ढूंढा जग सारा, मुझसे बड़ा न कोई,
चेहरा देख अपना आईने में कौन होए!
जब ये चेहरा ही कर्म से पाया, फिर ईश्वर कौन से कर्म से मिले !
कर्म न धर्म, न कोई बुद्धि चतुराई,
मिलना उसी से होए जो कहीं होए!
शून्य से सब जब उपजा ये जान लेने सब चिंता खोए,
न कोई खोए, न कोई होए। काहे पकड़े उसको जो केवल भासित होए।
चंदा मामा दूर के, पुए पकाए मूंग के।
सूरदास के पद -
ढूँढ्यो जगत सबै, मोसों बड़ो न कोय।
दर्पन भीतर मुख निहार्यो, तब यह संशय होय॥
जेहि मुख कर्मन ते पायो, सो तो छिन-छिन खोय।
फिर कहुं ईश्वर कैसें मिलिहैं, कौन करम ते होय॥
करम न धरम, न बुद्धि चतुराई, न जप तपन की रीत।
मिलन ताहि सों होइ सकै, जो होइ सबै के मीत॥
शून्यहि ते सब उपजत देख्यो, शून्यहि माहिं समाय।
आवत जात न कोउ जगत में, मन काहे भरमाय॥
नाहिं कछु खोवत, नाहिं पावत, नाहिं दूजो कोय।
ज्यों जल ऊपर चंद प्रतिबिंब, त्यों जग भासित होय॥
माया के सब रंग तमाशा, देखत जग भरमाय।
पकड़न धावै छाँह की डोरी, हाथ कछू न आय॥
चंदा मामा दूर के, पूआ पकावैं मूँग।
बालक मन सो खेल रचायो, सुनि मुसकावैं सूर॥
सूर कहैं सुन रे मन मूढ़ा, छोड़ सकल अभिमान।
जेहि खोजत तू बन बन फिरतौ, सो बैठो तेरे प्रान॥
गोस्वामी तुलसी -
खोजत फिरेउँ जगत सब भाई,
मो सम बड़ कछु दीख न पाई॥
जब निज मुख दरपन महँ देखा,
तब मन भीतर उठी सन्देहा॥
यह तन रूप करम फल पावा,
फेरि कहहुं हरि केहि बिधि आवा॥
करम न धरम न जोग जप ज्ञाना,
नहिं चतुराई न वेद बखाना॥
मिलइ सोइ जे सर्वत्र समाना,
घट-घट रहइ, न आव न जाना॥
सूनहि ते सब भया पसारा,
सूनहि माहिं समाइ संसारा॥
तजि यह चिंता, मोह बिसारू,
काहे धरसि जग झूठ पसारू॥
नहिं कोउ खोवत, नहिं कोउ पावत,
माया बस सब सपना गावत॥
जिमि जल ऊपर चंदा छाहीं,
देखत भासै, सत्य न ताहीं॥
काहे धावसि छाँह पकड़इया,
हाथ न आवै मोह लपटइया॥
चंदा मामा दूर अकासा,
पूआ पकावै बालक आसा॥
तुलसी कहै सुनहु रे प्रानी,
रामहि बिनु सब कथा कहानी॥
जेहि खोजत बन, गिरि, सरि, सोई,
बैठा अंतर, दूर न होई॥
जब यह भेद हृदय महँ खोई,
न कोउ पराया, न कोउ होई॥
कबीर की वाणी -
खोजत खोजत जग मुआ, मुझसे बड़ा न कोय।
दर्पन भीतर मुख दिखा, तब कहि उठ्यो — कौन होय॥
यह मुख कर्मन ते मिल्यो, दिन-दिन होत पराय।
फिर कह पंडित ईश्वर मिलै, कौन करम फल पाय॥
करम धरम सब जाल है, बुद्धि बड़ी भरमाय।
जिसको खोजे नगर-नगर, सो घर भीतर आय॥
सूँन महल ते जग उपज्यो, सूँन महल लय जाय।
बीच बजार तमाशा देखे, मूढ़ा मोह बढ़ाय॥
नहिं कोई आवै, नहिं कोई जावै, नहिं कोई जनम मराय।
ज्यों जल भीतर चंद झलके, त्यों जग भासित जाय॥
छाया पकड़े दौड़ता, छाया हाथ न आय।
मुट्ठी बाँधे जग फिरै, खाली हाथहि जाय॥
चंदा मामा दूर का, पूआ पकावै मूँग।
बालक मन बहलावना, जगत भयो तैसूँ॥
कबिरा कहै सुनो भई साधो, बात कहूँ मैं खोय।
जिसको ढूँढत फिरत है, खोजनहारहि सोय॥
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
सूँन-पूरन एकहि ठौर है, दूजा कहूँ न काहिं॥
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