Thursday, June 25, 2026

मेरे पुरखों को भावभीनी श्रद्धांजलि

 मत कर तू मोह

मत कर तू मोह, मन मेरे,
मोह न जीवन का सम्मान।
जन्म लिया जब इस धरती पर,
पशु भी है तुझमें, है इंसान।

भूख, भय, निद्रा और वासना,
सबमें एक-सा बहता प्राण।
इनसे ऊपर उठना ही तो,
मानव होने की पहचान।

काम और अर्थ पुरुषार्थ हैं,
इनको किसने त्याज्य कहा?
धर्म बिना जब साथ न हों तो,
बनते हैं दुःख का ही पथ।

स्वार्थ बिना संसार न चलता,
पर केवल स्वार्थ अज्ञान।
परोपकार से सिंचित जीवन,
बनता है शिव का वरदान।

पुरुषार्थ और परमार्थ का,
जो संतुलन पहचान सके;
स्वार्थ और परोपकार को,
एक ही दीप में साध सके।

कौरव भी थे इसी धरा के,
पाण्डव भी इसी कुल में।
भेद न जन्म का था कोई,
भेद था केवल अंतरमन में।

दुर्योधन भी मन का हिस्सा,
युधिष्ठिर भी भीतर रहते।
भीम का वेग, अर्जुन का संशय,
हर मानव के भीतर बहते।

कृष्ण ने यह कब कहा मन से—
त्यागो जग, त्यागो परिवार?
उन्होंने तो धर्म सिखाया—
कर्तव्य में ही है विस्तार।

कुन्ती

कुन्ती ने दुःख कम कब देखा?

कुँवारी माँ बनने का भय,

राजमहलों की राजनीति,

वनवास,

युद्ध,

और पुत्र-वियोग।

फिर भी उसने भाग्य को दोष न देकर,

कर्तव्य को चुना।

अपने दुःख से बड़ी बनी,

इसीलिए वह केवल माता नहीं,

चेतना की जननी बन गई।

द्रौपदी

द्रौपदी ने अपमान सहा,

सभा में प्रश्न किया,

अन्याय के सामने मौन न रही।

प्रतिशोध भी था,

पर उससे बड़ा था धर्म का आग्रह।

वह केवल पाँच पतियों की रानी नहीं,

आत्मसम्मान की ज्योति थी।

कुन्ती और द्रौपदी दोनों ने,

समाज की सीमाएँ लाँघीं।

उन्होंने जन्म से नहीं,

अपने निर्णयों से स्वयं को ऊँचा किया।

मैं भी जन्मा इसी जगत में,

लेकर अपने संस्कार।

कौरव मुझमें,

पाण्डव मुझमें,

चलता भीतर महाभार।

कभी अभिमान बना दुर्योधन,

कभी करुणा युधिष्ठिर हुई।

कभी भीम-सा क्रोध उमड़ता,

कभी अर्जुन की दृष्टि डोली।

मेरी एक बुआ थी ऐसी,

सरल, निर्मल, शांत विचार।

पंचदेव की पूजा करती,

पाँच गुणों का था परिवार।

मोहवश मैंने वैर ठाना,

कुल-अभिमान न छोड़ सका।

जंघा मेरी स्वयं ही टूटी,

अपने ही अहं से हार गया।

माता-पिता का प्रेम मिला था,

आशीषों का अमृत दान।

पर मोह ने आँखें ढँक डालीं,

छूट गया उनका सम्मान।

जिसने भीतर कृष्ण जगाया,

वही सच्चा रण जीतेगा।

जो अपने पशु को पहचानकर,

धीरे-धीरे साध सकेगा।

ईश्वर पर जिसका विश्वास,

वह जग से वैर न बाँधेगा।

स्वतंत्र होगी उसकी चेतना,

बुद्धि अपने वश में रहेगी।

मत कर तू मोह, मन मेरे,

यही महाभारत का ज्ञान—

पशु को मारना धर्म नहीं,
पशु पर शासन ही है विज्ञान।

स्वार्थ रहे, पर धर्म सहित हो।
प्रेम रहे, पर मोह न हो।
पुरुषार्थ रहे, परमार्थ सहित हो।
तभी मनुष्य, मनुष्य हो।

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 मेरे पुरखों को भावभीनी श्रद्धांजलि

मेरा लेखन ही मेरा तर्पण है

अक्षत अग्रवाल



«"मुसाफ़िर हूँ यारों,
न घर है, न ठिकाना...
मुझे चलते जाना है।"»

जीवन की इस लंबी यात्रा में आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि मैं कभी अकेला चला ही नहीं।

मेरे साथ मेरे पुरखे चले।

उनकी सीख चली।

उनके संस्कार चले।

उनकी मौन प्रार्थनाएँ चलीं।

और सबसे बढ़कर—

उनका आशीर्वाद चला।

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आज जो कुछ भी लिख पाता हूँ,

धर्म और अधर्म में जो थोड़ा-बहुत भेद कर पाता हूँ,

सत्य की खोज में जो भटकता भी हूँ और फिर लौट आता हूँ,

वह मेरी अपनी बुद्धि का नहीं,

मेरे पुरखों की तपस्या का प्रसाद है।

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विशेषकर मेरे पूज्य फूफा जी।

उन्होंने शायद कभी बड़े-बड़े मंचों पर भाषण नहीं दिए।

कोई ग्रंथ नहीं लिखा।

कोई संस्था नहीं बनाई।

लेकिन उन्होंने अपने जीवन से सिखाया कि

धर्म केवल पूजा नहीं, आचरण है।

कर्तव्य केवल शब्द नहीं,

जीवन जीने की विधि है।

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आज जब समाज में

लोभ,

मोह,

अहंकार,

छल,

कपट,

और अंधानुकरण बढ़ता देखता हूँ,

तो भीतर से एक आवाज़ आती है—

«"जो सत्य समझ में आए, उसे कहो।
चाहे लोग मानें या न मानें।"»

शायद यही मेरे पुरखों की सबसे बड़ी विरासत है।

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मैं मानता हूँ कि

श्राद्ध केवल जल अर्पित करने से नहीं होता।

सबसे बड़ा तर्पण है—

अपने जीवन को ऐसा बनाना,
जिसे देखकर पूर्वज प्रसन्न हों।

यदि मेरे शब्द

किसी एक व्यक्ति को भी

विवेक,

करुणा,

स्वचिंतन,

या धर्म की ओर प्रेरित करें,

तो यही मेरे पुरखों के चरणों में मेरी सबसे बड़ी पुष्पांजलि होगी।

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मुझे विश्वास है—

मेरे अधिकांश पुरखे

शांतचित्त थे।

सरल थे।

कर्तव्यनिष्ठ थे।

उन्होंने अपने जीवन का संघर्ष मौन रहकर जिया।

आज वे जहाँ भी होंगे,

यदि मेरी लेखनी में

सत्य की थोड़ी भी सुगंध होगी,

तो वे अवश्य मुस्कुराएँगे।

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हे मेरे पूज्य पुरखों!

यदि मुझसे भूल हुई हो,

तो क्षमा करना।

यदि कभी मैं अहंकार में भटक जाऊँ,

तो मेरा हाथ पकड़ लेना।

यदि कभी सत्य से डिग जाऊँ,

तो भीतर से मुझे पुकार लेना।

और यदि मेरी लेखनी में कभी धर्म की ज्योति प्रज्वलित हो,

तो उसे अपना ही आशीर्वाद समझूँगा।

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आज मैं किसी पिंड का नहीं,

अपने कर्म का तर्पण करता हूँ।

मेरे लेख,

मेरे विचार,

मेरे प्रश्न,

मेरी साधना—

यही आपकी स्मृति को मेरा प्रणाम हैं।

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«"न मैं आपके नाम को आगे बढ़ा सकता हूँ,
न आपकी तपस्या का ऋण चुका सकता हूँ।
पर इतना वचन देता हूँ—
सत्य की खोज नहीं छोड़ूँगा।"»

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मेरे समस्त पूर्वजों को विनम्र श्रद्धांजलि।

ॐ पितृभ्यो नमः।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। 🙏

 

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