शिशुपाल, बाली और धोबी की आँखों से भगवान
क्या भगवान को केवल भक्त की आँखों से देखना चाहिए?
भारतीय परंपरा की एक महान विशेषता है कि उसने अपने देवताओं को भी प्रश्नों से मुक्त नहीं रखा।
हमारे यहाँ केवल आरती नहीं है।
संवाद भी है।
श्रद्धा भी है।
और शंका भी।
प्रश्न भी है।
और प्रतिप्रश्न भी।
इसलिए कभी-कभी मन पूछ बैठता है —
"हे कृष्ण, तुम्हें जो लोग भगवान नहीं मानते, उनकी नज़र से भी अपनी करनी देखो।
शायद तब शिशुपाल की सौ गालियों का अर्थ समझ आ जाए।"
यह नास्तिकता नहीं है।
यह भारतीय परंपरा की सबसे प्राचीन पद्धति है —
प्रश्न करो।
भाग 1 : भक्त और सामान्य मनुष्य
भक्त क्या देखता है?
वह भगवान की लीला देखता है।
वह दिव्यता देखता है।
वह अंतिम परिणाम देखता है।
लेकिन सामान्य मनुष्य क्या देखता है?
वह तत्काल घटना देखता है।
वह अपने साथ हुए व्यवहार को देखता है।
वह न्याय और अन्याय का अनुभव करता है।
वह अपने घावों से निर्णय करता है।
दोनों दृष्टियाँ अलग हैं।
भाग 2 : शिशुपाल का प्रश्न
कृष्ण के भक्त कहते हैं —
शिशुपाल अहंकारी था।
दुष्ट था।
अधर्मी था।
उसका अंत उचित था।
यह भक्त की दृष्टि है।
पर यदि शिशुपाल बोल पाता तो शायद कहता —
"तुम सब कृष्ण को भगवान मानते हो।
मैं नहीं मानता।
मैं उन्हें एक अत्यंत चतुर, प्रभावशाली और राजनीतिक व्यक्ति के रूप में देखता हूँ।
मुझे जो दिखा, मैंने वही कहा।"
यहाँ प्रश्न यह नहीं कि शिशुपाल सही था या गलत।
प्रश्न यह है कि
सत्य दृष्टिकोण बदलते ही बदलता हुआ क्यों प्रतीत होता है?
भाग 3 : बाली का आरोप
अब रामायण की ओर चलते हैं।
बाली के अंतिम शब्द भारतीय साहित्य के सबसे साहसी प्रश्नों में से हैं।
"मैं बैरी सुग्रीव पियारा,
कारण कवन नाथ मोहि मारा?"
हे राम,
मेरा अपराध क्या था?
यदि मेरा और सुग्रीव का विवाद था,
तो आपने हस्तक्षेप क्यों किया?
और यदि किया,
तो सामने से क्यों नहीं लड़े?
छिपकर बाण क्यों चलाया?
यह प्रश्न हजारों वर्षों से पूछा जा रहा है।
और शायद आगे भी पूछा जाएगा।
भाग 4 : सुग्रीव में क्या विशेष था?
एक व्यंग्यात्मक उत्तर भी सामने आता है —
"सुग्रीव में ऐसी क्या विशेषता थी?"
राजनीति का विद्यार्थी कहेगा —
सुग्रीव उपयोगी सहयोगी था।
रणनीतिक साझेदार था।
राम को सीता की खोज के लिए वानर सेना चाहिए थी।
सुग्रीव को सत्ता चाहिए थी।
दोनों की आवश्यकताएँ मिल गईं।
इसे आधुनिक भाषा में गठबंधन कहते हैं।
भाग 5 : धर्म रक्षक या धर्म भक्षक?
बाली का दूसरा आरोप और भी तीखा है —
"धर्म हेतु उतरेहु गोसाईं,
मारेहु मुझे व्याध की नाईं।"
अर्थात् —
आप तो धर्म की स्थापना के लिए अवतरित हुए थे।
फिर मेरा वध शिकारी की तरह क्यों किया?
यह प्रश्न असुविधाजनक है।
पर भारतीय परंपरा ने इसे छिपाया नहीं।
उसे ग्रंथ में सुरक्षित रखा।
क्यों?
क्योंकि धर्म कोई सरल गणित नहीं है।
भाग 6 : धोबी की आँखों से राम
अब एक और पात्र को बुलाते हैं।
धोबी।
वह राम को भगवान नहीं मानता।
वह उन्हें राजा मानता है।
उसकी दृष्टि से प्रश्न सरल है —
"यदि राजा की पत्नी पर प्रश्न उठ रहे हैं,
तो राजा क्या करेगा?"
भक्त कहेगा —
राम ने राजधर्म निभाया।
आलोचक कहेगा —
राम ने व्यक्तिगत न्याय की बलि चढ़ा दी।
दोनों दृष्टियाँ सह-अस्तित्व रखती हैं।
भाग 7 : भारतीय सभ्यता का साहस
यहीं भारतीय परंपरा अद्भुत बन जाती है।
उसने अपने देवताओं को केवल महिमामंडित नहीं किया।
उन्हें कठघरे में भी खड़ा किया।
शिशुपाल को बोलने दिया।
बाली को प्रश्न पूछने दिया।
धोबी को आपत्ति करने दी।
रावण को तर्क करने दिया।
कर्ण को शिकायत करने दी।
दुर्योधन को अपना पक्ष रखने दिया।
यह किसी कमजोर सभ्यता का लक्षण नहीं।
यह आत्मविश्वास का लक्षण है।
भाग 8 : धर्म का वास्तविक संकट
समस्या तब शुरू होती है जब हम सोचते हैं कि
धर्म हमेशा स्पष्ट होगा।
नहीं।
कई बार धर्म और अधर्म मिश्रित होते हैं।
कई बार दोनों पक्ष अपने को सही मानते हैं।
कई बार इतिहास विजेता के पक्ष में लिख दिया जाता है।
और कई बार पराजित के प्रश्न सदियों तक गूँजते रहते हैं।
भाग 9 : भगवान और मनुष्य के बीच
भक्त कहता है —
"भगवान की लीला मनुष्य नहीं समझ सकता।"
आलोचक कहता है —
"यदि समझ ही नहीं सकते, तो फिर न्याय कैसे करें?"
दोनों प्रश्न वैध हैं।
दोनों अधूरे हैं।
शायद इसी अधूरेपन का नाम जीवन है।
उपसंहार : शिशुपाल, बाली और हम
कभी-कभी मुझे लगता है कि
शिशुपाल, बाली और धोबी हमारे भीतर ही रहते हैं।
जब हमारे साथ अन्याय होता है,
हम शिशुपाल बन जाते हैं।
जब हमें लगता है कि शक्ति ने न्याय को पराजित कर दिया,
हम बाली बन जाते हैं।
जब हम शासकों से जवाब माँगते हैं,
हम धोबी बन जाते हैं।
और जब हम अपने प्रिय नायकों को आलोचना से ऊपर रख देते हैं,
हम भक्त बन जाते हैं।
भारतीय परंपरा शायद हमें किसी एक पक्ष में खड़ा नहीं करती।
वह हमें सभी पक्षों को सुनने की क्षमता देती है।
क्योंकि धर्म का अर्थ केवल पूजा नहीं।
धर्म का अर्थ है — कठिन प्रश्नों से भागे बिना सत्य की खोज करना।
और शायद इसी कारण रामायण और महाभारत आज भी जीवित हैं।
वे केवल भगवानों की कथा नहीं।
वे मनुष्य के प्रश्नों की भी कथा हैं।
उपसंहार : भगवान को धरती पर कौन बुलाता है?
कभी-कभी मुझे लगता है कि
शिशुपाल, बाली और धोबी केवल इतिहास के पात्र नहीं हैं।
वे आज भी जीवित हैं।
हमारे भीतर।
समाज के भीतर।
राजनीति के भीतर।
जब हमारे साथ अन्याय होता है,
हम शिशुपाल बन जाते हैं।
जब हमें लगता है कि शक्ति ने न्याय को पराजित कर दिया,
हम बाली बन जाते हैं।
जब हम शासकों से जवाब माँगते हैं,
हम धोबी बन जाते हैं।
और जब हम अपने प्रिय नायकों को आलोचना से ऊपर रख देते हैं,
हम भक्त बन जाते हैं।
पर एक और बात है।
भगवान पृथ्वी पर तब तक नहीं आते,
जब तक उनके अपने लोग उन्हें चैन से बैठने नहीं देते।
हिरण्यकश्यप था,
तो प्रह्लाद था।
रावण था,
तो विभीषण था।
कौरव थे,
तो विदुर थे।
और वैकुण्ठ में भी भगवान को सबसे अधिक परेशानी शत्रुओं ने नहीं,
अपने भक्तों ने दी।
नारद जी हर लोक में घूम-घूमकर समाचार पहुँचाते रहे।
गरुड़ जी प्रश्न पूछते रहे।
ऋषि-मुनि तप करके शिकायतें दर्ज कराते रहे।
पृथ्वी माता बार-बार गुहार लगाती रहीं।
तब कहीं जाकर अवतार की नौबत आई।
इसलिए प्रभु,
शिशुपाल की सौ गालियाँ सुनकर मत घबराना।
बाली के प्रश्नों से नाराज़ मत होना।
धोबी की आपत्ति को भी सुन लेना।
क्योंकि इतिहास बताता है कि
रावण, कंस और दुर्योधन से पहले
तुम्हें धरती पर लाने का काम अक्सर तुम्हारे विरोधियों ने नहीं,
तुम्हारे अपने भक्तों ने किया है।
और शायद तुम धरती पर तभी आओगे,
जब तुम्हारे भक्त नारद जी और गरुड़ जी ही तुम्हें लपेटेंगे।
क्योंकि अंधी स्तुति से अवतार नहीं होते।
अवतार तब होते हैं,
जब प्रश्न इतने बड़े हो जाएँ कि स्वयं भगवान को उत्तर देने आना पड़े।
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