है।
बच्चे को यह नहीं सिखाया जाना चाहिए कि समाज जो कहे, वही सत्य है।
उसे यह सिखाया जाना चाहिए—
सम्मानपूर्वक प्रश्न करो, समझो, सोचो और फिर निर्णय लो।
2. दकियानूसी रीति-रिवाज
हर परंपरा गलत नहीं होती।
परंतु हर परंपरा इसलिए सही भी नहीं हो जाती क्योंकि वह पुरानी है।
सच्चा संस्कार वह है जो बच्चे को अपनी परंपरा से जोड़े, लेकिन उसके भीतर इतना विवेक भी विकसित करे कि वह पूछ सके—
“यह परंपरा क्यों है?”
“इसका मूल उद्देश्य क्या था?”
“क्या आज भी इसका वही अर्थ है?”
जो परंपरा मनुष्य की गरिमा, करुणा और विवेक को नष्ट करे, उसके पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है।
3. ढोंग और पाखंड
जब घर में कहा कुछ जाता है और किया कुछ और जाता है, तब बच्चे सबसे पहले विश्वास करना छोड़ते हैं।
यदि माता-पिता ईमानदारी का उपदेश दें, लेकिन स्वयं छल करें; धर्म की बात करें, लेकिन दूसरों के प्रति घृणा रखें; सम्मान की अपेक्षा करें, लेकिन अपने बुजुर्गों या कर्मचारियों का अपमान करें—तो बच्चा शब्दों से नहीं, व्यवहार से सीखता है।
और फिर एक दिन वही बच्चा माता-पिता से पूछता है—
“आपने मुझे जो सिखाया था, क्या आप स्वयं उस पर चलते हैं?”
4. छल-कपट
बच्चे को केवल सफल होना सिखाना और यह न सिखाना कि सफलता किस प्रकार प्राप्त की जाए, एक गंभीर भूल है।
यदि उसे बचपन से यह सिखाया जाए कि—
“किसी भी तरह जीतना है,”
“लोगों को इस्तेमाल करना है,”
“पकड़े न जाओ तो सब ठीक है,”
तो वह जीवन में सफलता तो पा सकता है, लेकिन चरित्र नहीं।
और बिना चरित्र के सफलता अक्सर संबंधों को नष्ट कर देती है।
5. अंधविश्वास
विश्वास और अंधविश्वास में अंतर है।
विश्वास मनुष्य को शक्ति देता है।
अंधविश्वास उससे प्रश्न करने की शक्ति छीन लेता है।
धार्मिक चेतना और वैज्ञानिक दृष्टि एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। वास्तविक अध्यात्म तो प्रश्नों से डरता ही नहीं।
जिस घर में बच्चे को केवल “मत पूछो” कहा जाता है, वहाँ स्वतंत्र चेतना विकसित नहीं होती।
और जहाँ प्रश्न पूछना अपराध बना दिया जाता है, वहाँ अगली पीढ़ी या तो अंधानुकरण करती है—या फिर विद्रोह में सब कुछ अस्वीकार कर देती है।
इसलिए प्रश्न बच्चों से पहले माता-पिता से होना चाहिए
हम बच्चों से पूछते हैं—
“तुम माता-पिता का सम्मान क्यों नहीं करते?”
लेकिन शायद पहले माता-पिता से पूछा जाना चाहिए—
आपने अपने बच्चों को ऊपर बताए गए सुसंस्कारों में से क्या दिया?
क्या आपने उन्हें—
- नीति दी या केवल “हमेशा जीतना” सिखाया?
- कला दी या केवल प्रतिस्पर्धा?
- साहित्य दिया या केवल परीक्षा और करियर?
- धर्म दिया या केवल कर्मकाण्ड?
- विवेक दिया या केवल आज्ञापालन?
- प्रश्न करने की स्वतंत्रता दी या भय?
और इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न—
क्या आपने उन्हें सुसंस्कार दिए, या अपने ही भय, पूर्वाग्रह, पाखंड और अंधविश्वास विरासत में दे दिए?
सम्मान माँगा नहीं जाता, अर्जित किया जाता है
माता-पिता का सम्मान भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। लेकिन सम्मान का अर्थ भय नहीं है।
सच्चा सम्मान वहाँ जन्म लेता है जहाँ बच्चा माता-पिता में देखता है—
- सत्यनिष्ठा
- प्रेम
- न्याय
- संवेदना
- आत्मानुशासन
- और जीवन तथा शब्दों में समानता
बच्चे से यह कहना आसान है—
“हमारे संस्कारों में बड़ों का सम्मान करना सिखाया जाता है।”
लेकिन उससे पहले हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे संस्कार वास्तव में मानवीय संस्कार हैं।
क्योंकि बच्चा अंततः वही आगे बढ़ाएगा जो उसने घर में देखा है।
शायद हमारी अगली पीढ़ी खराब नहीं हुई है…
शायद वह केवल हमसे एक कठिन प्रश्न पूछ रही है—
“आपने मुझे क्या दिया—संस्कार या कुसंस्कार?”
और उस प्रश्न का उत्तर देने से पहले हमें अपने भीतर झाँकना होगा।
क्योंकि—
संस्कार केवल परंपरा को दोहराने का नाम नहीं है।
संस्कार वह चेतना है जो मनुष्य को अधिक विवेकशील, संवेदनशील और मानवीय बनाए।
नीति से चरित्र बनता है।
कला से संवेदना।
साहित्य से चेतना।
और धर्म से जीवन को धारण करने का विवेक।
जबकि—
भेड़चाल व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनती है।
दकियानूसी सोच विवेक को बाँधती है।
ढोंग और पाखंड विश्वास नष्ट करते हैं।
छल-कपट चरित्र को खोखला करते हैं।
और अंधविश्वास प्रश्न करने की शक्ति छीन लेता है।
इसलिए अगली बार जब हम कहें—
“आजकल के बच्चे माता-पिता का सम्मान नहीं करते…”
तो शायद हमें पहले स्वयं से पूछना चाहिए—
“हमने उन्हें सम्मान के योग्य जीवन-मूल्य दिए भी थे या नहीं?”
क्योंकि संस्कार से ही संस्कृति बनती है।
और संस्कृति से ही समाज का निर्माण होता है।
— Akshat Agrawal | SSG – संस्कार • संस्कृति • सत्कार
[31/08, 5:25 pm] Akshat Agrawal: हिंदुत्ववादियों का क्या नीति, कला संस्कृति और धर्म है बच्चों ?
[31/08, 5:26 pm] Akshat Agrawal: आपका प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे किसी व्यक्ति की धार्मिक या राजनीतिक पहचान पर हमला बनाने के बजाय वैचारिक आत्ममंथन के रूप में रखना अधिक प्रभावी होगा।
मेरा मानना है कि मूल प्रश्न यह होना चाहिए—
आज के राजनीतिक हिन्दुत्व की बच्चों को दी जाने वाली शिक्षा क्या है?
क्या हम उन्हें नीति सिखा रहे हैं—या केवल अपनों और परायों की राजनीति?
क्या हम उन्हें कला और संस्कृति सिखा रहे हैं—या केवल अतीत के गौरव का भावनात्मक नारा?
क्या हम उन्हें साहित्य पढ़ा रहे हैं—कबीर की निर्भीकता, तुलसी की लोकचेतना, सूर की करुणा, मीरा की स्वतंत्रता, रवीन्द्रनाथ की मानवता—या केवल चयनित इतिहास और वैचारिक आख्यान?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या हम उन्हें धर्म दे रहे हैं या धार्मिक पहचान?
धर्म यदि—
सत्य की खोज है,
आत्मसंयम है,
करुणा है,
न्याय है,
भय से मुक्ति है,
और प्रश्न करने का साहस है,
तो बच्चों को यही सिखाना धर्म का वास्तविक संस्कार होगा।
लेकिन यदि उन्हें बचपन से यह सिखाया जाए कि—
> “तुम्हारी पहचान ही तुम्हारी श्रेष्ठता है।”
“प्रश्न करने वाला शत्रु है।”
“जो हमारे जैसा नहीं, उससे सावधान रहो।”
“अतीत पर गर्व करना वर्तमान में चरित्र निर्माण से अधिक महत्वपूर्ण है।”
तो हम संस्कार नहीं, राजनीतिक पूर्वाग्रह अगली पीढ़ी को दे रहे हैं।
सबसे बड़ा संकट यह है कि धर्म, संस्कृति और राजनीति को एक ही चीज़ मान लिया गया है।
हिन्दू धर्म की महान परंपरा प्रश्नों, दर्शनों, मतभेदों और साधना की परंपरा रही है। उपनिषदों से लेकर बुद्ध, कबीर, नानक और भक्ति आंदोलन तक भारतीय आध्यात्मिक चेतना ने प्रश्न करने और स्थापित मान्यताओं को चुनौती देने की शक्ति दिखाई है।
इसलिए शायद आज बच्चों से पहले माता-पिता और समाज से पूछना चाहिए—
> हम अपने बच्चों को हिन्दू बना रहे हैं, धार्मिक बना रहे हैं, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील बना रहे हैं—या केवल राजनीतिक रूप से प्रतिक्रियाशील?
क्योंकि—
धर्म पहचान से बड़ा है।
संस्कृति नारे से बड़ी है।
नीति सत्ता से बड़ी है।
और सच्चा संस्कार किसी दूसरे से घृणा करना नहीं, स्वयं को बेहतर मनुष्य बनाना सिखाता है।
यही प्रश्न केवल हिन्दुत्ववादियों से नहीं, बल्कि हर धार्मिक और राजनीतिक विचारधारा से पूछा जाना चाहिए—
> आप अगली पीढ़ी को विचार दे रहे हैं या केवल भय?
विवेक दे रहे हैं या अंधानुकरण?
संस्कृति दे रहे हैं या केवल पहचान की राजनीति?

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