आज सुबह-सुबह की बात है। घर की चाय अभी तैयार भी नहीं हुई थी कि माता जी ने एक सरल-सी इच्छा जताई — और वह इच्छा मुझे सीधे सूर्य, चंद्रमा, हिंदू, मुसलमान और शुद्ध भारतीयता तक खींच ले गई।
कलियुग में एक अजीब काम हुआ। हमने प्रकृति की दो महान शक्तियों को — सूर्य और चंद्र को — धर्म के खाँचों में बाँट दिया।
चंद्रकुल के कृष्ण — और चाँद बन गया मुस्लिम प्रतीक।
जो सृष्टि में साथ-साथ उगते हैं, उन्हें हमने अलग-अलग बाँट लिया।
किंतु रुकिए। क्या सूरज ने कभी कहा — मैं हिंदू हूँ? क्या चाँद ने कभी कहा — मैं मुसलमान हूँ? दोनों तो अनादि काल से एक ही आकाश में, एक ही नियम से, एक ही प्रभु की आज्ञा से चल रहे हैं।
अब देखिए — सूरज मुखी घर माँगना क्या है? माँ तो प्रभाव नहीं माँग रही थीं, सत्ता नहीं माँग रही थीं। वे माँग रही थीं — उजाला, ऊर्जा, जीवन। सूरज का वह रूप जो तपाता नहीं, जो पोषण करता है। वह रूप जिसे हम "सत्" कहते हैं।
सूरज जब प्रकाश रहे — वह प्रसाद है।
पर्दा हटाने का अर्थ है — केवल प्रकाश को आने देना, ताप को नहीं।
और माँ ने यही माँगा था। पर्दे के बिना सूरज मुखी घर — अर्थात् वह चेतना जो न हिंदू कट्टरता के पर्दे से ढकी हो, न मुस्लिम कट्टरता के पर्दे से — सीधा प्रकाश, सीधा सत्य।
शुद्ध भारतीय — अर्थात् वह जो सूरज की ऊर्जा को भी जानता है और चाँद की शीतलता को भी। जो पुरुषार्थ करता है, किंतु भावना नहीं खोता। जो तपता है, किंतु जलाता नहीं। जो प्रभाव रखता है, किंतु अहंकार नहीं पालता।
यही तो भारत का दर्शन है — अर्धनारीश्वर। आधा सूरज, आधा चंद्र। आधा शिव, आधी शक्ति। न केवल पुरुषार्थ, न केवल भावना — दोनों का संतुलन ही पूर्णता है।
जो शाश्वत है, वह सत् है।सूरज अस्त होगा, चाँद छुपेगा —किंतु सत्-चेतना कभी नहीं बुझती।वही सत्यनारायण हैं। वही विश्वनाथ हैं।वही तुम्हारे भीतर हैं।
माँ अभी भी सूरज मुखी घर चाहती हैं।
और मैं अभी भी सोच रहा हूँ — पर्दे के साथ या बिना पर्दे के?
शायद उत्तर वही है जो माँ ने दिया था —
धूप चाहिए तो पर्दा क्यों?
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